Chakulia News: पूर्वी सिंहभूम जिले के चाकुलिया प्रखंड अंतर्गत सालकागढ़िया गांव ने आज एक नई इबारत लिख दी है। आदिवासी स्वशासन व्यवस्था को कानूनी मजबूती देने के लिए यहाँ 'पेसा नियमावली 2025' के तहत विधिवत ग्राम सभा का गठन किया गया। यह कदम केवल एक सरकारी प्रक्रिया नहीं, बल्कि गांव के लोगों को उनके जल, जंगल और जमीन का असली मालिक बनाने की दिशा में एक बड़ी जीत है। आइए जानते हैं इस खास आयोजन की हर छोटी-बड़ी बात।
ग्राम सभा का विधिवत गठन और स्वशासन की गूंज
आज सालकागढ़िया गांव की चौपाल पर एक नया सवेरा हुआ। पेसा नियमावली 2025 के नियमों का पालन करते हुए गांव में ग्राम सभा का गठन किया गया। इस दौरान ग्रामीणों के चेहरे पर एक अलग ही चमक थी, क्योंकि उन्हें अहसास हो गया है कि अब उनके गांव की चाबी उनके ही हाथ में है। इस गठन का मुख्य मकसद गांव की पुरानी माझी-परगना व्यवस्था को संविधान के दायरे में लाकर और भी ताकतवर बनाना है। अब गांव के विकास की हर योजना का फैसला गांव की जनता खुद करेगी।
सर्वसम्मति से चुने गए गांव के नए कर्णधार
ग्राम सभा को सही ढंग से चलाने के लिए पदाधिकारियों का चुनाव बहुत जरूरी था। पूरे गांव ने मिलकर और एक राय होकर पारंपरिक माझी बाबा सुपाई चंद्र हांसदा को ग्राम सभा का अध्यक्ष चुना। इसके साथ ही सालखान हेंब्रम को सहायक सचिव और जयंती सोरेन को कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई। चयन के बाद पदाधिकारियों ने कहा कि वे पद के लिए नहीं, बल्कि समाज की सेवा के लिए चुने गए हैं। गांव की महिलाओं ने जयंती सोरेन को जिम्मेदारी मिलने पर खुशी जताई और इसे नारी शक्ति की जीत बताया।
मास्टर ट्रेनर ने लोगों से सीधा किया संवाद
राज्य स्तरीय मास्टर ट्रेनर पंचानन सोरेन ने बहुत ही आसान भाषा में ग्रामीणों को पेसा कानून का मतलब समझाया। उन्होंने किसी बड़े अफसर की तरह नहीं, बल्कि एक बड़े भाई की तरह अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि अब तक हम लोग सोचते थे कि सरकार ऊपर से चलती है, लेकिन यह कानून कहता है कि सरकार अब आपके गांव की चौपाल से चलेगी। पेसा नियमावली का मतलब है—आपका गांव, आपका राज। अब ब्लॉक का बाबू या कोई ठेकेदार अकेले यह तय नहीं कर पाएगा कि आपके गांव में क्या काम होगा। अब आप सब मिलकर तय करेंगे कि नाली कहाँ बनेगी, कुआँ कहाँ खोदा जाएगा और स्कूल में मास्टर साहब ठीक से पढ़ा रहे हैं या नहीं। यह कानून आपको मालिक बनाने आया है, नौकर नहीं।"
शंकर सेन महाली ने जगाई हक और अधिकार की अलख
पेसा कानून के जानकार शंकर सेन महाली ने आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों पर जोर दिया। उन्होंने 5वीं अनुसूची के बारे में बताते हुए बहुत ही सरल अंदाज में कहा कि हमारी जमीन, हमारे पहाड़ और हमारी नदियाँ ही हमारी असली पहचान हैं। बाबा साहेब के संविधान ने हमें जो हक दिया था, पेसा नियमावली उसे जमीन पर उतार रही है। अब बिना आपकी मर्जी के कोई भी आपकी जमीन नहीं ले सकेगा और न ही आपके जंगलों को नुकसान पहुँचा पाएगा। माझी बाबा और परगना बाबा की जो हमारी पुरानी व्यवस्था है, उसे अब कानून का साथ मिल गया है। अगर हम अपनी ग्राम सभा को मजबूत रखेंगे, तो हमारी आने वाली पीढ़ी को अपनी पहचान के लिए किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा।
