Vishwa Adivasi Diwas : बिष्टुपुर स्थित गोपाल मैदान में रविवार को विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर आदिवासी छात्र एकता के तत्वावधान में विशाल जनसभा का आयोजन किया गया। “अपनी पहचान को पहचानो” के संदेश के साथ आयोजित इस महाजुटान में कोल्हान समेत झारखंड के विभिन्न जिलों से बड़ी संख्या में आदिवासी युवा, छात्र-छात्राएं, शिक्षाविद, बुद्धिजीवी और पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था के प्रतिनिधि शामिल हुए। इसके अलावा बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और असम से भी लोग पहुंचे। पारंपरिक वेशभूषा, ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक अस्त्र-शस्त्रों के साथ पहुंचे लोगों ने आदिवासी समाज की सांस्कृतिक एकजुटता का प्रदर्शन किया। जनसभा में आदिवासी समाज के संवैधानिक अधिकारों, जल-जंगल-जमीन, शिक्षा, भाषा, संस्कृति और पहचान से जुड़े मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। सभा में विभिन्न वक्ताओं ने अधिकारों की रक्षा के लिए सामाजिक एकजुटता और संवैधानिक तरीके से संघर्ष जारी रखने का आह्वान किया।
गोपाल मैदान में दिखी आदिवासी समाज की सांस्कृतिक एकजुटता
विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर गोपाल मैदान में सुबह से ही आदिवासी समाज के लोगों का जुटना शुरू हो गया था। अलग-अलग क्षेत्रों से आए युवा पारंपरिक वेशभूषा में पहुंचे। ढोल-नगाड़ों की थाप और पारंपरिक उद्घोष से पूरा मैदान गूंजता रहा। कई लोग पारंपरिक अस्त्र-शस्त्र लेकर भी पहुंचे थे। इससे कार्यक्रम में आदिवासी समाज की पारंपरिक संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत की झलक दिखाई दी।
आयोजकों ने कहा कि कार्यक्रम का उद्देश्य केवल विश्व आदिवासी दिवस मनाना नहीं, बल्कि समाज की नई पीढ़ी को अपनी पहचान, इतिहास, भाषा, संस्कृति और संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक करना है। जनसभा में शामिल युवाओं ने सामाजिक एकता और अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संगठित होकर आगे बढ़ने का संदेश दिया। महाजुटान में कोल्हान के अलावा झारखंड के विभिन्न हिस्सों तथा बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और असम से आए प्रतिनिधियों की मौजूदगी ने कार्यक्रम को व्यापक स्वरूप दिया। छात्र-छात्राओं और युवाओं की बड़ी भागीदारी को कार्यक्रम की प्रमुख विशेषता बताया गया।
अन्याय के खिलाफ संघर्ष की आदिवासी परंपरा को किया याद
ट्राइबल एडवाइजरी काउंसिल के सदस्य सह आदिवासी छात्र एकता के मुख्य संरक्षक जोसाई मार्डी ने कहा कि आदिवासी समाज ने कभी अन्याय के आगे घुटने नहीं टेके हैं। उन्होंने कहा कि समाज अपने हक और अधिकार के लिए संघर्ष करता रहा है। जब तक पानी सिर से ऊपर नहीं हो जाता, आदिवासी समाज धैर्य रखता है, लेकिन अन्याय की सीमा पार होने पर वह संगठित होकर प्रतिरोध करता है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज का इतिहास शोषण के खिलाफ संघर्ष और बलिदान का इतिहास रहा है। जल, जंगल और जमीन पर अधिकार तथा अपनी सामाजिक व्यवस्था की रक्षा के लिए आदिवासियों ने विभिन्न दौर में संघर्ष किया है। उन्होंने कहा कि आज भी आदिवासी समाज के सामने जमीन, प्राकृतिक संसाधनों, भाषा, संस्कृति और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े सवाल मौजूद हैं। जोसाई मार्डी ने कहा कि आधुनिक दौर में भी आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन पर अधिकार को कमजोर करने की कोशिशें चिंता का विषय हैं। यदि समाज अपनी भाषा, संस्कृति, पहचान और संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं हुआ, तो आने वाली पीढ़ियों के सामने गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। उन्होंने कहा कि गोपाल मैदान का यह महाजुटान अपनी जड़ों और पहचान को समझने तथा अधिकारों के लिए नये सामाजिक व सांस्कृतिक आंदोलन की शुरुआत का संदेश देता है।
सरना धर्म कोड, पांचवीं अनुसूची और ग्रामसभा की सहमति की मांग
