Sendra News: झारखंड की लोक संस्कृति और आदिवासी परंपराओं में 'सेंदरा' का एक विशेष महत्व है। यह केवल एक शिकार उत्सव नहीं है, बल्कि आदिवासियों के शौर्य, प्रकृति से जुड़ाव और उनकी प्राचीन विरासत का प्रतीक है। हर साल की तरह इस साल भी कोल्हान, ओडिशा और पश्चिम बंगाल से बड़ी संख्या में आदिवासी 'सेंदरा वीर' (शिकारी) दलमा की पहाड़ियों पर जुटे। हालांकि, आधुनिक समय में वन्यजीव संरक्षण और परंपरा के बीच एक बड़ा टकराव देखने को मिल रहा है। इस बार भी दलमा के जंगलों में परंपरा के नाम पर शिकार की खबरें आईं, जिसे लेकर वन विभाग और सेंदरा वीरों के बीच लुका-छिपी का खेल चलता रहा।
आठ जानवरों के शिकार का दावा और वन विभाग का इनकार
इस साल सेंदरा पर्व के दौरान यह चर्चा जोरों पर रही कि सेंदरा वीरों ने कुल आठ जंगली जानवरों का शिकार किया है। जानकारी के अनुसार, फदलोगोड़ा क्षेत्र में तीन हिरण और तीन जंगली सूअरों को मारा गया। वहीं, पटमदा के इलाके से भी एक हिरण और एक खरगोश के शिकार की बात सामने आई। इन खबरों ने वन्यजीव प्रेमियों को चिंतित कर दिया है। दूसरी ओर, वन विभाग इन दावों को पूरी तरह खारिज कर रहा है। विभाग का कहना है कि उनकी मुस्तैदी के कारण जंगल में किसी भी जानवर का शिकार नहीं हुआ है।
वन विभाग को चकमा देने में सफल रहे 'स्मार्ट' शिकारी
वन विभाग ने इस बार सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए थे। मुख्य सड़कों और चेकपोस्ट पर जवानों की तैनाती थी। लेकिन सेंदरा वीरों ने वन विभाग को चकमा देने के लिए एक नई रणनीति अपनाई। वे मुख्य रास्तों के बजाय उन गुप्त रास्तों से जंगल में घुसे, जहाँ आमतौर पर गश्त कम होती है। शिकारी पिकअप वैन और अन्य वाहनों में छिपकर देर शाम जंगल की तराई में पहुंचे। उन्होंने अपनी गाड़ियां गांवों में खड़ी करने के बजाय सीधे जंगलों के भीतर तक ले जाने की कोशिश की, ताकि किसी को भनक न लगे।
फदलोगोड़ा में लंबे समय बाद मिली 'सफलता
वन विभाग के लिए सबसे चौंकाने वाली बात फदलोगोड़ा क्षेत्र से आई। पिछले 6-7 वर्षों से इस इलाके में शिकारी आते तो थे, लेकिन कड़ी निगरानी के कारण वे कभी सफल नहीं हो पाते थे। अक्सर उन्हें खाली हाथ (बैरंग) लौटना पड़ता था। लेकिन इस साल सेंदरा वीरों ने इसी क्षेत्र को अपना मुख्य केंद्र बनाया और वहां शिकार करने में कामयाब रहे। वन विभाग के अधिकारी मुख्य सड़कों पर गश्त करते रह गए और शिकारी घने जंगल के भीतर अपना काम कर गए।
पहाड़ियों पर हाई-टेक गश्ती चलता रहा
इस साल वन विभाग की सक्रियता पहाड़ी के ऊपरी हिस्सों में ज्यादा दिखी। डिमना डैम के पास स्थित भादूडीह, बोंटा, चिमटी और पहाड़ी के ऊपर कोंकादासा जैसे इलाकों में इको विकास समिति के सदस्य और वन रक्षी लगातार घूम रहे थे। विभाग के पास बोलेरो, स्कॉर्पियो और सूमो जैसी लग्जरी गाड़ियां थीं, जो हर 10-15 मिनट में गश्त कर रही थीं। लेकिन वन विभाग की यह गश्त सड़कों तक ही सीमित रही। घने जंगलों के उबड़-खाबड़ रास्तों पर गाड़ियां नहीं जा सकती थीं, और इसी का फायदा उठाकर शिकारी पैदल ही दुर्गम इलाकों में घुस गए।
दलमा राजा ने सेंदरा को कही बड़ी बात