गांव के विकास के लिए बनीं विशेष समितियां
सिर्फ अध्यक्ष और सचिव चुनना ही काफी नहीं था, इसलिए गांव के हर काम को बारीकी से देखने के लिए अलग-अलग समितियां बनाई गईं। शिक्षा समिति स्कूलों की हालत देखेगी, स्वास्थ्य समिति अस्पताल और दवाओं का ध्यान रखेगी, और एक समिति प्राकृतिक संसाधनों (जैसे तालाब और पेड़) की रक्षा करेगी। पेसा नियमावली के तहत इन समितियों का काम यह सुनिश्चित करना है कि सरकारी योजनाओं का लाभ हर गरीब तक पहुँचे और भ्रष्टाचार की कोई गुंजाइश न रहे।
पारंपरिक माझी-परगना प्रमुखों का अटूट साथ
इस ऐतिहासिक सभा में समाज के आधार स्तंभ कहे जाने वाले सभी पारंपरिक प्रमुख मौजूद रहे। माझी बाबा, परगना बाबा, गोडेत बाबा, नायके बाबा और पाराणिक बाबा ने इस नई व्यवस्था को अपना आशीर्वाद दिया। इन प्रमुखों का मानना है कि पेसा नियमावली के आने से समाज में अनुशासन बढ़ेगा और विवादों का निपटारा गांव स्तर पर ही पारंपरिक तरीके से हो सकेगा। उन्होंने ग्रामीणों से अपील की कि वे एकजुट होकर इस व्यवस्था को आगे बढ़ाएं।
विशिष्ट अतिथियों की उपस्थिति ने बढ़ाया उत्साह
कार्यक्रम में कई जाने-माने सामाजिक और पारंपरिक नेता शामिल हुए। तोरोप परगना डॉ. अर्जुन टुडू, माझी बाबा शंखाभंगा मिहिराम सोरेन और पीड़ परगना लूसा मुर्मू ने अपनी उपस्थिति से ग्रामीणों का हौसला बढ़ाया। इन अतिथियों ने पदाधिकारियों को बधाई देते हुए कहा कि सालकागढ़िया गांव ने पूरे चाकुलिया प्रखंड को रास्ता दिखाया है। उन्होंने कहा कि जब गांव जागरूक होता है, तभी समाज का असली विकास संभव हो पाता है।
महिलाओं और युवाओं की रही सक्रिय भागीदारी
सभा में गांव की महिलाओं और युवाओं की भीड़ देखने लायक थी। सैकड़ों की संख्या में मौजूद ग्रामीणों ने विशेषज्ञों की हर बात को ध्यान से सुना। युवाओं ने सवाल पूछे और महिलाओं ने गांव की साफ-सफाई व शिक्षा को लेकर अपने सुझाव दिए। यह नजारा बता रहा था कि सालकागढ़िया अब बदलाव के लिए तैयार है। बुजुर्गों ने भी अपनी पुरानी यादें साझा कीं और कहा कि सालों बाद उन्हें ऐसा महसूस हो रहा है कि उनके अधिकारों का सम्मान हो रहा है।
संकल्प और भविष्य की नई उम्मीदें
सभा के अंत में सभी ग्रामीणों ने एक साथ हाथ उठाकर संकल्प लिया। उन्होंने कसम खाई कि वे हर महीने ग्राम सभा की बैठक करेंगे और पेसा नियमावली को पूरी ईमानदारी से लागू करेंगे। "अबुवा दिशोम, अबुवा राज" (हमारा देश, हमारा राज) के नारों के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। सालकागढ़िया गांव अब एक ऐसी इकाई बन चुका है, जहाँ फैसले सामूहिक चर्चा से लिए जाएंगे। यह ग्राम सभा अधिकार आधारित विकास की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगी।
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