West Bengal News: संताली भाषा और साहित्य को राष्ट्रीय पहचान दिलाने वाले प्रसिद्ध साहित्यकार, नाटककार एवं पद्मश्री सम्मानित रविलाल टुडू अब हमारे बीच नहीं रहे। गुरुवार को पश्चिम बंगाल के बारासात स्थित एक निजी अस्पताल में इलाज के दौरान उनका निधन हो गया। वे 76 वर्ष के थे। उनके निधन की खबर मिलते ही संताली साहित्य जगत, सांस्कृतिक संगठनों और आदिवासी समाज में शोक की लहर दौड़ गई। शुक्रवार को उनके पैतृक गांव नोवारा, जिला वर्धमान (पश्चिम बंगाल) में पूरे सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। रविलाल टुडू का निधन केवल एक साहित्यकार की मृत्यु नहीं है, बल्कि संताली भाषा, संस्कृति और लोक परंपराओं के एक सशक्त संरक्षक का अवसान है। उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय संताली भाषा के संरक्षण, संवर्धन और प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित कर दिया।


नोवारा गांव से राष्ट्रीय पहचान तक का सफर

वर्धमान जिले के नोवारा गांव में जन्मे रविलाल टुडू का साहित्यिक सफर अत्यंत प्रेरणादायक रहा। उनका साहित्य से जुड़ाव किसी औपचारिक साहित्यिक शिक्षा के माध्यम से नहीं, बल्कि अपने समाज की मौखिक परंपराओं, लोकगीतों, लोककथाओं और सांस्कृतिक आयोजनों के जरिए हुआ।बचपन से ही वे संथाल समुदाय की सांस्कृतिक विरासत के प्रति आकर्षित थे। गांव में होने वाले पारंपरिक नाटक, लोकनृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने उनके भीतर रचनात्मक चेतना को विकसित किया। यही कारण था कि उन्होंने संताली भाषा में नाटक और साहित्य लेखन को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया।

संताली नाटक और साहित्य को नई दिशा देने वाले रचनाकार

रविलाल टुडू ने अपने साहित्य और नाटकों के माध्यम से संथाल समाज की सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को अभिव्यक्ति दी। उनकी रचनाओं में आदिवासी जीवन, सामुदायिक एकता, परंपराएं, संघर्ष, सामाजिक परिवर्तन और सांस्कृतिक अस्मिता जैसे विषय प्रमुखता से दिखाई देते हैं। उनकी लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने उन लोककथाओं, परंपराओं और सांस्कृतिक प्रतीकों को शब्दों में संजोया, जिनका लिखित दस्तावेजीकरण बहुत कम उपलब्ध था। उन्होंने संताली समाज की मौखिक परंपरा को साहित्यिक स्वरूप देकर उसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित किया। उनके नाटक और साहित्यिक कृतियां केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं थीं, बल्कि समाज को उसकी जड़ों से जोड़ने का कार्य भी करती थीं।

चुनौतियों के बावजूद साहित्य साधना जारी रखी

रविलाल टुडू पेशे से बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े रहे, लेकिन नौकरी की व्यस्तताओं के बावजूद उन्होंने साहित्य सृजन का कार्य कभी नहीं छोड़ा। उस दौर में जब आदिवासी भाषाओं को पर्याप्त साहित्यिक मंच और संसाधन उपलब्ध नहीं थे, तब उन्होंने सीमित अवसरों के बीच भी लगातार लेखन जारी रखा। संताली भाषा के साहित्य को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने की राह आसान नहीं थी। फिर भी उन्होंने अपने समर्पण, धैर्य और रचनात्मकता के बल पर संताली साहित्य को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उनकी मेहनत का परिणाम यह हुआ कि संताली भाषा और साहित्य को देशभर में नई पहचान मिली। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि यदि किसी व्यक्ति में अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति समर्पण हो, तो वह विपरीत परिस्थितियों में भी इतिहास रच सकता है।

साहित्य अकादमी पुरस्कार से मिला राष्ट्रीय सम्मान

रविलाल टुडू के साहित्यिक योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक सराहना मिली। वर्ष 2015 में उन्हें उनकी चर्चित नाट्य कृति ‘पारसी खातिर’ के लिए प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह सम्मान केवल उनके व्यक्तिगत योगदान की पहचान नहीं था, बल्कि संताली भाषा और साहित्य के लिए भी एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी। इस पुरस्कार के माध्यम से देशभर में संताली साहित्य की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित हुआ। उनकी रचनाओं ने यह सिद्ध किया कि भारतीय भाषाओं की विविधता में आदिवासी भाषाओं का भी महत्वपूर्ण स्थान है और उनका संरक्षण राष्ट्रीय सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए आवश्यक है।

पद्मश्री और बंग भूषण सम्मान से बढ़ी प्रतिष्ठा

रविलाल टुडू को वर्ष 2026 में देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मानों में से एक पद्म श्री से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उन्हें संताली भाषा, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण में उनके अमूल्य योगदान के लिए प्रदान किया गया था। इसके अलावा वर्ष 2022 में पश्चिम बंगाल सरकार ने उन्हें बंग भूषण पुरस्कार से भी सम्मानित किया। इन सम्मानों ने यह साबित किया कि उनका कार्य केवल एक समुदाय तक सीमित नहीं था, बल्कि भारतीय साहित्य और संस्कृति के व्यापक परिदृश्य में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान था। उनकी उपलब्धियां आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेंगी।

साहित्य अकादमी और संताली समाज ने जताया शोक

रविलाल टुडू के निधन पर साहित्य अकादमी, संताली राइटर्स एसोसिएशन तथा देशभर के साहित्यकारों और सांस्कृतिक संगठनों ने गहरा दुख व्यक्त किया है। साहित्य अकादमी ने अपने शोक संदेश में कहा कि संताली भाषा और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन के प्रति रविलाल टुडू का आजीवन समर्पण अद्वितीय था। उन्होंने अपने लेखन और नाट्यकर्म के माध्यम से संताली समाज की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत किया। संताली लेखकों और बुद्धिजीवियों ने उन्हें आदिवासी साहित्य का एक मजबूत स्तंभ बताते हुए कहा कि उनकी कमी लंबे समय तक महसूस की जाएगी।

युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा बनकर जीवित रहेंगे रविलाल टुडू

रविलाल टुडू की वास्तविक विरासत उनके द्वारा लिखी गई पुस्तकें, नाटक और सांस्कृतिक विचारधारा हैं। उन्होंने यह साबित किया कि किसी भाषा की शक्ति उसके बोलने वालों की संख्या से नहीं, बल्कि उसे जीवित रखने वाले लोगों की प्रतिबद्धता से तय होती है। आज संताली साहित्य से जुड़ी युवा पीढ़ी उन्हें एक मार्गदर्शक, प्रेरणास्रोत और सांस्कृतिक योद्धा के रूप में याद करती है। उनकी रचनाएं आने वाले वर्षों में भी संताली समाज की पहचान और सांस्कृतिक चेतना को मजबूत करती रहेंगी। रविलाल टुडू भले ही इस दुनिया से विदा हो गए हों, लेकिन उनके शब्द, उनके विचार और उनकी साहित्यिक धरोहर हमेशा जीवित रहेंगे। संताली भाषा और साहित्य के इतिहास में उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज रहेगा।