Potka News : झारखंड का आदिवासी बहुल क्षेत्र पोटका इन दिनों एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। कभी विकास की मुख्यधारा से दूर समझा जाने वाला यह क्षेत्र अब धीरे-धीरे 'एजुकेशन हब' के रूप में अपनी पहचान बना रहा है। कई प्रतिष्ठित निजी शिक्षण संस्थान अब ग्रामीण बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के उद्देश्य से पोटका का रुख कर रहे हैं। लेकिन, विडंबना यह है कि जहाँ एक ओर बड़े-बड़े संस्थान आ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर प्रशासन की शिथिलता के कारण बुनियादी सड़कें दम तोड़ रही हैं।
विकास की राह में रोड़ा: तेतला-बड़ा बंधवा मुख्य मार्ग
पोटका के तेतला पंचायत से बड़ा बंधवा को जोड़ने वाली सड़क प्रशासन की अनदेखी का जीवंत प्रमाण बन गई है। यह सड़क केवल दो गांवों को नहीं जोड़ती, बल्कि क्षेत्र के शैक्षणिक और आर्थिक विकास की जीवनरेखा है। वर्षों से लंबित इस सड़क के निर्माण न होने से स्थानीय ग्रामीणों में भारी रोष है। ग्रामीणों का कहना है कि एक तरफ सरकार विकास के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी ओर धरातल पर स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है।
पुलिया तैयार, पर सड़क का अता-पता नहीं
हैरानी की बात यह है कि इस मार्ग पर पड़ने वाले नदी-नालों पर पुलिया का निर्माण लगभग पूर्ण हो चुका है। तकनीकी रूप से जब पुलिया बन जाती है, तो उम्मीद की जाती है कि सड़क का काम भी जल्द पूरा होगा। लेकिन यहाँ कहानी उलटी है। पुलिया खड़ी है, पर उसे जोड़ने वाली सड़क गायब है। यह स्थिति न केवल सरकारी धन के दुरुपयोग को दर्शाती है, बल्कि योजना निर्माण में तालमेल की कमी को भी उजागर करती है।
एजुकेशन हब के सपने पर भारी 'कीचड़'
इस बदहाल सड़क पर एक प्रतिष्ठित स्कूल भी स्थित है। पोटका के 'एजुकेशन हब' बनने की राह में सबसे बड़ी बाधा यही बुनियादी ढांचा है। स्कूल बसें और सैकड़ों छात्र प्रतिदिन इसी ऊबड़-खाबड़ रास्ते से गुजरते हैं। शिक्षा जैसे पवित्र कार्य के लिए आने वाले बच्चों को हर दिन धूल और कीचड़ से दो-चार होना पड़ता है। जब शिक्षण संस्थानों तक पहुँचने का मार्ग ही सुरक्षित न हो, तो क्षेत्र के विकास की कल्पना कैसे की जा सकती है?
भारी वाहनों के परिचालन से बढ़ी समस्या
स्थानीय लोगों के अनुसार, इस मार्ग पर केवल छोटी गाड़ियां ही नहीं, बल्कि बड़े डंपर और भारी वाहनों का भी निरंतर परिचालन होता है। इन भारी वाहनों के दबाव के कारण सड़क पर बड़े-बड़े गड्ढे बन गए हैं। स्कूल प्रबंधन और ग्रामीणों द्वारा समय-समय पर चंदा इकट्ठा कर पत्थर और मिट्टी डालकर सड़क को चलने लायक बनाया जाता है, लेकिन भारी डंपरों के गुजरते ही स्थिति फिर जस की तस हो जाती है। यह 'पैच वर्क' बारिश की एक बूंद भी नहीं झेल पाता।
बारिश में टापू बन जाते हैं गांव
मानसून का मौसम आते ही इस क्षेत्र की मुश्किलें कई गुना बढ़ जाती हैं। जलजमाव के कारण सड़कें तालाब का रूप ले लेती हैं। गड्ढों में पानी भर जाने से गहराई का अंदाजा नहीं लग पाता, जिससे आए दिन दुर्घटनाएं होती रहती हैं। स्थानीय ग्रामीण अनिल सरदार बताते हैं कि यह सड़क तेतला से बड़ा बंधवा होते हुए सीधे पोटका को जोड़ती है, लेकिन बारिश में इस पर चलना जान जोखिम में डालने जैसा है। बुजुर्गों और बीमारों को अस्पताल ले जाना एक बड़ी चुनौती बन जाता है।
फाइलों में दबी जनसुनवाई और अनुशंसा
सड़क निर्माण के लिए ग्रामीण हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठे हैं। ग्रामीणों द्वारा हस्ताक्षर युक्त आवेदन उपायुक्त को सौंपा जा चुका है। इतना ही नहीं, स्थानीय विधायक ने भी इस सड़क के निर्माण हेतु अपनी अनुशंसा दी है। बावजूद इसके, प्रशासनिक फाइलें आगे नहीं बढ़ रही हैं। प्रशासन की यह निष्क्रियता दर्शाती है कि आम जनता की समस्याओं के प्रति सिस्टम कितना संवेदनहीन हो चुका है।
ग्रामीणों की चेतावनी: जल्द समाधान न हुआ तो होगा आंदोलन
पोटका के ग्रामीण अब लंबे इंतजार के मूड में नहीं हैं। पिछले कई सालों से केवल आश्वासन ही उनके हाथ लगा है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि यदि प्रशासन ने जल्द ही इस सड़क का निर्माण शुरू नहीं कराया, तो वे उग्र आंदोलन को बाध्य होंगे। शिक्षा के केंद्र के रूप में विकसित हो रहे पोटका को बचाने और ग्रामीणों के सुरक्षित आवागमन के लिए इस सड़क का बनना अनिवार्य है।
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