Jamshedpur news: सेंगेल दिशोम परगना सोनाराम सोरेन के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने जिला समाहरणालय पहुंचकर उपायुक्त की अनुपस्थिति में उप विकास आयुक्त नागेंद्र पासवान से मुलाकात की। इस मुलाकात का मुख्य उद्देश्य आदिवासियों के मौलिक अधिकारों, सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए प्रशासनिक हस्तक्षेप की मांग करना था। प्रतिनिधिमंडल ने मांग पत्र सौंपकर कहा है कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वयंभू ग्राम प्रधानों द्वारा संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन किया जा रहा है, जिससे कई परिवार नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं। सेंगेल अभियान ने जिला प्रशासन को सौंपे ज्ञापन में आदिवासियों के लिए मर्यादा के साथ जीने के अधिकार की वकालत की।




सातबाकड़ा गांव: श्राद्ध कर्म में बाधा डालने का षड़यंत्र
प्रतिनिधिमंडल ने उप विकास आयुक्त को अवगत कराया कि डुमूरिया प्रखंड के सातबाकड़ा गांव निवासी कार्तिक मुर्मू का श्राद्ध एवं दशकर्म 1 एवं 2 मई 2026 को निर्धारित है। आरोप है कि गांव के ग्राम प्रधान दुखूराम मुर्मू द्वारा इस पवित्र सामाजिक कार्य में षड़यंत्र के तहत बाधा डालने की आशंका है। सेंगेल का कहना है कि श्राद्ध कर्म जैसे धार्मिक और सामाजिक अनुष्ठान को रोकना न केवल संविधान और कानून का उल्लंघन है, बल्कि यह मानवाधिकारों का भी खुला हनन है। प्रशासन से मांग की गई है कि इस आयोजन के दौरान सुरक्षा और सहयोग प्रदान किया जाए ताकि परिवार शांतिपूर्ण ढंग से अपनी रस्में पूरी कर सके।


राजाबासा में सामाजिक बहिष्कार की क्रूरता
घाटशिला प्रखंड के गालुडीह थाना अंतर्गत राजाबासा गांव से एक अत्यंत दुखद मामला सामने आया है। यहां के ग्राम प्रधान (माझी) महेंद्र मुर्मू पर आरोप है कि उन्होंने चार आदिवासी संताल परिवारों-रामेश्वर मुर्मू उर्फ रंजित, सुपाई मुर्मू, लखींद्र मुर्मू और प्यारी मुर्मू-का सामाजिक बहिष्कार कर दिया है। यह बहिष्कार समाज में विभाजन और उत्पीड़न का प्रतीक बन गया है, जिससे प्रभावित परिवारों का दैनिक जीवन दूभर हो गया है। प्रतिनिधिमंडल ने बताया कि इस तरह की प्रथाएं आधुनिक समाज और संवैधानिक लोकतंत्र के मापदंडों के पूर्णतः विपरीत हैं।

मात्र 10,000 रुपये के जुर्माने के लिए परिवार का बहिष्कार
सामाजिक बहिष्कार के पीछे की वजह हैरान करने वाली है। सहगोत्रीय होने के कारण सुपाई मुर्मू ने अपनी ज्येष्ठ मां के श्राद्ध भोज में रामेश्वर मुर्मू को आमंत्रित किया था। इस 'अपराध' के लिए ग्राम प्रधान महेंद्र मुर्मू ने सुपाई मुर्मू पर 10,000 रुपये का भारी आर्थिक जुर्माना लगा दिया। जब सुपाई मुर्मू ने यह राशि देने में अपनी असमर्थता जताई, तो प्रधान ने तानाशाही रवैया अपनाते हुए उनका भी सामाजिक बहिष्कार कर दिया। यह घटना दर्शाती है कि किस तरह गरीब ग्रामीणों पर आर्थिक बोझ डालकर उन्हें समाज से बेदखल किया जा रहा है।


महिला समूह से निष्कासन और सामाजिक अलगाव
इस पितृसत्तात्मक और दमनकारी सोच का असर गांव की महिलाओं पर भी पड़ा है। राजाबासा गांव के 'सनत महिला समूह' की सदस्य सोमवारी मुर्मू को भी ग्राम प्रधान के निर्देश पर समूह से बाहर कर दिया गया। इसका एकमात्र कारण यह था कि उनके पति सुपाई मुर्मू को समाज से बहिष्कृत किया गया है। सेंगेल अभियान ने इसे महिला सशक्तिकरण पर प्रहार और सामाजिक अन्याय की पराकाष्ठा बताया है। एक व्यक्ति के बहिष्कार के आधार पर पूरे परिवार और महिलाओं को आर्थिक व सामाजिक रूप से प्रताड़ित करना कानूनी रूप से अपराध की श्रेणी में आता है।


दोषी ग्राम प्रधानों को पदमुक्त करने की मांग
सेंगेल दिशोम परगना ने जिला प्रशासन से कड़ी कार्रवाई की मांग करते हुए कहा है कि ऐसे ग्राम प्रधानों (माझी) पर तत्काल नकेल कसी जाए जो संविधान और मानवाधिकारों के पक्षधर नहीं हैं। मांग की गई है कि महेंद्र मुर्मू जैसे प्रवृत्तियों वाले प्रधानों को अविलंब उनके पद से मुक्त किया जाए और ऐसे नए ग्राम प्रधानों का चयन किया जाए जो कानून का सम्मान करें। प्रतिनिधिमंडल में जूनियर मुर्मू, कुनूराम बास्के, लखन चन्द्र टुडू, अर्जुन मुर्मू और भागराती मुर्मू सहित पीड़ित परिवारों के सदस्य शामिल थे, जिन्होंने प्रशासन से न्याय की गुहार लगाई है।