Jamshedpur News : झारखंड के वरिष्ठ आंदोलनकारी और पूर्व विधायक सूर्यसिंह बेसरा ने राज्य में जनसंख्या को आधार बनाकर किए जा रहे परिसीमन (Delimitation) पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया है। बिष्टुपुर स्थित निर्मल गेस्ट हाउस में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि आदिवासियों के अस्तित्व को बचाने के लिए इस परिसीमन का राज्यव्यापी विरोध किया जाएगा। अपनी मांगों और चिंताओं को देश के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचाने के लिए आंदोलनकारियों का एक प्रतिनिधिमंडल आगामी 25 जून को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात करेगा और उन्हें एक ज्ञापन सौंपेगा। बेसरा ने चेतावनी दी कि यदि झारखंड के विशेष भौगोलिक और सामाजिक ताने-बाने को नजरअंदाज कर परिसीमन लागू किया गया, तो यह यहां के मूल निवासियों के राजनीतिक और सामाजिक वजूद को समाप्त करने जैसा होगा।




पूर्वोत्तर राज्यों की तर्ज पर झारखंड को परिसीमन से बाहर रखने की मांग

संवाददाता सम्मेलन के दौरान सूर्यसिंह बेसरा ने देश के संवैधानिक ढांचे का हवाला देते हुए एक महत्वपूर्ण तुलना की। उन्होंने कहा कि भारत के पूर्वोत्तर राज्य—असम, नागालैंड और मणिपुर—में आदिवासियों के अस्तित्व, संस्कृति और पहचान की रक्षा के लिए 'छठवीं अनुसूची' (Sixth Schedule) प्रभावी रूप से लागू है। इन राज्यों के जनजातीय क्षेत्रों में देश के सामान्य कानून सीधे तौर पर लागू नहीं होते हैं, बल्कि उन्हें विशेष स्वायत्तता प्राप्त है। इसी कारण से इन राज्यों को परिसीमन की प्रक्रिया से बाहर रखा गया है ताकि वहां जनसांख्यिकीय बदलावों का असर आदिवासियों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर न पड़े। बेसरा ने पुरजोर मांग की कि इसी नीति के तहत झारखंड के पांचवीं अनुसूची (Fifth Schedule) के अंतर्गत आने वाले अनुसूचित क्षेत्रों को भी परिसीमन से पूरी तरह मुक्त रखा जाना चाहिए, क्योंकि यहां भी मामला सीधे तौर पर आदिवासियों के अस्तित्व और उनकी जमीन से जुड़ा हुआ है।

जनसंख्या आधारित परिसीमन से आदिवासियों के अस्तित्व पर संकट

सूर्यसिंह बेसरा ने झारखंड में आबादी को पैमाना मानकर किए जा रहे परिसीमन की प्रासंगिकता पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि झारखंड का एक बड़ा कड़वा सच यह है कि यहां के मूल निवासी और आदिवासी वर्ग के लोग बुनियादी सुविधाओं, रोजगार और बेहतर आजीविका की तलाश में लगातार दूसरे राज्यों में पलायन (Migration) करने को मजबूर हैं। इसके अलावा, बड़े उद्योगों, खनन परियोजनाओं और बांधों के निर्माण के कारण बड़े पैमाने पर आदिवासियों का विस्थापन (Displacement) हुआ है। इस निरंतर होते विस्थापन और पलायन के कारण अनुसूचित क्षेत्रों की स्थानीय आबादी के आंकड़ों में तकनीकी रूप से कमी दिखाई देती है। ऐसे में यदि केवल जनसंख्या को आधार मानकर परिसीमन किया जाता है, तो यह उन आदिवासियों के साथ सरासर अन्याय होगा जो अपनी ही जमीन पर विकास की बलि चढ़कर विस्थापित हो चुके हैं।

राजनीतिक प्रतिनिधित्व को चोट, 28 से घटकर 21 हो जाएंगी एसटी सीटें

परिसीमन के दूरगामी राजनीतिक प्रभावों को रेखांकित करते हुए पूर्व विधायक ने आंकड़ों के साथ अपनी चिंता साझा की। उन्होंने बताया कि वर्तमान में झारखंड विधानसभा में अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए 28 सीटें आरक्षित हैं, जो राज्य की राजनीति में आदिवासियों की आवाज को मजबूत बनाए रखती हैं। लेकिन, यदि नए परिसीमन को जनसंख्या के मौजूदा समीकरणों के आधार पर लागू कर दिया गया, तो आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या घटकर महज 21 रह जाएगी। बेसरा ने कड़े शब्दों में कहा कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व में 7 सीटों का यह भारी नुकसान झारखंड के आदिवासी समाज को किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है। सीटों की संख्या घटने से राज्य की नीति-निर्धारण प्रक्रियाओं में आदिवासियों की भागीदारी और प्रभाव बेहद कमजोर हो जाएगा।

