डुमरिया के दो छोटे टोलों ने रचा इतिहास: 55 युवा बने सरकारी अफसर, वैज्ञानिक और डॉक्टर, पूरे झारखंड के लिए मिसाल

डुमरिया के छमड़ाडुंगरी और महलीसाई टोला की प्रेरक सफलता

POSITIVE STORY: पूर्वी सिंहभूम जिले के डुमरिया प्रखंड के बड़ाकांजिया गांव के छमड़ाडुंगरी और महलीसाई टोला आज पूरे झारखंड के लिए प्रेरणा का केंद्र बन चुके हैं। कभी सीमित संसाधनों और आर्थिक कठिनाइयों से जूझने वाले इन दो छोटे-से टोलों ने शिक्षा के दम पर ऐसी पहचान बनाई है कि आज यहां के 55 युवा देश के विभिन्न सरकारी विभागों में अधिकारी, वैज्ञानिक, डॉक्टर और अन्य प्रतिष्ठित पदों पर कार्यरत हैं। इन टोलों की सफलता इस बात का प्रमाण है कि यदि गांव में शिक्षा का माहौल, परिवार का सहयोग और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा हो तो किसी भी कठिन परिस्थिति को पार किया जा सकता है। यहां के युवाओं ने न केवल अपने परिवार का नाम रोशन किया, बल्कि पूरे क्षेत्र की पहचान भी राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित की है।

गरीबी और संघर्ष के बीच शिक्षा को बनाया सबसे बड़ा हथियार

इन दोनों टोलों के अधिकांश परिवार आर्थिक रूप से साधारण पृष्ठभूमि से आते हैं। कई परिवार खेती-बाड़ी करके अपना जीवनयापन करते थे। कुछ लोग जंगल से बांस लाकर टोकरियां बनाते थे, तो कई परिवार दिहाड़ी मजदूरी करके अपने बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाते थे। आर्थिक तंगी के बावजूद माता-पिता ने कभी बच्चों की शिक्षा से समझौता नहीं किया। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी बच्चों को स्कूल भेजा और बेहतर भविष्य का सपना देखने के लिए प्रेरित किया। यही कारण रहा कि बच्चों ने भी मेहनत को अपनी ताकत बनाया और प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता हासिल कर देशभर के प्रतिष्ठित संस्थानों और सरकारी सेवाओं तक पहुंचे। इन परिवारों का मानना था कि संपत्ति से बड़ी विरासत शिक्षा होती है और यही सोच आने वाली पीढ़ियों की सफलता का आधार बनी।

वैज्ञानिक, डॉक्टर और बड़े अधिकारियों तक पहुंची गांव की प्रतिभा

इन टोलों के कई युवा आज देश के महत्वपूर्ण संस्थानों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। गांव के गोपाल चंद्र बेसरा खादी एवं ग्रामोद्योग, सूचना एवं प्रौद्योगिकी विभाग में संयुक्त सचिव पद पर कार्यरत हैं। हिमांशु भूषण बास्के भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अधीन अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) में वैज्ञानिक हैं। वहीं डॉ. रामचंद्र बेसरा कोल्हान क्षेत्र के इम्स लाइसेंस अथॉरिटी के सहायक निदेशक हैं। इसके अलावा डॉ. जितेंद्र बास्के नई दिल्ली के राममनोहर लोहिया अस्पताल में चिकित्सा प्रभारी के रूप में कार्य कर रहे हैं। वहीं संग्राम हेंब्रम बीआईटी सिंदरी में धातु विज्ञान विभाग के प्रोफेसर हैं और श्याम महली पश्चिम बंगाल के सितालगाछी कॉलेज के प्राचार्य के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इन उपलब्धियों ने यह साबित कर दिया कि ग्रामीण क्षेत्र की प्रतिभा अवसर मिलने पर किसी भी बड़े शहर के विद्यार्थियों से कम नहीं होती।

55 युवाओं ने विभिन्न सरकारी सेवाओं में बनाई अलग पहचान

इन दोनों टोलों की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यहां से केवल एक-दो नहीं बल्कि कुल 55 युवा विभिन्न सरकारी सेवाओं में कार्यरत हैं। इनमें 11 इंजीनियर, 11 रेलकर्मी, 3 बैंक अधिकारी, 7 रक्षा सेवा के जवान, वैज्ञानिक, डॉक्टर, प्रोफेसर, शिक्षा विभाग, स्वास्थ्य विभाग, डाक विभाग, एलआईसी और अन्य सरकारी संस्थानों के अधिकारी शामिल हैं। इन युवाओं की सफलता ने गांव के छोटे बच्चों के सामने नए सपने और नए लक्ष्य खड़े किए हैं। अब यहां के बच्चे भी डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक और प्रशासनिक अधिकारी बनने का सपना देख रहे हैं। गांव में शिक्षा के प्रति बढ़ती जागरूकता का असर नई पीढ़ी पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

सरकारी विद्यालयों से शुरू हुई सफलता की कहानी

इन दोनों टोलों की सफलता का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि अधिकांश सफल युवाओं ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा सरकारी विद्यालयों से प्राप्त की। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने नियमित पढ़ाई, अनुशासन और कठिन परिश्रम को अपनी आदत बनाया। परिवार के बड़े सदस्यों ने बच्चों को पढ़ाई के लिए लगातार प्रेरित किया। गांव के सफल युवाओं ने भी अपने अनुभव साझा कर नई पीढ़ी का मार्गदर्शन किया, जिससे शिक्षा का सकारात्मक माहौल लगातार मजबूत होता गया। आज भी गांव में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिए पहले से सफल हो चुके अधिकारी और कर्मचारी प्रेरणा का स्रोत बने हुए हैं। यही सामूहिक प्रयास इस गांव की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है। 

पूरे झारखंड के लिए प्रेरणा बना डुमरिया का यह गांव

आज जब भी शिक्षा और सफलता की चर्चा होती है, तो डुमरिया प्रखंड के छमड़ाडुंगरी और महलीसाई टोला का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। इन दोनों टोलों ने यह साबित कर दिया है कि सफलता केवल बड़े शहरों की नहीं होती, बल्कि छोटे गांव भी देश को बड़े अधिकारी, वैज्ञानिक और डॉक्टर दे सकते हैं। यह कहानी केवल 55 युवाओं की उपलब्धि नहीं है, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा है। परिवारों का त्याग, बुजुर्गों का मार्गदर्शन, शिक्षकों की मेहनत और युवाओं का संघर्ष मिलकर एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करता है, जिसे आने वाली पीढ़ियां लंबे समय तक याद रखेंगी। डुमरिया का यह गांव आज पूरे झारखंड के लिए एक संदेश देता है कि यदि शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए, बच्चों को सही मार्गदर्शन मिले और समाज सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़े, तो किसी भी गांव की तस्वीर बदली जा सकती है। यही कारण है कि यह छोटा-सा गांव आज पूरे राज्य में शिक्षा, संघर्ष और सफलता की मिसाल बन चुका है।

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