Jamshedpur news: जमशेदपुर के करनडीह स्थित आदिवासी भवन में बुधवार को एक शोक सभा सह श्रद्धांजलि कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह अवसर था पोटका विधानसभा क्षेत्र के पूर्व विधायक और कद्दावर झारखंड आंदोलनकारी स्व. सनातन माझी की पांचवीं पुण्यतिथि का। इस मौके पर क्षेत्र के वरिष्ठ नेताओं, उनके समकालीन आंदोलनकारियों और स्थानीय ग्रामीणों ने भारी संख्या में एकत्रित होकर उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। वातावरण पूरी तरह से श्रद्धापूर्ण था, जहां लोगों ने अपने जनप्रिय नेता के प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर उन्हें नमन किया और उनके द्वारा किए गए कार्यों को याद किया।




झारखंड आंदोलन के प्रखर योद्धा को स्मरण किया
सनातन माझी को केवल एक पूर्व विधायक के रूप में ही नहीं, बल्कि झारखंड अलग राज्य आंदोलन के एक समर्पित सिपाही के रूप में याद किया गया। श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए झामुमो के वरिष्ठ नेताओं ने कहा कि माझी जी ने उस समय आंदोलन की मशाल थामी थी जब चुनौतियाँ बहुत बड़ी थीं। उन्होंने झारखंड की मिट्टी और यहाँ के लोगों के हक-अधिकार की लड़ाई लड़ने में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। उनकी पुण्यतिथि पर उपस्थित वक्ताओं ने साझा किया कि किस तरह उनके नेतृत्व ने आंदोलन को नई धार दी थी और आदिवासियों की आवाज को सत्ता के गलियारों तक पहुँचाया था।


सामाजिक और शैक्षणिक विकास में दिया अतुलनीय योगदान
श्रद्धांजलि सभा के दौरान शंकर हेंब्रम ने स्व. सनातन माझी के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनका कार्यक्षेत्र केवल राजनीति तक सीमित नहीं था। उन्होंने विशेष रूप से आदिवासी बहुल क्षेत्रों में सामाजिक सुधार और शैक्षणिक उत्थान के लिए निरंतर प्रयास किए। उनका मानना था कि जब तक समाज शिक्षित नहीं होगा, तब तक वह अपने अधिकारों के लिए सजग नहीं हो पाएगा। ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों और सामाजिक संस्थाओं के सुदृढ़ीकरण में उनकी भूमिका को आज भी मील का पत्थर माना जाता है। इसी योगदान के कारण आदिवासी-मूलवासी समाज उन्हें अपनी स्मृतियों में हमेशा जीवित रखेगा।

युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं स्व. सनातन माझी
स्व. माझी के आदर्शों को आज के समय में और भी प्रासंगिक बताया गया। सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि उनके जीवन का त्याग और बलिदान वर्तमान पीढ़ी के युवाओं के लिए एक मार्गदर्शिका की तरह है। आज जब राजनीति के मायने बदल रहे हैं, तब सनातन माझी जैसा निस्वार्थ व्यक्तित्व यह सिखाता है कि जनसेवा का वास्तविक अर्थ क्या है। युवाओं से अपील की गई कि वे माझी जी के सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारें और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझें। उनका सादगी भरा जीवन और जनता के प्रति अटूट निष्ठा आज भी प्रेरणा का केंद्र है।


आदिवासी-मूलवासी समाज में स्व. माझी के प्रति है गहरा प्रेम
करनडीह और आसपास के क्षेत्रों से आए ग्रामीणों की भीड़ यह बताने के लिए काफी थी कि स्व. माझी के प्रति लोगों के मन में कितना गहरा सम्मान है। उपस्थित वक्ताओं ने सर्वसम्मति से कहा कि आदिवासी-मूलवासी समाज उन्हें कभी नहीं भुला सकता क्योंकि उन्होंने अंतिम सांस तक अपने लोगों की समस्याओं के समाधान हेतु संघर्ष किया। वह एक ऐसे नेता थे जिन्हें आसानी से सुलभ माना जाता था, और उनके द्वार हर जरूरतमंद के लिए हमेशा खुले रहते थे। उनके निधन के पाँच साल बाद भी उनकी कमी समाज के हर वर्ग को खलती है।

उनके सपनों को पूरा करने का लिया संकल्प
कार्यक्रम में कई सामाजिक और राजनीतिक हस्तियों ने हिस्सा लिया। मुख्य रूप से परगना सुशील हांसदा, मधु सोरेन, शंकर हेम्ब्रम, रवि कुरली, प्रताप पिंगुआ, मनोज नाहा, पप्पू उपाध्याय, संजीव मुर्मू, इंद्रो हांसदा, सुकरा हो और बाबू माझी सहित दर्जनों की संख्या में बस्तीवासी उपस्थित थे। सभी ने सामूहिक रूप से यह संकल्प लिया कि वे स्व. सनातन माझी के अधूरे सपनों को पूरा करने और उनके बताए हुए सामाजिक समरसता के मार्ग पर चलने का प्रयास करेंगे। कार्यक्रम का समापन दो मिनट के मौन और उनकी स्मृतियों को जीवंत रखने के वादे के साथ हुआ।