Jamshedpur News: बालीगुमा सुखना बस्ती स्थित करम अखाड़ा में बालीगुमा करम अखाड़ा कमिटी के तत्वावधान में करम पर्व पारंपरिक रीति-रिवाज, आस्था और उल्लास के साथ मनाया गया। कुड़माली कैलेंडर के अनुसार आयोजित इस पर्व में करम वृक्ष की पूजा-अर्चना की गई। इसके साथ ही करम गीत, झूमर और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हुआ। पर्व को लेकर करम अखाड़ा में लोगों की काफी भीड़ जुटी और पूरा परिसर पारंपरिक गीत-संगीत से गूंज उठा। करम पर्व आदिवासी और लोक जीवन में प्रकृति, कृषि और सामाजिक एकता से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। यह केवल पूजा-अर्चना और मनोरंजन का अवसर नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने तथा पूर्वजों की प्रकृति-केंद्रित जीवन-पद्धति को याद करने का भी पर्व है। आयोजन के दौरान लोगों ने अपनी सांस्कृतिक परंपराओं को बचाए रखने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का संदेश दिया।
प्रकृति और मानव जीवन के रिश्ते को समझने का संदेश
करम पर्व के माध्यम से प्रकृति संरक्षण का संदेश भी दिया गया। आयोजकों ने कहा कि मनुष्य का जीवन प्रकृति पर निर्भर है। धरती अन्न देती है, जंगल जीवनदायी संसाधन उपलब्ध कराते हैं, नदियां पानी देती हैं और पेड़-पौधे जीवन के लिए आवश्यक वातावरण तैयार करते हैं। ऐसे में प्रकृति का संरक्षण केवल पर्यावरण से जुड़ा विषय नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा दायित्व है। आयोजन में वक्ताओं ने कहा कि वर्तमान समय में जंगलों की कटाई, जलस्रोतों का विनाश, अनियोजित निर्माण और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन से पर्यावरणीय असंतुलन बढ़ रहा है। हाल में नेपाल में हुई प्राकृतिक त्रासदी ने भी प्रकृति के संतुलन और उसकी सीमाओं के प्रति संवेदनशील रहने की जरूरत को सामने रखा है। हालांकि प्राकृतिक आपदाओं के पीछे कई कारण होते हैं, लेकिन पर्यावरणीय क्षति और अनियोजित विकास कई परिस्थितियों में उनके प्रभाव को बढ़ा सकते हैं।
करम गीत और झूमर से सजी सांस्कृतिक संध्या
करम पर्व के अवसर पर बृहद झारखंड क्षेत्र के सुविख्यात झूमर कलाकार भोलानाथ महतो एवं राजदूत महतो ने करम गीतों और झूमर की शानदार प्रस्तुति दी। पारंपरिक गीतों और झूमर की प्रस्तुति ने वातावरण को पूरी तरह उत्सवमय बना दिया। उपस्थित लोगों ने कलाकारों की प्रस्तुतियों का आनंद लिया और पारंपरिक संस्कृति से जुड़े गीत-संगीत के साथ पर्व की खुशियां साझा कीं। आयोजन समिति की ओर से कहा गया कि करम गीत और झूमर केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि इनके माध्यम से समाज की जीवन-पद्धति, प्रकृति से जुड़ाव, कृषि संस्कृति और लोक परंपराओं की झलक मिलती है। ऐसे सांस्कृतिक आयोजनों से स्थानीय कला और कलाकारों को मंच मिलने के साथ युवाओं को भी अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत को समझने का अवसर मिलता है।
युवाओं को संस्कृति और प्रकृति से जोड़ने पर जोर
मुख्य आयोजक दिलीप कडुआर ने कहा कि करम पर्व हमारे पूर्वजों की उस जीवन-पद्धति का हिस्सा है, जिसमें प्रकृति को जीवन का आधार माना गया है। उन्होंने कहा कि आज जरूरत है कि पूर्वजों की इस सोच को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए। पेड़-पौधे, जंगल, जल, मिट्टी और खेती मानव जीवन के अभिन्न अंग हैं और इनके संरक्षण के बिना भविष्य सुरक्षित नहीं हो सकता। मुख्य आयोजक सरियान काडुआर ने कहा कि आधुनिक विकास के दौर में प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है। प्रकृति के साथ खिलवाड़ का असर पूरी मानव सभ्यता पर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि भाषा, संस्कृति, पर्व और जीवन-व्यवस्था प्रकृति से गहराई से जुड़ी हुई है। इसलिए जंगल, जमीन, जल और पर्यावरण की रक्षा करना सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि करम अखाड़ा जैसे आयोजन केवल पर्व मनाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनके माध्यम से लोक संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखने का प्रयास किया जाता है। विशेष रूप से युवाओं को अपनी भाषा, संस्कृति और प्रकृति से जोड़ना समय की जरूरत है। अंत में आयोजकों और उपस्थित लोगों ने जल, जंगल, जमीन और प्रकृति के संरक्षण के साथ लोक-संस्कृति एवं परंपराओं को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।
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