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Majhi pargana mahal: नियमावली लागू करने की मांग तेज, पारंपरिक अगुवाओं ने उपायुक्त को सौंपा ज्ञापन

Majhi pargana mahal: पूर्वी सिंहभूम जिले में पेसा नियमावली 2025 के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था के अगुवाओं ने अपनी आवाज बुलंद की है। दिनांक 7 अप्रैल 2026 को माझी पारगना माहाल के प्रतिनिधियों ने देश पारगना बाबा बैजू मुर्मू के नेतृत्व में उपायुक्त पूर्वी सिंहभूम को एक महत्वपूर्ण ज्ञापन सौंपा। इस ज्ञापन में गांवों में पेसा नियमावली को विधिवत प्रक्रिया के तहत जल्द से जल्द लागू करने की मांग की गई है। प्रतिनिधियों ने कहा कि यह नियमावली अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिसे जमीनी स्तर पर सही तरीके से लागू करना जरूरी है।

राज्यपाल की स्वीकृति के बाद भी जमीनी क्रियान्वयन में देरी

ज्ञापन में उल्लेख किया गया कि पेसा नियमावली 2025 को 2 जनवरी 2026 को राज्यपाल के हस्ताक्षर के बाद झारखंड के पांचवीं अनुसूचित क्षेत्रों में लागू कर दिया गया है। इसके बावजूद अब तक कई स्थानों पर इसका प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो पाया है। प्रतिनिधियों ने चिंता जताते हुए कहा कि यदि समय रहते आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी नहीं की गईं, तो ग्राम सभाओं के संचालन में बाधाएं उत्पन्न हो सकती हैं। उन्होंने प्रशासन से आग्रह किया कि नियमावली के प्रावधानों के अनुसार कार्यों को प्राथमिकता के आधार पर पूरा किया जाए।

ग्राम सभा के सिमांकन और सत्यापन में पारंपरिक अगुवाओं की भागीदारी जरूरी

ज्ञापन में स्पष्ट रूप से मांग की गई है कि पेसा नियमावली के अध्याय-2 के तहत ग्राम सभा के सिमांकन, सत्यापन और प्रकाशन की जिम्मेदारी उपायुक्त को दी गई है। इस प्रक्रिया को पारदर्शी और प्रभावी बनाने के लिए प्रखंड स्तर पर गठित टीम में पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था के अगुवाओं—परगना बाबा, मानकी बाबा, हातु मुंडा और माझी बाबा—को शामिल किया जाए। प्रतिनिधियों का कहना है कि स्थानीय सामाजिक संरचना और परंपराओं की समझ इन्हीं अगुवाओं के पास होती है, जिससे ग्राम सभा की सही पहचान और संचालन सुनिश्चित हो सकेगा।

ग्राम सभा की अध्यक्षता पर स्पष्ट दिशा-निर्देश की मांग

पारंपरिक नेताओं ने पेसा नियमावली के अध्याय-3 धारा 7 का हवाला देते हुए मांग की कि ग्राम सभा की अध्यक्षता केवल अनुसूचित जनजाति के पारंपरिक पदधारियों द्वारा ही की जानी चाहिए। इनमें माझी बाबा, पारगना बाबा, हातु मुंडा और मानकी बाबा जैसे पद शामिल हैं। उन्होंने यह भी मांग रखी कि गैर-आदिवासी ग्राम प्रधानों को ग्राम सभा की अध्यक्षता से रोका जाए, ताकि पेसा कानून की मूल भावना को बरकरार रखा जा सके और आदिवासी समुदाय की स्वायत्तता सुरक्षित रह सके।

प्रशिक्षण और प्रशासनिक आदेश की जरूरत पर जोर

ज्ञापन में यह भी कहा गया कि पंचायत राज विभाग के निर्देशों के अनुरूप पेसा नियमावली को लागू करने के लिए प्रखंड पंचायत राज पदाधिकारियों के साथ-साथ पारंपरिक अगुवाओं को भी औपचारिक आदेश पत्र जारी किया जाए। इसके अलावा, नियमावली के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए योग्य पारंपरिक अगुवाओं को प्रशिक्षक (ट्रेनर) बनाया जाए। इससे वे स्थानीय भाषा में अन्य लोगों को प्रशिक्षण दे सकेंगे और ग्राम सभाओं का संचालन सुचारू रूप से हो सकेगा। प्रतिनिधियों का मानना है कि प्रशिक्षण की यह प्रक्रिया जमीनी स्तर पर जागरूकता और समझ को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएगी।

ग्राम सभा आयोजन से पहले प्रक्रिया पूरी करने की मांग

ज्ञापन में सहायक निदेशक, पंचायत राज निदेशालय द्वारा जारी पत्र का हवाला देते हुए कहा गया कि ग्राम सभा स्तर पर आवश्यक संस्थागत व्यवस्थाओं को लागू करते हुए 25 अप्रैल 2026 तक ग्राम सभाओं के आयोजन का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। हालांकि, प्रतिनिधियों ने मांग की कि जब तक पेसा नियमावली के तहत ग्राम सभाओं का सिमांकन, सत्यापन और प्रकाशन विधिवत पूरा नहीं हो जाता, तब तक अन्य प्रक्रियाओं को स्थगित रखा जाए। इससे भविष्य में किसी भी प्रकार की प्रशासनिक या सामाजिक जटिलता से बचा जा सकेगा।

इन प्रतिनिधियों ने की उपायुक्त से मुलाकात

उपायुक्त से मिलने पहुंचे प्रतिनिधिमंडल में माझी बाबा दुर्गा चरन मुर्मू, दीपक मुर्मू, पद्मावती हेंब्रम, बिंदु सोरेन, कारु मुर्मू, मर्शाल मुर्मू, यादव टुडू, डेमका सोय और सुनिल मुर्मू सहित कई पारंपरिक अगुवा शामिल थे। सभी ने एक स्वर में पेसा नियमावली को जल्द लागू करने की मांग दोहराई और प्रशासन से सकारात्मक पहल की उम्मीद जताई।

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