Pandit Raghunath Murmu: नवाडीह स्थित पंडित रघुनाथ मुर्मू पुस्तकालय सह अध्ययन केंद्र में ‘ओल चिकी’ लिपि के जनक Pandit Raghunath Murmu की 121वीं जयंती बड़े ही श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई गई। इस कार्यक्रम में गांव के ग्रामीणों, छात्रों एवं बुद्धिजीवियों की सक्रिय भागीदारी रही। आयोजन का उद्देश्य संताली भाषा, लिपि और संस्कृति के प्रति जागरूकता फैलाना तथा नई पीढ़ी को इससे जोड़ना था।


प्रतिमा का अनावरण एवं पारंपरिक पूजा-अर्चना की 
कार्यक्रम की शुरुआत पुस्तकालय परिसर में पंडित रघुनाथ मुर्मू की प्रतिमा के अनावरण से हुई। यह अनावरण गांव के नायकी बाबा द्वारा पारंपरिक संताली रीति-रिवाजों के साथ पूजा-अर्चना कर किया गया। इस दौरान उपस्थित सभी अतिथियों एवं ग्रामीणों ने श्रद्धा पूर्वक उन्हें नमन किया और उनके आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लिया। पूरा वातावरण सांस्कृतिक आस्था और सम्मान से ओतप्रोत था।
लाइब्रेरी मैन संजय कच्छप समेत अन्य को किया सम्मानित 


इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में संताली साहित्य के प्रतिष्ठित लेखक चुनडा सोरेन सिपाही उपस्थित रहे। इसके अलावा झारखंड के ‘लाइब्रेरी मैन’ के रूप में संजय कच्छप (चाईबासा), प्रोफेसर रामू हेम्ब्रम एवं धानेश्वर मांझी (विश्व भारती, शांति निकेतन, बोलपुर), यदुवंश प्रणय (संताल परगना कॉलेज, दुमका), चरण मुर्मू एवं प्रेमलाल मुर्मू सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे। सभी अतिथियों का स्वागत गांव के मांझी महेश चन्द्र मुर्मू द्वारा पारंपरिक पगड़ी पहनाकर किया गया।

ओलचिकी लिपि और मातृभाषा के महत्व पर जोर
कार्यक्रम में वक्ताओं ने संताली भाषा और ‘ओल चिकी’ लिपि के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। चुनडा सोरेन सिपाही ने कहा कि हमें अपने बच्चों को संताली भाषा को ओल चिकी लिपि में पढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए, क्योंकि इसमें भविष्य की अपार संभावनाएं हैं। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा संविधान को ओल चिकी लिपि में प्रकाशित कराने का प्रयास एक ऐतिहासिक पहल है। संजय कच्छप ने बताया कि पंडित रघुनाथ मुर्मू ने 1925 में ही इस लिपि का आविष्कार कर मातृभाषा में शिक्षा के महत्व को समझ लिया था।


पुस्तकालय और आधुनिक शिक्षा की दिशा में पहल
कार्यक्रम के दौरान Tata Steel Foundation की ओर से गांव के बच्चों के लिए एक कंप्यूटर सेट प्रदान किया गया। इस पहल का उद्देश्य बच्चों को डिजिटल शिक्षा से जोड़ना और उन्हें आधुनिक तकनीकी ज्ञान से सशक्त बनाना है। वक्ताओं ने पुस्तकालय के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि यह ज्ञान का केंद्र है, जहां से व्यक्ति अपने जीवन को नई दिशा दे सकता है। छात्रों को नियमित रूप से पुस्तकालय से जुड़े रहने और इसका अधिकतम उपयोग करने की सलाह दी गई।


पंडित रघुनाथ मुर्मू के जीवन और योगदान पर प्रकाश डाला
प्रोफेसर धानेश्वर मांझी ने पंडित रघुनाथ मुर्मू के जीवन और योगदान पर प्रकाश डालते हुए बताया कि उनका जन्म 1905 में ओडिशा के मयूरभंज जिले में हुआ था और उन्होंने मात्र 20 वर्ष की आयु में ‘ओल चिकी’ लिपि का आविष्कार कर संताली भाषा को एक नई पहचान दी। उनके प्रयासों से ही संताली भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान मिला। कार्यक्रम के समापन पर गांव के मांझी महेश चन्द्र मुर्मू ने सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर नायकी संतोष मुर्मू, राकेश सोरेन, सिकंदर हांसदा, मनोज कुमार टुडू, विकास मुर्मू, संजय हांसदा, प्रतिभा हेम्ब्रम, सुनीता सोरेन सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे।