Jharkhand News: झारखंड की पावन धरा, यहाँ के हरे-भरे जंगल और समृद्ध आदिवासी परंपराएं हमेशा से अपनी अनूठी सांस्कृतिक विरासत के लिए जानी जाती रही हैं. सरहुल की उमंग हो, करम का उल्लास हो या फिर गांव-गांव में आयोजित होने वाले अखड़ा, बिना मांदर की थाप के झारखंड का कोई भी लोकनृत्य या उत्सव पूरा नहीं होता. अब इसी पारंपरिक वाद्ययंत्र 'मांदर' को 'Mandar of Jharkhand' के नाम से भौगोलिक संकेतक (GI Tag) मिल गया है. चेन्नई स्थित जीआई रजिस्ट्री द्वारा दी गई यह आधिकारिक मान्यता न केवल झारखंड की सदियों पुरानी कला और संस्कृति का सम्मान है, बल्कि राज्य के विकास परिदृश्य में एक नए और सकारात्मक अध्याय की शुरुआत भी है.
मांदर की मधुर थाप को मिली राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मान्यता
मांदर केवल मिट्टी और चमड़े से बना एक वाद्ययंत्र भर नहीं है, बल्कि यह झारखंड के लोकजीवन, सामुदायिक सद्भाव और सांस्कृतिक ताने-बाने की धड़कन है. जीआई टैग मिलने से अब मांदर को झारखंड की एक विशिष्ट भौगोलिक पहचान प्राप्त हो गई है. इसका सीधा अर्थ यह है कि अब विश्व मंच पर मांदर की मौलिकता और गुणवत्ता की रक्षा होगी. फर्जी या नकली निर्माण पर रोक लगेगी और झारखंड के इस गौरवशाली वाद्ययंत्र की कलात्मक साख पूरे देश और दुनिया में और अधिक मजबूत होगी.
गुमला के कारीगरों और मिट्टी के हुनर की जीत
इस ऐतिहासिक उपलब्धि के पीछे गुमला जिले के जरजट्टा गांव और रायडीह क्षेत्र के पारंपरिक कारीगरों की पीढ़ियों की साधना छुपी हुई है. local कच्चे माल, मिट्टी की खास बनावट और पारंपरिक निर्माण पद्धति के बल पर मांदर तैयार करने वाले इन कारीगरों के हुनर को अब सही सम्मान मिला है. 2023 में जिला प्रशासन और जीआई विशेषज्ञों के संयुक्त प्रयासों से शुरू हुई यह मुहिम आज रंग लाई है. जीआई टैग मिलने से इन कारीगरों का आर्थिक सशक्तीकरण होगा, उनके श्रम को सही मूल्य मिलेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा मिलेगी.
ऐतिहासिक प्रमाणों से सिद्ध हुआ सदियों पुराना सांस्कृतिक नाता
मांदर को जीआई पहचान दिलाने के लिए शरत चंद्र राय (1915), तारक चंद्र दास (1931) और डब्ल्यू. जी. आर्चर (1940) जैसे विद्वानों के शोध पत्रों और ऐतिहासिक अभिलेखों को आधार बनाया गया. एनयूएसआरएल (NUSRL) रांची के जीआई विशेषज्ञों के प्रयासों से यह साबित हुआ कि मांदर का संबंध झारखंड के सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास से अटूट है. यह तथ्य इस बात का प्रमाण है कि झारखंड की पारंपरिक कलाएं कागजों पर दर्ज इतिहास से भी कहीं अधिक प्राचीन और प्रामाणिक हैं.
युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा और सांस्कृतिक संरक्षण की नई राह
आधुनिकता के इस दौर में जहां पारंपरिक कलाएं और वाद्ययंत्र लुप्त होने की कगार पर पहुँच रहे थे, वहीं मांदर को मिला यह जीआई टैग राज्य की युवा पीढ़ी के लिए एक नई प्रेरणा लेकर आया है. अब युवा वर्ग अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने में अधिक गर्व महसूस करेगा. इस ऐतिहासिक फैसले से झारखंड में लोक कलाओं के संरक्षण, शोध और प्रशिक्षण के नए अवसर खुलेंगे, जिससे हमारी आने वाली पीढ़ियां भी अपनी समृद्ध विरासत पर गर्व कर सकेंगी.
सांस्कृतिक पर्यटन और 'ब्रांड झारखंड' के निर्माण को मिलेगी गति
मांदर को मिला जीआई टैग 'ब्रांड झारखंड' को मजबूत करने की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है. इससे राज्य में सांस्कृतिक और ग्रामीण पर्यटन (Ecotourism & Cultural Tourism) को भारी बढ़ावा मिलेगा. जब देश-विदेश के पर्यटक झारखंड आएंगे, तो वे यहाँ की मांदर संस्कृति से सीधे जुड़ सकेंगे। इसके साथ ही, स्थानीय हस्तशिल्प और संगीत उद्योग को वैश्विक बाजार उपलब्ध कराने में यह उपलब्धि एक मील का पत्थर साबित होगी, जो राज्य को समृद्धि और सम्मान की ओर ले जाएगी.
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