Jamshedpur News: हाल ही में सोशल मीडिया पर एआई (AI) द्वारा निर्मित एक तस्वीर ने दुनिया का ध्यान खींचा है-एक बंदर मछली की जान बचाने के लिए उसे ऑक्सीजन दे रहा है। यह तस्वीर हमें भीतर तक झकझोर देती है। यह हमें याद दिलाती है कि प्रकृति में हर जीव एक-दूसरे पर निर्भर है। जमशेदपुर की स्वर्णरेखा नदी और कदमा के तालाबों में पिछले दिनों ऑक्सीजन की कमी से मछलियों की मौत की खबरें अखबारों की सुर्खियां बनी थीं। वह मंजर इस बात का ट्रेलर था कि अगर हमने प्रकृति के साथ खिलवाड़ बंद नहीं किया, तो एक दिन इंसानों को भी इसी तरह सांसों के लिए जद्दोजहद करनी होगी।
ऑक्सीजन का संकट: मछली और इंसान एक ही नाव पर
मछली पानी के बिना नहीं रह सकती और इंसान ऑक्सीजन के बिना। हम अक्सर भूल जाते हैं कि जिस हवा में हम सांस ले रहे हैं, उसका कारखाना हमारे जंगल हैं। दलमा की पहाड़ियों से जो ताजी हवा शहर तक पहुंचती है, वह हमारे फेफड़ों की संजीवनी है। लेकिन जिस तरह जमशेदपुर और आसपास के जलस्रोतों में ऑक्सीजन का स्तर गिरा, वह एक चेतावनी है। यदि पेड़ों की कटाई इसी रफ्तार से जारी रही, तो धरती पर ऑक्सीजन का स्तर गिरेगा और हमारी स्थिति भी उन तड़पती हुई मछलियों जैसी हो जाएगी।
दलमा की तराई और शराब माफिया का काला साया
जमशेदपुर से सटे दलमा वन्यजीव अभयारण्य की तराई में स्थित फदलोगोड़ा, हलुदबनी, आसनबनी, पातीपानी और मिर्जाडीह जैसे गांव आज एक गंभीर संकट से जूझ रहे हैं। यहां शराब माफिया बेखौफ होकर जंगलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। शराब बनाने (चुलाई) के लिए वे कीमती पेड़ों को काटकर जलावन के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। यह सिर्फ पेड़ों की कटाई नहीं है, बल्कि उस पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) की हत्या है जो हमें जीवन देता है। हरे-भरे पहाड़ धीरे-धीरे गंजे हो रहे हैं, और इसकी सबसे बड़ी वजह ये अवैध गतिविधियां हैं।
वन विभाग की चुप्पी और जवाबदेही पर सवाल
यह विडंबना ही है कि जिस विभाग को वनों की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई है, उसकी आंखों के सामने यह सब हो रहा है। स्थानीय बुद्धिजीवियों का आक्रोश जायज है-वन अधिकारी केवल सरकारी नौकरी का समय पूरा कर रहे हैं या वाकई ड्यूटी कर रहे हैं? जब माफिया बेखौफ होकर जंगलों को उजाड़ रहे हों, तो विभाग की चुप्पी मिलीभगत या लापरवाही का संकेत देती है। उच्चाधिकारियों को इस पर तुरंत लगाम लगानी होगी, क्योंकि जंगल बचेगा तभी विभाग का अस्तित्व रहेगा और तभी हमारा भविष्य सुरक्षित होगा।
डर से ऊपर उठकर सामूहिक विरोध की जरूरत
दलमा से सटे गांवों के लोग डरे हुए हैं कि शराब माफिया का विरोध करने पर उन्हें खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। यह डर ही माफिया की ताकत है। लेकिन इतिहास गवाह है कि जब-जब समुदाय एक हुआ है, बड़े-बड़े बदलाव आए हैं। अब समय आ गया है कि गांवों में बैठकें हों और वनों की रक्षा के लिए 'ग्राम रक्षा दल' जैसी इकाइयां बनाई जाएं। जब गांव का हर व्यक्ति जागरूक होगा और सामूहिक रूप से विरोध करेगा, तो न माफिया की हिम्मत बढ़ेगी और न ही प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट पाएगा।
मनी प्लांट नहीं, वटवृक्ष की है जरूरत
अक्सर हम शहर के लोग अपने घरों के ड्राइंग रूम में 'मनी प्लांट' लगाकर यह सोच लेते हैं कि हमने पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा दी। लेकिन घर के भीतर का मनी प्लांट हमें वह ऑक्सीजन नहीं दे सकता जो बाहर का एक बरगद या नीम देता है। हमें 'बंद कमरों' के ज्ञान और एसी की ठंडी हवा से बाहर निकलना होगा। धरातल पर उतरकर पेड़ लगाने होंगे। रणनीति बनानी होगी कि किस इलाके में कौन से पौधे जीवित रह सकते हैं और उनकी देखभाल कैसे होगी। केवल पौधा लगाना काफी नहीं, उसे पेड़ बनाने तक का संकल्प लेना होगा।
'वसुधैव कुटुंबकम': धरती हमारा साझा परिवार है
हम अपने निजी परिवार के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं, उनके भविष्य के लिए पैसे जोड़ते हैं। लेकिन क्या हम उन्हें एक ऐसी दुनिया देकर जाना चाहते हैं जहाँ सांस लेना भी मुश्किल हो? यह धरती हमारा सबसे बड़ा परिवार है। सूर्य आज आग उगल रहा है, तापमान रिकॉर्ड तोड़ रहा है-यह प्रकृति का संदेश है। हमें यह सोचना बंद करना होगा कि पर्यावरण बचाने का काम 'किसी और' का है। यह काम हर उस व्यक्ति का है जो इस धरती पर पैदा हुआ है और इसका अनाज-पानी ग्रहण कर रहा है।
समाधान का रास्ता: जागरूकता से धरातल तक
आज जरूरत इस बात की है कि शहर और गांव के लोग मिलकर एक मुहिम चलाएं।
- स्कूलों और मोहल्लों में पर्यावरण सभाएं हों।
- खाली पड़ी सरकारी और निजी जमीनों पर स्थानीय प्रजातियों के पेड़ लगाए जाएं।
- सोशल मीडिया का उपयोग कर शराब माफिया और अवैध कटाई की पोल खोली जाए ताकि प्रशासन पर दबाव बने।
- जलस्रोतों को कचरे से मुक्त रखा जाए ताकि ऑक्सीजन का स्तर बना रहे।
Social Plugin