सेंदरा पर्व को करीब से देखने वाले 'दलमा राजा' राकेश हेंब्रम का कहना है कि इस बार सेंदरा वीरों की मेहनत रंग लाई। उनके अनुसार, कई जगहों से शिकार की पुख्ता जानकारी मिली है। वहीं, धानो मार्डी जैसे जानकारों का मानना है कि सेंदरा वीर केवल परंपरा निभाने आते हैं। उनके लिए शिकार मिलना या न मिलना गौण है, लेकिन वे कभी हार नहीं मानते। अगर इस साल शिकार नहीं मिला, तो वे अगले साल फिर इसी उम्मीद में आते हैं। उनके लिए यह एक वार्षिक संकल्प की तरह है।
घने जंगलों में शिकार की तलाश करना आसान काम नहीं
लिटा बानसिंह के अनुसार, घने जंगल में घंटों पैदल चलना और शिकार की तलाश करना कोई आसान काम नहीं है। सेंदरा असल में एक स्वस्थ और निरोग शरीर की पहचान है। पुराने समय में, जो व्यक्ति जंगल की इन चुनौतियों को पार कर लेता था, उसे समाज में बहुत सम्मान दिया जाता था। हालांकि, अब समय बदल गया है। अब सेंदरा केवल एक दिन की परंपरा बनकर रह गया है, जिसमें साल में एक बार प्रतीकात्मक या वास्तविक शिकार किया जाता है।
लालसिंह गागराई चार दशकों से सेंदरा परंपरा का कर रहे निर्वहन
लाल सिंह गागराई, जो पिछले चार दशकों से इस पर्व में शामिल हो रहे हैं, एक महत्वपूर्ण अंतर बताते हैं। उनके अनुसार, स्थानीय लोग तो परंपरा का निर्वहन करते हैं, लेकिन ओडिशा और बंगाल जैसे दूर-दराज के क्षेत्रों से आने वाले कुछ लोग केवल शिकार के इरादे से आते हैं। उनके लिए यह एक रोमांच (Adventure) बन गया है। यही कारण है कि धीरे-धीरे इस परंपरा का स्वरूप बदल रहा है और इसमें वन्यजीवों के प्रति संवेदनशीलता कम होती जा रही है।
नई पीढ़ी सेंदरा परंपरा से बढ़ा रहे दूरी
लेख का एक दुखद पहलू यह है कि आदिवासी समाज की नई पीढ़ी अब अपनी इस प्राचीन परंपरा से दूर हो रही है। पिछले 10-15 सालों में यह बदलाव तेजी से आया है। सेंदरा पर्व में आज भी वही पुराने चेहरे नजर आते हैं जो सालों से आ रहे हैं। नए युवाओं में पहाड़ों पर चढ़ने, प्यास-भूख सहने और जंगल की खाक छानने का धैर्य नहीं बचा है। वे अब आधुनिक जीवनशैली में ढल चुके हैं और अपनी जड़ों से कट रहे हैं।
डिजिटल दुनिया में खो चुके हैं नयी पीढ़ी
नई पीढ़ी के सेंदरा से दूर होने का सबसे बड़ा कारण 'डिजिटल क्रांति' है। आज के युवा पहाड़ों के तंग रास्तों पर चलने के बजाय मोबाइल की दुनिया में खोए रहना ज्यादा पसंद करते हैं। कई आदिवासी घरों में अब पारंपरिक तीर-धनुष तक नहीं बचे हैं। युवा खुद को आदिवासी तो कहते हैं, लेकिन उनका रहन-सहन अब पूरी तरह शहरी हो चुका है। सेंदरा जैसा कठिन अभ्यास उन्हें अब उबाऊ और थकाने वाला लगता है।
सेंदरा परंपरा और पशुओं का शिकार पर संतुलन की है जरूरत
सेंदरा पर्व हमें एक तरफ अपनी समृद्ध संस्कृति की याद दिलाता है, तो दूसरी तरफ वन्यजीवों के संरक्षण पर सवाल खड़े करता है। वन विभाग का इनकार और सेंदरा वीरों के दावे के बीच सच्चाई कहीं जंगल के भीतर दबी हुई है। जरूरी यह है कि परंपराओं को इस तरह निभाया जाए कि प्रकृति और बेजुबान जानवरों को नुकसान न पहुंचे। साथ ही, समाज को यह भी सोचना होगा कि अपनी गौरवशाली विरासत को नई पीढ़ी तक कैसे पहुंचाया जाए, ताकि वे केवल डिजिटल दुनिया तक सीमित न रहें।
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