आदिवासियों को 'वनवासी' कहना ओछी मानसिकता का परिचायक

संवाददाता सम्मेलन में सूर्यसिंह बेसरा ने हाल ही में देश की राजधानी दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान आदिवासियों के लिए इस्तेमाल किए गए संबोधन पर भी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। उन्होंने कहा कि कुछ संगठनों और विचारधारों द्वारा आदिवासियों को 'वनवासी' कहकर संबोधित किया जा रहा है, जो उनकी संकीर्ण और ओछी मानसिकता को दर्शाता है। बेसरा ने स्पष्ट किया कि 'आदिवासी' शब्द का अर्थ है इस भूमि के 'मूल निवासी', जिनका इस देश के जल, जंगल और जमीन पर पहला अधिकार है। वहीं, 'वनवासी' शब्द उनके ऐतिहासिक और संवैधानिक अधिकारों को संकुचित कर उन्हें केवल जंगल में रहने वाले नागरिकों तक सीमित करने का एक सोचा-समझा प्रयास है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आदिवासियों के इसी वजूद और अधिकारों को सम्मान देने के लिए हर साल 9 अगस्त को 'विश्व आदिवासी दिवस' मनाया जाता है। भारत में लगभग 700 आदिवासी समुदाय निवास करते हैं और वे सभी गर्व से अपनी पहचान 'आदिवासी' के रूप में ही स्वीकार करते हैं।

सरना और सनातन धर्म के बीच का मूलभूत अंतर और स्वशासन व्यवस्था

धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के मुद्दे पर बोलते हुए पूर्व विधायक ने भ्रामक प्रचारों को खारिज किया। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि सरना और सनातन दोनों एक नहीं हैं, बल्कि दोनों पूरी तरह अलग-अलग धार्मिक व सांस्कृतिक धाराएं हैं। दोनों के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि सरना समाज: यह समाज पूरी तरह से प्रकृति का पूजक है। यहां पेड़ों, पहाड़ों, नदियों और प्राकृतिक शक्तियों की आराधना की जाती है। सरना समाज किसी मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं रखता। इसके अलावा, यह समाज अपनी प्राचीन रूढ़ि प्रथा और पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था (जैसे- माझी परगना महाल, पड़हा राजा व्यवस्था) के माध्यम से संचालित होता है। सनातन धर्म मुख्य रूप से मूर्ति पूजक है, जिसकी अपनी अलग शास्त्रोक्त परंपराएं, मंदिर और अनुष्ठानिक पद्धतियां हैं। बेसरा ने जोर देकर कहा कि इन दोनों व्यवस्थाओं और मान्यताओं में दूर-दूर तक कोई समानता या सीधा रिश्ता नहीं है, इसलिए सरना धर्म की स्वतंत्र पहचान को अक्षुण्ण बनाए रखना बेहद जरूरी है।

25 जून को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात की रणनीति

परिसीमन के इस राष्ट्रीय और प्रादेशिक संकट के समाधान के लिए सूर्यसिंह बेसरा ने लोकतांत्रिक और संवैधानिक संघर्ष का रास्ता चुनने का ऐलान किया है। उन्होंने बताया कि इस मुद्दे पर व्यापक जनमत तैयार किया जा रहा है और आंदोलन के पहले चरण के तहत 25 जून को नई दिल्ली में महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात का समय तय किया गया है। चूंकि राष्ट्रपति स्वयं आदिवासी समाज से आती हैं और पांचवीं व छठवीं अनुसूची के क्षेत्रों के संरक्षण की संवैधानिक कस्टोडियन (संरक्षक) हैं, इसलिए झारखंड के आंदोलनकारियों को उनसे न्याय की पूरी उम्मीद है। राष्ट्रपति को सौंपे जाने वाले ज्ञापन में झारखंड के आदिवासी बहुल क्षेत्रों को परिसीमन से मुक्त रखने, आरक्षित सीटों को यथावत बनाए रखने और सरना समाज की सांस्कृतिक स्वायत्तता की रक्षा करने की पुरजोर मांग की जाएगी। यदि इस मुलाकात के बाद भी केंद्र सरकार ने अपने रुख में बदलाव नहीं किया, तो झारखंड की धरती पर एक और उग्र जन-आंदोलन की शुरुआत की जाएगी।