जनसभा में आदिवासी समाज की पहचान और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े कई मुद्दे प्रमुखता से उठाये गये। वक्ताओं ने प्रकृति पूजक आदिवासी समाज की विशिष्ट धार्मिक पहचान के लिए सरना धर्म कोड लागू कर संवैधानिक मान्यता देने की मांग की। इसके अलावा भूमि अधिग्रहण अधिनियम-2013 का सख्ती से पालन करने तथा अनुसूचित क्षेत्रों में किसी भी प्रकार के भूमि अधिग्रहण से पहले ग्रामसभा की सहमति अनिवार्य करने की मांग की गयी। सभा में देश के आदिवासी बहुल क्षेत्रों को संविधान के अनुच्छेद 244(1) के तहत पांचवीं अनुसूची के दायरे में शामिल करने की मांग भी उठी। वक्ताओं ने अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत और स्थानीय स्वशासन से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों के प्रभावी अनुपालन पर जोर दिया। इंद्र हेंब्रम ने कहा कि झारखंड में एनइपी के अचानक लागू होने से लाखों विद्यार्थियों के भविष्य पर असर पड़ा है। सरकार को इस मामले में अविलंब स्पष्ट और ठोस निर्णय लेना चाहिए। उन्होंने अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि अधिग्रहण के दौरान ग्रामसभा की भूमिका सुनिश्चित करने की मांग की।
असम के आदिवासियों को एसटी दर्जा और भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग
महिला नेत्री सुनीता कुंकल ने असम में कई पीढ़ियों से रह रहे संताल, हो, मुंडा और उरांव समुदाय के लोगों को संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मांग की। उन्होंने पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में आदिवासियों की जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा के लिए बनाये गये लैंड बैंक को रद्द करने की मांग की। उन्होंने झारखंड राज्य के निजी क्षेत्रों में स्थानीय उम्मीदवारों का नियोजन विधेयक-2021 को जल्द से जल्द धरातल पर लागू करने की बात कही। साथ ही हो, मुंडारी, भूमिज और कुड़ुख भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग उठायी। महिला नेत्री चुड़ामनी ने भी एनइपी को लेकर सरकार से स्पष्ट निर्णय लेने की मांग की। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए शिक्षा नीति से जुड़े विषयों पर न्यायसंगत निर्णय होना चाहिए। उन्होंने सरना धर्म कोड, ग्रामसभा की स्वायत्तता, लैंड बैंक रद्द करने, असम के टी-ट्राइब्स को एसटी दर्जा देने और पांचवीं अनुसूची के विस्तार की मांग को प्रमुखता से रखा।
शिक्षा, पहचान और अधिकारों के लिए अहिंसक संघर्ष जारी रखने का संकल्प
जनसभा में मौजूद युवाओं और प्रतिनिधियों ने आदिवासी समाज की भाषा, संस्कृति, परंपरा, जल-जंगल-जमीन और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट रहने का संकल्प लिया। सभा में कहा गया कि सामाजिक एकता और शिक्षा को समाज के विकास का प्रमुख आधार बनाया जाना चाहिए। युवाओं से अपने इतिहास और अधिकारों की जानकारी हासिल करने तथा सामाजिक चेतना को मजबूत करने का आह्वान किया गया। कार्यक्रम में हेमेंद्र हांसदा, सिधुराम किस्कू, नवीन मुर्मू, हरिमोहन टुडू, नंदलाल सरदार, राज बांकिरा, स्वपन सरदार, गुरुचरण सोरेन, सुनील माहली, किशोर मार्डी, बुद्धिराम मुर्मू, गांधी माहली, चांदराय मार्डी, सलमान मुर्मू, सारजोम मार्डी, प्रभाकर हांसदा, दुलाल हांसदा, मिथुन मुर्मू, कल्याण हांसदा, देवानंद सिंह, फागुराम हांसदा, सुरेश मुर्मू, प्रींस बास्के, सकला मार्डी, हरेन सिंह भूमिज, बिरसिंह टोपनो, सन्नी पूर्ति समेत बड़ी संख्या में आदिवासी युवा मौजूद थे। सभा के अंत में उपस्थित लोगों ने हाथ उठाकर अपनी भाषा, संस्कृति, पहचान, जल-जंगल-जमीन और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट रहने का संकल्प लिया। साथ ही अन्याय के खिलाफ अहिंसक और संवैधानिक तरीके से संघर्ष जारी रखने की बात कही गयी।
जनसभा की प्रमुख मांगें
- झारखंड में एनइपी को लेकर विद्यार्थियों के हित में स्पष्ट और ठोस निर्णय लिया जाये।
- प्रकृति पूजक आदिवासियों के लिए सरना धर्म कोड लागू कर संवैधानिक मान्यता दी जाये।
- भूमि अधिग्रहण अधिनियम-2013 का सख्ती से पालन हो।
- अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि अधिग्रहण से पहले ग्रामसभा की सहमति अनिवार्य की जाये।
- आदिवासी बहुल क्षेत्रों को संविधान के अनुच्छेद 244(1) के तहत पांचवीं अनुसूची में शामिल किया जाये।
- अनुसूचित क्षेत्रों में संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप ही स्थानीय निकाय चुनाव कराये जायें।
- असम में रह रहे संताल, हो, मुंडा और उरांव समुदाय को अनुच्छेद 342 के तहत एसटी सूची में शामिल किया जाये।
- पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में लैंड बैंक को रद्द किया जाये।
- झारखंड निजी क्षेत्र में स्थानीय उम्मीदवारों का नियोजन विधेयक-2021 को प्रभावी रूप से लागू किया जाये।
- हो, मुंडारी, भूमिज और कुड़ुख भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाये।
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