ओलचिकी लिपि को घर-घर पहुंचाने का संकल्प, आसेका ने संताली भाषा के भविष्य पर 19 जुलाई को परिचर्चा बुलाई

Jamshedpur News: जमशेदपुर के घाटशिला स्थित पावड़ा कॉलोनी में आदिवासी सोशियो एजुकेशनल एंड कल्चरल एसोसिएशन (आसेका) झारखंड की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक की अध्यक्षता आसेका के अध्यक्ष सुभाष चंद्र मांडी ने की। बैठक का मुख्य उद्देश्य ओलचिकी लिपि के शताब्दी वर्ष (1925-2025) मिशन की प्रगति की समीक्षा करना तथा संताली भाषा और उसकी लिपि के संरक्षण एवं विस्तार को लेकर आगे की रणनीति तैयार करना था। बैठक में संगठन के पदाधिकारियों और समाज के विभिन्न प्रतिनिधियों ने भाग लेकर ओलचिकी लिपि को समाज के प्रत्येक व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए व्यापक जनजागरण अभियान चलाने पर बल दिया। वक्ताओं ने कहा कि भाषा और लिपि किसी भी समाज की सांस्कृतिक पहचान होती है, इसलिए इसके संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं।

'घर-घर ओलचिकी' अभियान को सफल बनाने का आह्वान


बैठक को संबोधित करते हुए आसेका झारखंड के अध्यक्ष सुभाष चंद्र मांडी ने कहा कि ओलचिकी शताब्दी वर्ष मिशन के तहत संताल समाज के प्रत्येक व्यक्ति को ओलचिकी लिपि में पढ़ना और लिखना सिखाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। हालांकि अब भी कई सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोग अपनी मातृभाषा की लिपि में लिखने-पढ़ने से वंचित हैं। उन्होंने कहा कि जब तक समाज के सभी वर्ग मिलकर जिम्मेदारी नहीं निभाएंगे, तब तक यह मिशन पूरी तरह सफल नहीं हो पाएगा। उन्होंने सभी सामाजिक संगठनों, शिक्षकों, बुद्धिजीवियों और स्वशासन व्यवस्था के प्रतिनिधियों से गांव-गांव जाकर लोगों को ओलचिकी लिपि सिखाने का अभियान तेज करने का आग्रह किया।

सिर्फ घोषणा नहीं, धरातल पर काम करने की जरूरत


सुभाष चंद्र मांडी ने कहा कि किसी भी सामाजिक अभियान को सफल बनाने के लिए केवल भाषण या घोषणा पर्याप्त नहीं होती, बल्कि निरंतर जमीनी स्तर पर काम करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि समाज के लोगों को यह समझना होगा कि अपनी मातृभाषा और लिपि का संरक्षण उनकी सामूहिक जिम्मेदारी है। यदि प्रत्येक गांव और पंचायत स्तर पर ओलचिकी सीखने और सिखाने का अभियान चलाया जाए, तो आने वाले वर्षों में संताली समाज शत-प्रतिशत अपनी लिपि में पढ़ने-लिखने में सक्षम हो सकता है। उन्होंने युवाओं से भी इस अभियान में सक्रिय भूमिका निभाने की अपील की।

आसेका गांव-देहात तक पहुंच बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध


बैठक में आसेका के महासचिव शंकर हेंब्रम ने कहा कि संगठन लगातार संताली भाषा और ओलचिकी लिपि के प्रचार-प्रसार में जुटा हुआ है। आने वाले दिनों में संगठन अपनी गतिविधियों का विस्तार और अधिक सुदूर गांवों तक करेगा, ताकि कोई भी व्यक्ति अपनी मातृभाषा की लिपि सीखने से वंचित न रहे। उन्होंने कहा कि ओलचिकी लिपि के जनक पंडित रघुनाथ मुर्मू द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलते हुए संगठन लोगों को लिपि सीखने और नई पीढ़ी को इससे जोड़ने का कार्य निरंतर करता रहेगा। उन्होंने कहा कि भाषा का विकास तभी संभव है जब नई पीढ़ी इसे शिक्षा, साहित्य और दैनिक जीवन में अपनाए।

19 जुलाई को संताली भाषा के वर्तमान और भविष्य पर होगी परिचर्चा


बैठक में निर्णय लिया गया कि 19 जुलाई को घाटशिला स्थित धाड़ दिशोम माझी परगना महाल में "संताली भाषा की वर्तमान स्थिति एवं भविष्य" विषय पर एक विशेष परिचर्चा आयोजित की जाएगी। इस कार्यक्रम में भाषा विशेषज्ञ, शिक्षाविद, सामाजिक कार्यकर्ता, साहित्यकार और समाज के प्रतिनिधि भाग लेकर संताली भाषा के संरक्षण, शिक्षा में इसके उपयोग, नई पीढ़ी की भागीदारी और डिजिटल युग में ओलचिकी लिपि के विस्तार जैसे विषयों पर अपने विचार रखेंगे। आयोजन का उद्देश्य समाज में भाषा और लिपि के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा भविष्य की कार्ययोजना तैयार करना है।

बैठक में कई पदाधिकारी और समाज के प्रतिनिधि रहे उपस्थित


बैठक में आसेका के विभिन्न पदाधिकारियों एवं समाज के प्रमुख लोगों ने भाग लिया। इस दौरान महासचिव शंकर हेंब्रम, शंकर सोरेन, सालखु मुर्मू, कान्हाई लाल हेंब्रम, कृष्ण चंद्र हेंब्रम, बोदेन चंद्र हांसदा सहित कई सदस्य उपस्थित रहे। सभी वक्ताओं ने एकमत होकर कहा कि ओलचिकी लिपि केवल एक लेखन प्रणाली नहीं, बल्कि संताल समाज की सांस्कृतिक पहचान, इतिहास और विरासत का महत्वपूर्ण आधार है। इसलिए शताब्दी वर्ष के अवसर पर इसे घर-घर तक पहुंचाने, बच्चों और युवाओं को इससे जोड़ने तथा समाज में इसके व्यापक उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए सभी को मिलकर काम करना होगा। उन्होंने विश्वास जताया कि सामूहिक प्रयासों से ओलचिकी लिपि का प्रचार-प्रसार और अधिक प्रभावी होगा तथा संताली भाषा आने वाली पीढ़ियों के लिए और अधिक सशक्त रूप में संरक्षित रह सकेगी।

Comments