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ओत गुरु लको बोदरा पुण्यतिथि 2026: जमशेदपुर में श्रद्धांजलि सभा, वारंग चिति लिपि और हो भाषा संरक्षण का लिया संकल्प

Jamshedpur News: परसुडीह के जसकनडीह में 29 जून 2026 को आदिवासी हो समाज युवा महासभा एवं ग्रामसभा जस्कानडीह के संयुक्त तत्वावधान में वारंग चिति लिपि के रचयिता एवं हो समाज की सांस्कृतिक पहचान के जनक ओत गुरु लको बोदरा जी की पुण्यतिथि श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई गई। इस अवसर पर आयोजित श्रद्धांजलि सभा में बड़ी संख्या में समाज के लोग, पदाधिकारी एवं ग्रामीण उपस्थित हुए। कार्यक्रम की शुरुआत गुरु लको बोदरा जी की आदमकद प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं पुष्पांजलि अर्पित कर की गई। उपस्थित सभी लोगों ने दो मिनट का मौन रखकर दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि दी और उनके समाज के प्रति दिए गए ऐतिहासिक योगदान को याद किया।

वारंग चिति लिपि ने हो समाज को दी नई पहचान

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए आदिवासी हो समाज युवा महासभा के केंद्रीय उपाध्यक्ष सुरा बिरुली ने कहा कि ओत गुरु लको बोदरा केवल एक लिपि निर्माता नहीं थे, बल्कि वे हो समाज की पहचान और अस्मिता के निर्माता थे। उन्होंने कहा कि वारंग चिति लिपि का निर्माण हो भाषा के इतिहास में एक क्रांतिकारी कदम था। उन्होंने बताया कि सदियों से मौखिक रूप में संरक्षित हो भाषा को गुरु बोदरा ने लिखित स्वरूप देकर इसे वैज्ञानिक आधार प्रदान किया। इससे न केवल भाषा को संरक्षित करने में मदद मिली, बल्कि शिक्षा, साहित्य और प्रशासनिक उपयोग में भी हो समाज को नई दिशा मिली।

गुरु लको बोदरा का जीवन बना प्रेरणा का स्रोत

सभा के दौरान वक्ताओं ने गुरु लको बोदरा के जीवन और उनके संघर्षों को विस्तार से याद किया। वक्ताओं ने कहा कि सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने समाज के लिए जो कार्य किए, वे आज भी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत हैं।
उन्होंने अपना पूरा जीवन हो भाषा, संस्कृति और समाज की पहचान को मजबूत बनाने में समर्पित किया। उनके प्रयासों ने यह साबित किया कि किसी भी समाज की प्रगति उसकी भाषा और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण से जुड़ी होती है।

युवा पीढ़ी से भाषा और संस्कृति बचाने की अपील

उप प्रमुख शिव हांसदा एवं ग्राम सभा सचिव गांगराम बानरा ने अपने संबोधन में कहा कि आज के समय में युवा पीढ़ी की जिम्मेदारी पहले से अधिक बढ़ गई है। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे अपनी मातृभाषा, संस्कृति और वारंग चिति लिपि के अध्ययन एवं प्रचार-प्रसार को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं। उन्होंने कहा कि यदि आने वाली पीढ़ियां अपनी भाषा और परंपराओं से जुड़ी रहेंगी, तभी समाज की सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रह सकेगी। इसके लिए समाज के सभी वर्गों को मिलकर प्रयास करने होंगे।

हो भाषा संरक्षण का लिया गया सामूहिक संकल्प

कार्यक्रम के समापन से पहले उपस्थित लोगों ने सामूहिक रूप से हो भाषा एवं वारंग चिति लिपि के संरक्षण और संवर्धन का संकल्प लिया। सभा स्थल पर “गुरु लको बोदरा अमर रहें”, “हो भाषा जिंदाबाद” और “वारंग चिति ज़ोरोंग जिड” जैसे नारों से वातावरण गूंज उठा। सभी ने यह संदेश दिया कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती बल्कि समाज की पहचान, इतिहास और अस्तित्व का आधार भी होती है।

समाज के कई गणमान्य लोग रहे उपस्थित

इस श्रद्धांजलि कार्यक्रम में समाज के अनेक पदाधिकारी एवं गणमान्य लोग उपस्थित रहे। इनमें सुरा बिरुली, गांगराम बानरा, शिव हांसदा, मोना देवगम, मोसो सोय, बेंतों कुकल, मरसल समद, रामसिंह समद सहित कई सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं ग्रामीणों ने भाग लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य केवल श्रद्धांजलि देना नहीं था, बल्कि समाज के लोगों को अपनी भाषा और सांस्कृतिक धरोहर के प्रति जागरूक करना भी था। इस आयोजन ने हो समाज की सांस्कृतिक एकता और भाषा संरक्षण के संकल्प को एक बार फिर मजबूत किया।


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