जमशेदपुर: ट्राइबल इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (TICCI) के प्रदेश अध्यक्ष बैद्यनाथ मांडी ने झारखंड सरकार की कार्यप्रणाली पर गहरा असंतोष व्यक्त किया है। एक प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से उन्होंने आदिवासी उद्यमियों की उपेक्षा और उनके संघर्षों को उजागर करते हुए मुख्यमंत्री का ध्यान इस ओर आकर्षित किया है। मांडी का कहना है कि झारखंड को बने ढाई दशक बीत चुके हैं, लेकिन आज भी यहाँ का मूलवासी आर्थिक और व्यापारिक मुख्यधारा से कटा हुआ है।
बिहार सरकार के ऐतिहासिक निर्णय से झारखंड की तुलना
बैद्यनाथ मांडी ने पड़ोसी राज्य बिहार की 'सम्राट सरकार' द्वारा लिए गए हालिया फैसलों की सराहना करते हुए झारखंड सरकार को आईना दिखाया है। उन्होंने बताया कि 30 अप्रैल 2026 को बिहार कैबिनेट की दूसरी बैठक में राज्य की जनता के लिए क्रांतिकारी निर्णय लिए गए हैं। बिहार सरकार ने 50 करोड़ रुपये तक के निविदा (टेंडर) को पूरी तरह से स्थानीय बिहारियों के लिए आरक्षित कर दिया है। इसके साथ ही, सरकारी खरीद में भी स्थानीय उत्पादों की हिस्सेदारी सुनिश्चित करने की घोषणा की गई है। मांडी के अनुसार, यह किसी भी राज्य के उद्यमियों के लिए अत्यंत गर्व और खुशी की बात है, क्योंकि ऐसे निर्णय ही स्थानीय व्यापार को मजबूती प्रदान करते हैं।
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झारखंड में 25 वर्षों की उपेक्षा का काला अध्याय
झारखंड राज्य का गठन आदिवासियों और स्थानीय लोगों के जल, जंगल, जमीन और उनके स्वाभिमान की रक्षा के लिए किया गया था। परंतु, मांडी ने क्षोभ जताते हुए कहा कि 25 वर्ष बीत जाने के बाद भी यहाँ के आदिवासियों के आर्थिक उत्थान के लिए सरकार के पास कोई ठोस 'रोडमैप' नहीं है। आजादी के 75 वर्षों के बाद भी किसी भी सरकार ने आदिवासियों को उद्योग और व्यापार से जोड़ने की गंभीर कोशिश नहीं की। राज्य गठन के समय जो उम्मीदें जगी थीं, वे समय के साथ धूमिल होती जा रही हैं। आज भी झारखंड में औद्योगिक और व्यावसायिक परिदृश्य में आदिवासियों की भागीदारी नगण्य बनी हुई है।
'अबुआ ढिशुम अबुआ राज': हकीकत या सिर्फ चुनावी नारा?
झारखंड की राजनीति में 'अबुआ ढिशुम अबुआ राज' (हमारा देश, हमारा राज) का नारा हमेशा से गूँजता रहा है। बैद्यनाथ मांडी का कहना है कि यह सपना अब मात्र एक चुनावी नारा बनकर रह गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि आदिवासियों को केवल 'वोट बैंक' के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। झारखंड एक ऐसा राज्य है जहाँ प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता है, लेकिन इसके बावजूद यहाँ के आदिवासियों के पास न तो अच्छी शिक्षा है और न ही बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था। नौकरी से लेकर व्यवसाय तक, हर क्षेत्र में आदिवासी पिछड़ रहे हैं, जो राज्य की शासन व्यवस्था पर एक बड़ा सवालिया निशान है।
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आदिवासी मुख्यमंत्रियों की विफलता और विजन की कमी
बैद्यनाथ मांडी ने विशेष रूप से आदिवासी मुख्यमंत्रियों की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि झारखंड ने कई आदिवासी मुख्यमंत्री देखे, लेकिन विडंबना यह है कि किसी ने भी अपने ही समाज के व्यापारिक और औद्योगिक हितों के लिए दूरदर्शी सोच नहीं दिखाई। प्रचुर संसाधनों के बावजूद, नीतिगत स्तर पर आदिवासियों को सशक्त बनाने की मंशा की कमी साफ दिखाई देती है। यह राज्य की विडंबना ही है कि यहाँ सब कुछ होते हुए भी आदिवासी समाज आर्थिक पिछड़ेपन का शिकार है क्योंकि नेतृत्व के पास उनके विकास के लिए कोई स्पष्ट दृष्टि नहीं है।
2020 की निविदा घोषणा और 'ठंडे बस्ते' की राजनीति
झारखंड सरकार की पिछली कोशिशों पर प्रहार करते हुए मांडी ने याद दिलाया कि वर्ष 2020 में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने 25 करोड़ रुपये तक की निविदाओं को स्थानीय लोगों के लिए आरक्षित करने की घोषणा की थी। हालाँकि, ट्राइबल चैंबर ने उस समय भी इसका कड़ा विरोध किया था क्योंकि उस प्रक्रिया का डिज़ाइन इतना जटिल था कि उससे स्थानीय आदिवासियों को कोई वास्तविक लाभ मिलने वाला नहीं था। चैंबर की आपत्ति के बाद सरकार ने सुधार करने के बजाय उस पूरी योजना को ही 'ठंडे बस्ते' में डाल दिया। इससे स्पष्ट होता है कि सरकार केवल घोषणाओं में विश्वास रखती है, धरातल पर क्रियान्वयन में नहीं।
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नीतिगत सुझावों पर सरकार की चुप्पी और निष्क्रियता
वर्तमान में झारखंड की औद्योगिक नीति की अवधि समाप्त हो चुकी है। बैद्यनाथ मांडी ने जानकारी दी कि ट्राइबल इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स निरंतर सरकार को नई नीति के लिए सुझाव भेजता रहा है। चैंबर द्वारा 'आदिवासी उद्यमिता बोर्ड' के गठन और 'आदिवासी विशेष औद्योगिक नीति' बनाने के लिए विस्तृत ड्राफ्ट और सुझाव सरकार को सौंपे गए हैं। इन सुझावों का उद्देश्य आदिवासियों को व्यापार में विशेष रियायतें और अवसर प्रदान करना है, लेकिन मौजूदा सरकार इस पर बिल्कुल भी गंभीर नहीं दिख रही है।
पड़ोसी राज्यों से सीख लेने की आवश्यकता
लेख के अंत में बैद्यनाथ मांडी ने तीखा सवाल पूछते हुए कहा कि जब बिहार और छत्तीसगढ़ जैसे पड़ोसी राज्य अपने स्थानीय लोगों और उद्यमियों के हित में साहसी नीतिगत फैसले ले सकते हैं, तो झारखंड सरकार को ऐसा करने में क्या परेशानी है? उन्होंने पूछा कि क्या झारखंड सरकार की मंशा ही नहीं है कि यहाँ का आदिवासी वर्ग आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बने? मांडी ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यदि सरकार ने जल्द ही स्थानीय उद्यमियों और आदिवासियों के लिए ठोस व्यापारिक नीति नहीं बनाई, तो 'अबुआ राज' की कल्पना कभी साकार नहीं हो पाएगी और राज्य का मूल निवासी अपने ही प्रदेश में हाशिए पर रह जाएगा।
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