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आदिवासी हो समाज ने वारंग चिति लिपि के जनक गुरु कोल लाको बोदरा को उनकी 40वीं पुण्यतिथि पर याद किया

 Jamshedpur News : भाषा, संस्कृति और लिपि किसी भी समाज की आत्मा होती है। जिस समाज के पास अपनी समृद्ध भाषा और लिपि होती है, वह वैश्विक पटल पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखता है। आदिवासी हो समाज को 'वारंग चिति' जैसी अनमोल लिपि देकर दुनिया में गौरवमयी स्थान दिलाने वाले महान युगपुरुष, भाषाविद् और गुरु कोल लाको बोदरा की 40वीं पुण्यतिथि सोमवार को जमशेदपुर में श्रद्धा और संकल्प के साथ मनाई गई। सीतारामडेरा स्थित आदिवासी हो समाज भवन परिसर में आयोजित इस गरिमामयी कार्यक्रम में समाज के विभिन्न वर्गों के लोग, बुद्धिजीवी, महिलाएं और विशेषकर युवा बड़ी संख्या में एकत्रित हुए। सभी ने गुरु कोल लाको बोदरा की आदमकद प्रतिमा पर पुष्प और माल्यार्पण कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की और उनके संघर्षों को नमन किया।




लाको बोदरा के जीवन वृत्त पर प्रकाश डाला

इस श्रद्धांजलि कार्यक्रम का सफल आयोजन आदिवासी हो समाज, सीतारामडेरा के अध्यक्ष राजेश कंडेयांग के कुशल नेतृत्व में किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक रीति-रिवाज और गुरु बोदरा के प्रति आदर भाव प्रकट करने के साथ हुई। मौके पर मौजूद समाज के प्रबुद्ध जनों ने गुरु कोल लाको बोदरा के जीवन वृत्त पर प्रकाश डाला। वक्ताओं ने कहा कि गुरु बोदरा केवल एक लिपि के आविष्कारक नहीं थे, बल्कि वे एक दूरदर्शी समाज सुधारक, दार्शनिक और सांस्कृतिक चेतना के अग्रदूत थे। उन्होंने उस दौर में हो समाज को संगठित और शिक्षित करने का बीड़ा उठाया था, जब संसाधन बेहद सीमित थे।

लाको बोदरा के योगदान को कभी नहीं भूल सकता समाज: उदित नारायण

श्रद्धांजलि सभा को संबोधित करते हुए आदिवासी प्लस टू हाई स्कूल के प्रिंसिपल उदित नारायण ने गुरु कोल लाको बोदरा के ऐतिहासिक कार्यों को रेखांकित किया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि
गुरु कोल लाको बोदरा ने 'वारंग चिति' लिपि का आविष्कार कर आदिवासी हो समाज को देश और दुनिया में एक नई और विशिष्ट पहचान दी है। एक समय जब हमारी समृद्ध भाषाई परंपरा केवल मौखिक रूप से जीवित थी, उन्होंने उसे अक्षरों में पिरोकर अमर कर दिया। उनके इस युगांतकारी योगदान को आदिवासी हो समाज कभी नहीं भुला सकता। आज हमारी जिम्मेदारी है कि हम उनकी इस विरासत को न केवल संभाल कर रखें, बल्कि इसे आने वाली पीढ़ियों तक पूरी प्रामाणिकता के साथ पहुंचाएं। उन्होंने शिक्षाविदों और शिक्षकों से भी अपील की कि वे शैक्षणिक स्तर पर 'वारंग चिति' लिपि के प्रचार-प्रसार में अपना योगदान दें, ताकि नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा को लिखने और पढ़ने में गर्व महसूस कर सके।

युवाओं ने लिया हो भाषा के संरक्षण और संवर्धन का संकल्प

इस पुण्यतिथि कार्यक्रम का सबसे सकारात्मक और ऊर्जावान पहलू युवाओं की भागीदारी रही। वर्तमान डिजिटल और आधुनिक युग में, जहां क्षेत्रीय भाषाओं के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है, वहीं हो समाज के युवाओं ने इस अवसर को एक वैचारिक आंदोलन का रूप दे दिया। कार्यक्रम में उपस्थित युवाओं ने सामूहिक रूप से संकल्प लिया कि वे गुरु कोल लाको बोदरा के बताए और दिखाए गए मार्ग का अनुसरण करेंगे। युवाओं ने कहा कि आधुनिक शिक्षा और करियर की दौड़ में शामिल रहते हुए भी वे अपनी सांस्कृतिक जड़ों को कमजोर नहीं होने देंगे। उन्होंने 'वारंग चिति' लिपि को डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर बढ़ावा देने, सोशल मीडिया के माध्यम से इसके प्रचार-प्रसार और आपसी बोलचाल में हो भाषा का गौरवपूर्वक उपयोग करने का संकल्प दोहराया।

कार्यक्रम में काफी संख्या में समाज के लोग पहुंचे थे

गुरु कोल लाको बोदरा की 40वीं पुण्यतिथि के इस मौके पर समाज को संगठित करने और भाषाई चेतना को जगाने के लिए कई गणमान्य लोगों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इस मुख्य रूप से राजेश कंडेयांग, सुरा बिरुली, डिबर पुरती, उपेंद्र बानरा, प्रियंका बिरुवा, चांदमनी बोदरा, रानी बोदरा, सावन लुगुन, आनंद हेंब्रम, बुधन सिंह हेंब्रम, सुभाष बिरुवा, राजू बिरुवा, राजू बिरुवा, दुर्गामनी समेत सैकड़ों की संख्या में समाज के महिला-पुरुष और छात्र-छात्राएं उपस्थित थे।

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