जमशेदपुर: लौहनगरी जमशेदपुर के ग्रामीण अंचलों में इन दिनों एक सांस्कृतिक क्रांति की गूंज सुनाई दे रही है। पूर्वी हलुदबनी पंचायत के बागानटोला स्थित जाहेरथान की दीवारें अब केवल पत्थर और सीमेंट का ढांचा नहीं रहीं, बल्कि वे आदिवासी गौरव, परंपरा और आधुनिक संकल्प की जीवंत गाथा बन गई हैं। सामाजिक संस्था 'अबीरा' के सौजन्य से आयोजित 'सोहराय वॉल पेंटिंग' प्रशिक्षण कार्यक्रम ने यह साबित कर दिया है कि यदि कला को सही मंच मिले, तो वह समाज की दिशा बदल सकती है। यह पहल केवल पेंटिंग सिखाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आदिवासी समाज की जड़ों को फिर से हरा-भरा करने का एक ऐतिहासिक प्रयास है।
सोहराय: केवल पेंटिंग नहीं, आदिम सभ्यता का प्रतिबिंब
सोहराय झारखंड की वह प्राचीन कला है, जो सदियों से मिट्टी के घरों की दीवारों पर उकेरी जाती रही है। यह कला फसल कटाई के उत्सव और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का माध्यम है। बागानटोला के जाहेरथान (पूजा स्थल) की चहारदीवारी पर जब महिलाओं ने कूची चलाई, तो मानो सदियों पुरानी परंपरा जीवंत हो उठी। इस पेंटिंग में मुख्य रूप से प्रकृति, पशु-पक्षी और ज्यामितीय आकृतियों का समावेश होता है, जो मनुष्य और प्रकृति के अटूट संबंध को दर्शाता है। प्रशिक्षण के दौरान महिलाओं को बताया गया कि कैसे प्राकृतिक रंगों और मिट्टी का उपयोग कर इस कला को सहेजा जाता है।
सोहराय पेंटिंग हमारी पहचान है: सोनाराम
कला गुरु सोनाराम सोरेन बताते हैं कि सोहराय उनकी पहचान है, यह उनके पूर्वजों की भाषा है जिसे वे दीवारों पर लिखते हैं। जब उन्होंने बागानटोला की इन महिलाओं को प्रशिक्षण देना शुरू किया, तो उन्होंने उनके भीतर कला के प्रति एक अदभुत तड़प दिखाई दी। सोहराय कला कोई साधारण चित्रकारी नहीं है; इसमें हर रेखा का एक अर्थ होता है। चटक रंगों के बीच खींची गई काली रेखाएं हमारे जीवन के संघर्ष और अनुशासन को दर्शाती हैं। उनका लक्ष्य केवल इन्हें पेंटिंग सिखाना नहीं है, बल्कि इन्हें अपनी विरासत का संरक्षक बनाना है। आज के आधुनिक युग में वे अपनी पारंपरिक कलाओं को भूलते जा रहे हैं, लेकिन जब ये महिलाएं सार्वजनिक स्थानों जैसे जाहेरथान की दीवारों पर अपनी कल्पना उकेरती हैं, तो आने वाली पीढ़ी इसे देखकर अपनी जड़ों से जुड़ती है। इन महिलाओं ने बहुत कम समय में ब्रश पकड़ने की तकनीक और रंगों के संयोजन को सीख लिया है। उन्होंने बताया कि उन्हें गर्व है कि अब ये महिलाएं केवल घरेलू काम-काज तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे एक कलाकार के रूप में अपनी संस्कृति को दुनिया के सामने रख रही हैं। जाहेरथान जैसे पवित्र स्थल पर इस कला का प्रदर्शन समाज को एक सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है और शांति का संदेश देता है।
समाज की सांस्कृतिक चेतना को जगाने की है जरूरत: पानो मुर्मू
एक पंचायत प्रतिनिधि के रूप में मेरा हमेशा से मानना रहा है कि विकास केवल सड़क और नाली बनाने से नहीं होता, बल्कि समाज की सांस्कृतिक चेतना को जगाने से होता है। हमारी आदिवासी महिलाएं अत्यंत प्रतिभाशाली हैं, बस उन्हें एक सही दिशा और प्रोत्साहन की आवश्यकता थी। जब अबीरा संस्था ने सोहराय पेंटिंग के प्रशिक्षण का प्रस्ताव रखा, तो मैंने तुरंत इसे जाहेरथान से जोड़ने का निर्णय लिया। जाहेरथान हमारे समाज का सबसे पवित्र केंद्र है और इसकी दीवारों पर हमारी कला का होना हमारे पूर्वजों को सम्मान देने जैसा है। इन महिलाओं ने कड़ी धूप में भी जिस लगन से काम किया