जिम्मेदारी का असंतुलन: घर की धुरी बनीं महिलाएं
आज आदिवासी समाज के गांवों में जाकर देखें, तो परिवार को पालने की पूरी जवाबदेही महिलाओं के कोमल कंधों पर आ गई है। घर की सफाई, खाना बनाना और पानी भरने जैसे पारंपरिक कार्यों के अलावा, अब बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और घर के राशन का इंतजाम भी महिलाएं ही कर रही हैं। वे न केवल खेतों में पसीना बहा रही हैं, बल्कि हाट-बाजारों में सामान बेचना हो या मनरेगा जैसे कार्यों में मजदूरी करना, हर जगह उनकी सक्रियता बढ़ी है। ऐसा प्रतीत होता है कि 'परिवार' शब्द अब केवल महिलाओं की मेहनत का पर्यायवाची बनकर रह गया है।
पुरुषों का 'आराम' और सामूहिक गैर-जिम्मेदारी
शहर के आसपास के बस्तियों और गांवों में दोपहर के समय का दृश्य काफी विचलित करने वाला होता है। जहाँ महिलाएं काम पर गई होती हैं, वहीं पुरुष पेड़ों की छांव में या किसी चबूतरे पर 'बेकार' बैठे नजर आते हैं। यह केवल शारीरिक आराम नहीं है, बल्कि मानसिक रूप से अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेना है। एक धारणा सी बन गई है कि पुरुषों ने अपना काम पूरा कर लिया है और अब घर चलाने की बारी महिलाओं की है। यह आलस्य और अनुत्तरदायी व्यवहार समाज की कार्यक्षमता को दीमक की तरह चाट रहा है।
जुआ और नशा: बर्बादी के दो मुख्य द्वार
समाज की इस दुर्दशा के पीछे दो सबसे बड़े कारण हैं—जुआ और शराब। वह समय जो परिवार के भविष्य निर्माण या रचनात्मक कार्यों में लगना चाहिए था, वह ताश के पत्तों और शराब की बोतलों की भेंट चढ़ रहा है। गांवों में जुआ खेलना अब केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक लत बन चुका है। जो पुरुष जुए की फड़ पर नहीं मिलते, वे शराब के नशे में डूबे हुए मिलते हैं। नशे की यह गिरफ्त पुरुषों को न केवल शारीरिक रूप से कमजोर कर रही है, बल्कि उन्हें अपने बच्चों के प्रति उनके कर्तव्यों से भी विमुख कर रही है।
सच बोलने का साहस और सामाजिक बहिष्कार का डर
हैरानी की बात यह है कि समाज का हर व्यक्ति इस बुराई को देख रहा है और इसके परिणामों को भी समझ रहा है। लेकिन, 'सच' बोलने की हिम्मत कोई नहीं जुटा पाता। इसके पीछे एक गहरा मनोवैज्ञानिक डर है। लोगों को लगता है कि यदि वे समाज की इन कुरीतियों के खिलाफ बोलेंगे, तो लोग उनसे दूरियां बना लेंगे या उन्हें 'बुरा' मान लिया जाएगा। आज के दौर में चापलूसी और 'हां में हां' मिलाने वालों को सम्मान मिलता है, जबकि समाज को आईना दिखाने वाले व्यक्ति को किनारे कर दिया जाता है। इसी डर के कारण बुराइयां फल-फूल रही हैं।
80 बनाम 20 का आंकड़ा: एक खतरनाक अंतर
अगर हम ईमानदारी से विश्लेषण करें, तो समाज में जिम्मेदार पुरुषों का प्रतिशत लगातार गिर रहा है। यदि 100 पुरुषों का सर्वे किया जाए, तो मुश्किल से 20 प्रतिशत ही ऐसे मिलेंगे जो वाकई अपने परिवार और बच्चों के भविष्य के लिए संघर्ष कर रहे हैं। बाकी 80 प्रतिशत पुरुष केवल अस्तित्व के नाम पर जीवित हैं, जिनका जीवन का कोई लक्ष्य नहीं है। यह 'जमीन-आसमान का अंतर' समाज के आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण है। जब तक पुरुष अपनी कार्यक्षमता का 100 प्रतिशत समाज को नहीं देंगे, तब तक विकास की बातें केवल कागजी ही रहेंगी।
बच्चों के भविष्य पर पड़ता नकारात्मक प्रभाव
जब घर का मुखिया या पिता गैर-जिम्मेदार होता है, तो उसका सबसे बुरा असर आने वाली पीढ़ी यानी बच्चों पर पड़ता है। बच्चे अपने पिता को दिनभर जुआ खेलते या नशे में देखते हैं, तो उनके मन में 'पुरुष' की छवि वैसी ही बन जाती है। महिलाएं संघर्ष करके बच्चों को स्कूल तो भेज देती हैं, लेकिन घर में उचित मार्गदर्शन और पिता के सहयोग के अभाव में बच्चे अक्सर भटक जाते हैं। यह स्थिति एक चक्र (Cycle) की तरह चलती रहती है, जहाँ गरीबी और अज्ञानता एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित होती रहती है।
आत्मचिंतन और सुधार की आवश्यकता
यह सच चुभने वाला जरूर है, लेकिन इसे छिपाया नहीं जा सकता। आदिवासी समाज का गौरव उसका स्वाभिमान और पुरुषार्थ रहा है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियां इस गौरव को धूमिल कर रही हैं। अब समय आ गया है कि समाज के प्रबुद्ध वर्ग, युवा और महिलाएं एकजुट होकर पुरुषों की इस निष्क्रियता के खिलाफ आवाज उठाएं। सुधार की शुरुआत घर से ही होगी। पुरुषों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और नशा व जुआ जैसी बुराइयों को त्यागकर अपनी महिलाओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना होगा। सच को स्वीकार करना ही सुधार की पहली सीढ़ी है।

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