झारखंड के ग्रामीण इलाकों में बढ़ा पर्यावरणीय संकट

Jamshedpur News: विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर पर्यावरण संरक्षण की चर्चा पूरे देश में हो रही है, लेकिन झारखंड के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में यह विषय केवल जागरूकता तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों के अस्तित्व और आजीविका से सीधे जुड़ा हुआ है। यहां के गांवों में जल, जंगल और जमीन जीवन का आधार हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में तेजी से हो रही वनों की कटाई ने ग्रामीण जीवन को गंभीर संकट में डाल दिया है। जंगलों के कम होने का असर केवल पर्यावरण पर ही नहीं, बल्कि खेती, जलस्रोत, पशुपालन और पारंपरिक रोजगार पर भी दिखाई देने लगा है। ग्रामीणों का कहना है कि पहले जहां जंगलों में हरियाली और प्राकृतिक संसाधनों की भरमार थी, वहीं अब कई इलाकों में बंजर भूमि और सूखे जलस्रोत देखने को मिल रहे हैं। इससे गांवों की आर्थिक और सामाजिक संरचना भी प्रभावित हो रही है।


सूखते जलस्रोत और खेती पर गहराता संकट

वनों की कटाई का सबसे बड़ा प्रभाव जलस्रोतों पर पड़ा है। जंगल प्राकृतिक रूप से वर्षा जल को संरक्षित करते हैं और भूजल स्तर को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन पेड़ों की संख्या कम होने से नदियां, तालाब, कुएं और प्राकृतिक झरने तेजी से सूखने लगे हैं। ग्रामीणों के अनुसार पहले कई जलस्रोत सालभर पानी से भरे रहते थे, लेकिन अब गर्मी शुरू होते ही पानी की कमी होने लगती है। इसका सीधा असर खेती पर पड़ रहा है। सिंचाई के पर्याप्त साधन नहीं होने के कारण किसान अब केवल मानसून आधारित खेती करने को मजबूर हैं। कई इलाकों में साल में दो या तीन फसलें लेने वाले किसान अब एक ही फसल तक सीमित हो गए हैं, जिससे उनकी आय में भी भारी गिरावट आई है।

पारंपरिक आजीविका के साधनों पर पड़ा असर

आदिवासी और ग्रामीण समुदाय सदियों से जंगलों पर निर्भर रहे हैं। महुआ, चिरौंजी, दातून, पत्ते, शहद, जड़ी-बूटियां और अन्य वन उत्पाद उनकी आय के प्रमुख स्रोत रहे हैं। इन उत्पादों की बिक्री से ग्रामीण परिवारों को अतिरिक्त आमदनी मिलती थी। लेकिन वन क्षेत्र कम होने के कारण इन संसाधनों की उपलब्धता भी घटती जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि पहले जंगलों से मिलने वाले उत्पादों के जरिए पूरे साल का खर्च निकल जाता था, लेकिन अब उनकी मात्रा इतनी कम हो गई है कि परिवारों की आर्थिक स्थिति प्रभावित होने लगी है। इससे ग्रामीणों के सामने रोजगार और आय का संकट भी बढ़ता जा रहा है।

मदन मोहन सोरेन ने शुरू किया ‘कुल्हाड़ी बंद’ अभियान

बालीगुमा खिकड़ीघुटू निवासी और पर्यावरण प्रेमी मदन मोहन सोरेन जंगल संरक्षण के लिए लगातार काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि उनके पूर्वजों के समय में जंगल इतने घने थे कि जलस्रोत कभी नहीं सूखते थे। लेकिन वर्तमान में पेड़ों की कटाई ने प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ दिया है। इस समस्या को देखते हुए उन्होंने ग्रामीणों के सहयोग से “कुल्हाड़ी बंद” नियम लागू कराया है। इस नियम के तहत गांव और आसपास के क्षेत्रों में हरे पेड़ों की कटाई पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। कोई भी व्यक्ति बिना अनुमति के पेड़ नहीं काट सकता। ग्रामीण केवल सूखी लकड़ियों और गिरे हुए पत्तों का उपयोग करते हैं। मदन मोहन सोरेन का मानना है कि यदि प्रत्येक गांव इस तरह के नियम लागू करे तो जंगलों को बचाया जा सकता है। इसके साथ ही उन्होंने आदिवासी आस्था केंद्र जाहेरथान के आसपास सखुआ, महुआ और औषधीय पौधों का रोपण भी शुरू किया है।