है, वह प्रेरणादायक है। सोनाली बांदिया, हिंसी बेसरा और अन्य सभी महिलाओं ने यह साबित किया है कि वे अपनी विरासत को संजोने के लिए पूरी तरह सक्षम हैं। इस पहल से न केवल हमारी कला सुरक्षित हो रही है, बल्कि महिलाओं में आत्मविश्वास का संचार हुआ है। अब वे गर्व से कह सकती हैं कि यह उनकी बनाई हुई कृति है। भविष्य में मेरा प्रयास रहेगा कि हम इन महिलाओं द्वारा बनाई गई कलाकृतियों को बाजार उपलब्ध कराएं ताकि यह उनकी आय का साधन भी बन सके। हमारी संस्कृति हमारी शक्ति है और इसे बचाना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।
बागानटोला का जाहेरथान: बना एक सांस्कृतिक कैनवास
जाहेरथान किसी भी आदिवासी बस्ती का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र होता है। बागानटोला में जब इस पवित्र स्थल की दीवारों पर सोहराय कला की आकृतियां उभरनी शुरू हुईं, तो पूरे इलाके का माहौल बदल गया। राह चलते लोग रुककर इन महिलाओं की कलाकारी को निहारते और उनकी सराहना करते। यह पहली बार था जब स्थानीय स्तर पर इस तरह का 'लाइव परफॉर्मेंस' आयोजित किया गया था। इससे न केवल कला का प्रचार हुआ, बल्कि समुदाय के भीतर अपनी संस्कृति के प्रति गर्व का भाव भी जागा।
ग्रामीण महिलाओं का नया चेहरा: सशक्तिकरण की ओर कदम
इस कार्यक्रम में शामिल सोनाली बांदिया, हिंसी बेसरा, रायमुनी देवगम, सुमित्रा बांदिया, सीता माझी, सुमी मुंडरी और अंजलि बोदरा जैसी महिलाओं ने अपनी घरेलू जिम्मेदारियों के बीच समय निकालकर इस कला को सीखा। मोमिता बनर्जी, उमा करूआ, तमन्ना करूआ, सोनाली करूआ, सुमित्रा बास्के और यशोदा टुडू जैसी कलाकारों ने दिखाया कि कला की कोई सीमा नहीं होती। इन महिलाओं के लिए यह केवल रंग-रोगन नहीं था, बल्कि अपनी पहचान को एक नई आवाज देने का जरिया था।
पारंपरिक रूपांकन और आधुनिक फिनिशिंग का मेल
प्रशिक्षण के दौरान शिक्षक सोनाराम सोरेन ने महिलाओं को पारंपरिक रूपांकनों जैसे 'हाथी-घोड़ा', 'मयूर', 'मछली' और 'वनस्पति' के चित्रों को आधुनिक तरीके से फिनिशिंग देने की तकनीक सिखाई। अक्सर पारंपरिक पेंटिंग में बारीकियों की कमी रह जाती है, लेकिन इस बार महिलाओं ने ब्रश के इस्तेमाल से उन छोटी-छोटी रेखाओं पर ध्यान दिया जो पेंटिंग को 'प्रोफेशनल' लुक देती हैं। यही कारण है कि दीवार पर बनी आकृतियां दूर से ही लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच रही हैं।
विलुप्त होती कला को मिला संजीवनी का सहारा
आज के डिजिटल युग में जहाँ नई पीढ़ी पश्चिमी संस्कृति की ओर आकर्षित हो रही है, वहाँ सोहराय जैसी लोक कलाओं पर अस्तित्व का संकट मंडरा रहा था। 'अबीरा' संस्था और पंचायत के इस साझा प्रयास ने इस मृतप्राय कला को नई संजीवनी दी है। जब सामूहिक रूप से महिलाएं ऐसी गतिविधियों में हिस्सा लेती हैं, तो यह समाज के लिए एक बड़ा संदेश होता है कि पुरानी परंपराओं को आधुनिकता के साथ भी सहेजा जा सकता है।
भविष्य की राह: कला से आत्मनिर्भरता का सपना
यह प्रशिक्षण केवल दीवारों तक सीमित नहीं रहने वाला है। मुखिया पानो मुर्मू और संस्था के सदस्यों का लक्ष्य है कि इन प्रशिक्षित महिलाओं के एक स्वयं सहायता समूह (SHG) का गठन किया जाए। आने वाले समय में ये महिलाएं कैनवास, कपड़े और हस्तशिल्प की वस्तुओं पर सोहराय पेंटिंग बनाकर उन्हें बेच सकेंगी, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में भी सुधार होगा। यह पहल झारखंड की कला को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगी।
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