टीबी जांच में आई-ड्रोन पहल बनी गेमचेंजर
AI-Drone Technology: भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) की आई-ड्रोन (i-DRONE) पहल ने देश में टीबी (क्षय रोग) जांच की प्रक्रिया को नई दिशा दी है। आईसीएमआर द्वारा किए गए अध्ययन में यह सामने आया है कि ड्रोन के माध्यम से टीबी मरीजों के बलगम (स्पुटम) के नमूनों को जांच प्रयोगशालाओं तक पहुंचाने से जांच की पूरी प्रक्रिया पहले की तुलना में कहीं अधिक तेज, आसान और किफायती हो गई है। इसका सबसे अधिक लाभ दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को मिला है, जहां पहले जांच के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी। इस अध्ययन का उद्देश्य यह जानना था कि आधुनिक ड्रोन तकनीक का उपयोग स्वास्थ्य सेवाओं में किस प्रकार किया जा सकता है। परिणामों से स्पष्ट हुआ कि आई-ड्रोन पहल भविष्य में ग्रामीण और पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।
तेलंगाना के मुलुगु जिले में हुआ सफल अध्ययन
आईसीएमआर ने यह अध्ययन तेलंगाना के आदिवासी बहुल मुलुगु जिले में स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) बीबीनगर और राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन कार्यक्रम (एनटीईपी) के सहयोग से किया। अध्ययन में पहले से संचालित पारंपरिक व्यवस्था की तुलना ड्रोन आधारित नई व्यवस्था से की गई। नई प्रणाली के तहत मरीजों को स्वयं जिला अस्पताल या जांच केंद्र तक जाने की आवश्यकता नहीं रही। मरीजों ने अपने नजदीकी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या उप-स्वास्थ्य केंद्र में ही बलगम का नमूना जमा कराया। इसके बाद इन नमूनों को ड्रोन के माध्यम से निर्धारित टीबी जांच प्रयोगशाला तक पहुंचाया गया। इस मॉडल में 11 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, 60 उप-स्वास्थ्य केंद्र और तीन टीबी इकाइयों को आपस में जोड़ा गया। इससे गांवों और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों को स्वास्थ्य सेवाएं उनके घर के अधिक करीब उपलब्ध हो सकीं।
840 मरीजों पर अध्ययन, जांच का समय 15 दिन से घटकर 5 दिन
आईसीएमआर के अध्ययन में कुल 840 मरीजों को शामिल किया गया। शोध के नतीजे बेहद उत्साहजनक रहे। पहले जहां जांच की पूरी प्रक्रिया पूरी होने में औसतन 15 दिन लगते थे, वहीं ड्रोन आधारित व्यवस्था लागू होने के बाद यह समय घटकर केवल पांच दिन रह गया। समय में आई इस कमी का सबसे बड़ा फायदा मरीजों को मिला। टीबी जैसी गंभीर बीमारी में समय पर जांच और उपचार बेहद आवश्यक होता है। ड्रोन के जरिए नमूने तेजी से प्रयोगशाला तक पहुंचने लगे, जिससे रिपोर्ट जल्दी मिलने लगी और मरीजों का इलाज भी समय पर शुरू हो सका। इससे डॉक्टरों को भी बीमारी की पुष्टि करने और मरीजों के लिए उचित उपचार शुरू करने में आसानी हुई। समय पर इलाज मिलने से संक्रमण के प्रसार को रोकने में भी मदद मिलने की संभावना बढ़ गई है।
मरीजों का खर्च घटा, स्वास्थ्य सेवाएं हुईं अधिक सुलभ
अध्ययन में यह भी पाया गया कि ड्रोन तकनीक के इस्तेमाल से मरीजों का आर्थिक बोझ काफी कम हुआ। पहले जांच कराने के लिए मरीजों को यात्रा, मजदूरी के नुकसान और अन्य खर्चों सहित औसतन 9,451 रुपये तक खर्च करने पड़ते थे। ड्रोन आधारित व्यवस्था लागू होने के बाद यह खर्च घटकर औसतन केवल 91 रुपये रह गया। कई मरीजों को जांच के लिए किसी प्रकार की यात्रा भी नहीं करनी पड़ी क्योंकि वे अपने गांव के नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पर ही नमूना जमा कर सके। इस व्यवस्था से विशेष रूप से गरीब, आदिवासी और दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों को बड़ी राहत मिली। जांच के लिए शहरों तक आने-जाने की आवश्यकता कम होने से उनका समय और पैसा दोनों बचे।
विशेषज्ञों ने बताया भविष्य की स्वास्थ्य व्यवस्था का मजबूत मॉडल
आईसीएमआर के अनुसंधान विभाग के सचिव डॉ. रजिव बहल ने कहा कि समय पर और किफायती जांच सुविधा उपलब्ध कराना भारत से टीबी समाप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उनका मानना है कि आधुनिक तकनीक की मदद से भौगोलिक कठिनाइयों को दूर किया जा सकता है और दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों तक स्वास्थ्य सेवाएं तेजी से पहुंचाई जा सकती हैं। हालांकि विशेषज्ञों ने यह भी सुझाव दिया कि इस व्यवस्था को बड़े स्तर पर लागू करने से पहले ड्रोन की भार क्षमता, मौसम की परिस्थितियों और ड्रोन संचालन से जुड़े कर्मचारियों के नियमित प्रशिक्षण जैसे पहलुओं पर विशेष ध्यान देना होगा। इन चुनौतियों का समाधान कर लिया जाए तो ड्रोन आधारित स्वास्थ्य सेवाएं देशभर में प्रभावी साबित हो सकती हैं।
टीबी उन्मूलन अभियान को मिलेगी नई गति
आई-ड्रोन पहल का यह अध्ययन केवल टीबी जांच तक सीमित नहीं है। इससे यह भी संकेत मिला है कि भविष्य में ड्रोन का उपयोग दवाइयों, टीकों, रक्त, जांच नमूनों और अन्य आवश्यक चिकित्सा सामग्री को तेजी से पहुंचाने में किया जा सकता है। भारत सरकार पहले ही वर्ष 2025 तक टीबी उन्मूलन का लक्ष्य लेकर कार्य कर रही है। ऐसे में आई-ड्रोन जैसी तकनीक इस अभियान को नई गति देने में अहम भूमिका निभा सकती है। खासकर पहाड़ी, जंगल और दुर्गम क्षेत्रों में जहां स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना चुनौतीपूर्ण होता है, वहां ड्रोन आधारित मॉडल स्वास्थ्य व्यवस्था को अधिक मजबूत और प्रभावी बना सकता है। आईसीएमआर का यह अध्ययन इस बात का प्रमाण है कि आधुनिक तकनीक का सही उपयोग स्वास्थ्य सेवाओं में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है। आने वाले समय में यदि इस मॉडल को देशभर में व्यापक रूप से लागू किया जाता है, तो लाखों लोगों को तेज, सस्ती और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ मिल सकेगा।
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