विवाद की पृष्ठभूमि: 1.25 एकड़ जमीन का मामला
मामला देवघर मौजा के खाता संख्या 113 और प्लॉट संख्या 1088 से जुड़ा है। यहाँ स्थित 1 एकड़ 25 डिसमिल भूमि को लेकर कांदरा मुर्मू और उनके परिवार का दूसरे पक्ष से विवाद चल रहा था। यह जमीन कांदरा मुर्मू की पैतृक संपत्ति है, जिस पर उनका कानूनी और सामाजिक रूप से अधिकार था। हालांकि, विपक्षी पक्ष इस भूमि को छोड़ने को तैयार नहीं था, जिसके कारण मामला जटिल होता चला गया। स्थानीय स्तर पर कई बार इसे सुलझाने की कोशिशें हुईं, लेकिन विपक्षी पक्ष की हठधर्मिता के कारण मामला सुलझ नहीं पा रहा था।
ग्रामसभा और मांझी परगना महाल का ऐतिहासिक निर्णय
झारखंड की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था में ग्रामसभा और मांझी परगना महाल का स्थान सर्वोच्च है। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए देवघर ग्रामसभा के दोनों मांझी बाबाओं और मांझी परगना महाल (आसनबनी तोरोप) ने गहन जांच और साक्ष्यों के आधार पर बहुत पहले ही कांदरा मुर्मू के पक्ष में अपना फैसला सुना दिया था। सामाजिक पंचायत ने यह माना था कि भूमि पर असली हक कांदरा मुर्मू का ही है। लेकिन, आरोप है कि विपक्षी पक्ष ने इन पारंपरिक संस्थाओं के आदेशों को मानने से साफ इनकार कर दिया, जो सामाजिक ताने-बाने के लिए एक चुनौती बन गया था।
भू-माफियाओं के साथ मिलीभगत का आरोप
इस विवाद में एक गंभीर मोड़ तब आया जब रोमन मुर्मू, उनके भाई बिसू मुर्मू और उनके पुत्रों पर भू-माफियाओं के साथ साठ-गांठ करने के आरोप लगे। ग्रामीणों का कहना है कि ये लोग दबंगई के बल पर जमीन हड़पना चाहते थे। आरोप है कि रोमन मुर्मू, बिसू मुर्मू, लालू मुर्मू और सुनाराम मुर्मू ने न केवल सामाजिक व्यवस्था को ठेंगा दिखाया, बल्कि ग्रामसभा के फैसलों की भी लगातार अवहेलना की। वे जबरन भूमि पर कब्जा जमाए हुए थे और असली रैयत को अपनी ही जमीन से बेदखल कर रखा था। दबंगों और भू-माफियाओं के इस गठजोड़ ने पीड़ित परिवार को मानसिक और आर्थिक रूप से काफी परेशान किया।
बिरसा सेना की निर्णायक भूमिका और कार्रवाई
जब पीड़ित पक्ष को लगा कि सामाजिक आदेशों के बावजूद उन्हें न्याय नहीं मिल रहा है, तब बिरसा सेना ने हस्तक्षेप किया। शुक्रवार को बिरसा सेना के केंद्रीय महासचिव दिनकर कच्छप के नेतृत्व में संगठन के सदस्य और बड़ी संख्या में ग्रामीण देवघर मौजा पहुंचे। बिरसा सेना ने स्पष्ट किया कि वे किसी भी सूरत में आदिवासियों की जमीन पर भू-माफियाओं का कब्जा बर्दाश्त नहीं करेंगे। संगठन ने मांझी परगना महाल के पुराने निर्णय को लागू करने का संकल्प लिया और शांतिपूर्ण लेकिन दृढ़ता के साथ कांदरा मुर्मू को उनकी जमीन पर पुनः स्थापित कराया। इस कार्रवाई ने यह संदेश दिया कि जब तक समाज एकजुट है, किसी के हक को छीना नहीं जा सकता।
सामाजिक एकजुटता और हक की बहाली
भूमि पर कब्जा दिलाने के इस अभियान के दौरान पूरा माहौल 'बिरसा मुंडा अमर रहे' और 'हमारी जमीन, हमारा हक' के नारों से गूंज उठा। इस अवसर पर मूल रैयती धनाई मुर्मू, सरकार मुर्मू, रेवती मुर्मू सहित गांव के बुजुर्ग और युवा बड़ी संख्या में उपस्थित थे। कांदरा मुर्मू ने अपनी जमीन वापस मिलने पर बिरसा सेना और समस्त ग्रामीणों का आभार प्रकट किया। दिनकर कच्छप ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि ग्रामसभा के फैसलों का सम्मान करना हर सामाजिक व्यक्ति का कर्तव्य है। उन्होंने चेतावनी दी कि भविष्य में भी अगर किसी गरीब या सीधे-साधे ग्रामीण की जमीन हड़पने की कोशिश की गई, तो बिरसा सेना इसी तरह कड़ा रुख अपनाएगी।

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