Jamshedpur News : राज्य सरकार द्वारा आदिम जनजाति (सबर) समुदाय के मरीजों को सरकारी अस्पतालों में विशेष सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रावधान है। इसके बावजूद जमशेदपुर के एमजीएम अस्पताल में एक सबर परिवार ने इलाज में गंभीर लापरवाही और सरकारी सुविधाओं से वंचित किए जाने का आरोप लगाया है। परिजनों का कहना है कि समय पर इलाज और उचित चिकित्सा नहीं मिलने के कारण मरीज की मौत हो गई। मामले को लेकर भाजपा नेता विमल बैठा ने अस्पताल अधीक्षक से मिलकर जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है।
सबर मरीज को विशेष सुविधा नहीं मिलने का आरोप
मुसाबनी प्रखंड के गोहला गांव निवासी सुरु सबर ने बताया कि उनके 51 वर्षीय पिता शिव सबर की तबीयत अचानक बिगड़ने के बाद उन्हें शुक्रवार शाम करीब चार बजे उच्च रक्तचाप और कमजोरी की शिकायत के साथ एमजीएम अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इससे पहले उनका इलाज मुसाबनी के सीएचसी केंद्र में चल रहा था। सुरु सबर का आरोप है कि राज्य सरकार के निर्देशों के अनुसार आदिम जनजाति समुदाय के मरीजों को सरकारी अस्पतालों में विशेष सहायता और सुविधा मिलनी चाहिए थी, लेकिन अस्पताल में उन्हें किसी प्रकार की विशेष व्यवस्था नहीं दी गई। उनका कहना है कि यदि पहले से अस्पताल की स्थिति का अंदाजा होता, तो वे अपने पिता को एमजीएम अस्पताल लेकर नहीं आते।
समय पर डॉक्टर नहीं पहुंचे, इलाज में देरी का आरोप
परिजनों के अनुसार भर्ती के बाद शुक्रवार को डॉक्टर ने मरीज को देखकर दवा और स्लाइन शुरू करवाई। शनिवार सुबह भी डॉक्टर ने एक बार मरीज का निरीक्षण किया, लेकिन दोपहर में तबीयत बिगड़ने के बाद कई बार बुलाने के बावजूद कोई चिकित्सक मरीज को देखने नहीं पहुंचा। सुरु सबर का आरोप है कि समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण उनके पिता की हालत लगातार बिगड़ती गई और अंततः उन्होंने दम तोड़ दिया। उनका कहना है कि यदि चिकित्सकों ने समय रहते इलाज किया होता तो शायद उनके पिता की जान बचाई जा सकती थी। परिवार ने अस्पताल प्रशासन पर संवेदनहीनता का आरोप लगाते हुए कहा कि मरीज की गंभीर स्थिति के बावजूद आवश्यक तत्परता नहीं दिखाई गई।
जांच के नाम पर मांगे गए पैसे, सरकारी सुविधा का नहीं मिला लाभ
सुरु सबर ने बताया कि डॉक्टर ने एक्स-रे कराने की सलाह दी थी। जब वे जांच कराने पहुंचे तो उनसे एक हजार रुपये जमा करने के लिए कहा गया। उन्होंने कर्मचारियों को बताया कि मरीज सबर समुदाय से है और सरकार की विशेष सुविधा का लाभ मिलना चाहिए, लेकिन इसके बावजूद कोई राहत नहीं दी गई। आर्थिक तंगी के कारण वे जांच नहीं करा सके। बाद में डॉक्टरों ने यह कहा कि समय पर जांच नहीं होने से इलाज प्रभावित हुआ। परिजनों का कहना है कि यदि अस्पताल प्रशासन ने सरकारी प्रावधानों के अनुसार निशुल्क सुविधा उपलब्ध कराई होती, तो जांच समय पर हो सकती थी। इसी मुद्दे को लेकर शनिवार शाम भाजपा नेता विमल बैठा के साथ परिजन अस्पताल अधीक्षक डॉ. बलराम झा से मिले और पूरे मामले की शिकायत दर्ज कराई। अधीक्षक ने मामले की जांच के लिए उपाधीक्षक को निर्देश दिए।
परिजनों ने अस्पताल की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल
सुरु सबर ने अस्पताल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि मरीज के परिजनों को यह जानकारी ही नहीं दी गई कि निशुल्क जांच कराने के लिए किस अधिकारी से अनुमति लेनी है या किस प्रक्रिया का पालन करना होगा। उनका कहना है कि अस्पताल में मरीजों और उनके परिजनों को उचित मार्गदर्शन नहीं दिया जाता, जिससे गरीब और ग्रामीण परिवारों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। उन्होंने राज्य सरकार से मांग की कि आदिम जनजाति समुदाय के मरीजों के लिए अस्पतालों में स्पष्ट व्यवस्था बनाई जाए ताकि भविष्य में किसी अन्य परिवार को ऐसी कठिन परिस्थितियों का सामना न करना पड़े।
मौत के बाद भी ऑक्सीजन मास्क लगाए रखने का आरोप
परिजनों ने एक और गंभीर आरोप लगाया कि मरीज की मौत दोपहर करीब दो बजे हो चुकी थी, लेकिन शाम लगभग पांच बजे तक उनके चेहरे पर ऑक्सीजन मास्क लगा रहा। उनका कहना है कि एक मीडियाकर्मी के हस्तक्षेप के बाद ही नर्स ने ऑक्सीजन मास्क हटाया। इस घटना को लेकर परिजनों ने अस्पताल प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि पूरे मामले की जांच कर दोषी कर्मचारियों और चिकित्सकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।
अस्पताल प्रशासन ने आरोपों को किया खारिज
एमजीएम अस्पताल के अधीक्षक डॉ. बलराम झा ने कहा कि यदि परिजन वार्ड बॉय के माध्यम से जानकारी देते तो निशुल्क जांच की प्रक्रिया पूरी कराई जा सकती थी। उन्होंने बताया कि मामले की जांच के निर्देश दिए गए हैं। वहीं, अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ. नारायण उरांव ने परिजनों द्वारा लगाए गए कई आरोपों को गलत बताया। उन्होंने कहा कि मरीज की मृत्यु गंभीर एनीमिया और लीवर संबंधी बीमारी के कारण हुई। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मरीज को केवल एक्स-रे नहीं बल्कि सीटी स्कैन कराने की सलाह दी गई थी। हालांकि इस पूरे मामले ने सरकारी अस्पतालों में आदिम जनजाति समुदाय के मरीजों को मिलने वाली सुविधाओं, इलाज की गुणवत्ता और अस्पताल प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। अब सभी की नजर प्रशासनिक जांच पर टिकी है कि जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं और दोषियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाती है।
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