लाठी पहरा परंपरा से जंगलों की हो रही सुरक्षा

डालापानी निवासी किंकर महतो का मानना है कि जंगल केवल पर्यावरण का हिस्सा नहीं बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। उन्होंने बताया कि जंगलों के कम होने से महुआ, चिरौंजी और दातून जैसे उत्पादों से होने वाली आय भी घट गई है। नए पौधों की सुरक्षा भी एक बड़ी चुनौती थी क्योंकि आवारा पशु और अनियंत्रित चराई पौधों को नुकसान पहुंचाते थे। इस समस्या के समाधान के लिए ग्राम सभा ने पारंपरिक “लाठी पहरा” व्यवस्था को फिर से शुरू किया है। इस व्यवस्था के तहत गांव के पुरुष और महिलाएं बारी-बारी से जंगलों और नए लगाए गए पौधों की निगरानी करते हैं। पहरा देने वाले लोग जंगल में अवैध कटाई, आगजनी और पशुओं से होने वाले नुकसान को रोकते हैं। इस सामूहिक प्रयास का सकारात्मक परिणाम सामने आया है और आसपास के क्षेत्रों में नए पौधों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।

जन-वानिकी अभियान से बंजर भूमि बन रही हरी-भरी

डालापानी पंचायत के पूर्व मुखिया दुर्लभ बेसरा पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय हैं। उनका कहना है कि जंगलों का विनाश केवल पर्यावरण को नहीं बल्कि आदिवासी संस्कृति और परंपराओं को भी प्रभावित कर रहा है। उन्होंने बताया कि जंगली फल, कंद-मूल और कई पारंपरिक वन उत्पाद अब धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे हैं। इसे देखते हुए उन्होंने पंचायत क्षेत्र में जन-वानिकी अभियान शुरू किया है। इसके तहत सरकारी और सामुदायिक बंजर भूमि पर बड़े पैमाने पर पौधरोपण किया जा रहा है। हर वर्ष मानसून के दौरान ग्रामीणों की भागीदारी से साल, महुआ और करंज जैसे स्थानीय प्रजातियों के सैकड़ों पौधे लगाए जाते हैं। पौधों की सुरक्षा के लिए घेराबंदी और नियमित निगरानी भी की जाती है ताकि उनका विकास सुनिश्चित हो सके।

पर्यावरण संरक्षण में आदिवासी परंपराओं की अहम भूमिका

आदिवासी समाज का प्रकृति से गहरा रिश्ता रहा है। उनके त्योहार, धार्मिक अनुष्ठान और सामाजिक परंपराएं जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ी होती हैं। यही कारण है कि आदिवासी समुदाय पर्यावरण संरक्षण को केवल एक अभियान नहीं बल्कि अपनी संस्कृति का हिस्सा मानता है।जाहेरथान, सरना स्थल और अन्य पारंपरिक पूजा स्थलों के आसपास पेड़ों की रक्षा की परंपरा सदियों से चली आ रही है। आज जब पर्यावरणीय संकट बढ़ रहा है, तब यही परंपराएं आधुनिक संरक्षण प्रयासों को मजबूती प्रदान कर रही हैं। ग्रामीणों का मानना है कि यदि स्थानीय समुदायों को संरक्षण की जिम्मेदारी दी जाए तो जंगलों को बचाने में बड़ी सफलता मिल सकती है।

हर परिवार एक पेड़ अपनाए तो बदलेगी तस्वीर

पर्यावरण विशेषज्ञों और स्थानीय ग्रामीणों का मानना है कि केवल सरकारी योजनाओं से जंगलों को बचाना संभव नहीं है। इसके लिए जनभागीदारी सबसे महत्वपूर्ण है। दुर्लभ बेसरा का कहना है कि जब तक हर परिवार कम से कम एक पेड़ को गोद लेकर उसकी देखभाल नहीं करेगा, तब तक पर्यावरण संरक्षण के प्रयास अधूरे रहेंगे। विश्व पर्यावरण दिवस पर झारखंड के ग्रामीण और आदिवासी समुदायों द्वारा चलाए जा रहे ये प्रयास पूरे समाज के लिए प्रेरणा हैं। कुल्हाड़ी बंद अभियान, लाठी पहरा व्यवस्था और जन-वानिकी जैसे कदम यह साबित करते हैं कि यदि समुदाय संगठित होकर काम करे तो पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना किया जा सकता है। जंगलों का संरक्षण केवल पेड़ों को बचाने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए जल, शुद्ध हवा, जैव विविधता और सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। आज आवश्यकता है कि समाज का हर वर्ग इन प्रयासों से प्रेरणा लेकर प्रकृति संरक्षण की जिम्मेदारी को अपने जीवन का हिस्सा बनाए।