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कोल्हान में पलायन का दंश: भूख की आग में जलते गांव और वीरान होती चौपालें

 

 Kolhan News :"भूखा क्या नहीं करता"-यह कहावत आज कोल्हान के गांवों की कड़वी सच्चाई बन चुकी है। जमशेदपुर जैसे औद्योगिक केंद्रों के आसपास होने के बावजूद, सुदूर ग्रामीण इलाकों में स्थिति भयावह है। जब घर के चूल्हे ठंडे पड़ने लगते हैं और बच्चों की आंखों में भूख की चमक दिखने लगती है, तो एक इंसान के पास अपना पुश्तैनी घर छोड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। यह पलायन शौक नहीं, बल्कि एक जानलेवा मजबूरी है। कोल्हान की मिट्टी से जुड़ा व्यक्ति कभी अपनी जमीन नहीं छोड़ना चाहता, लेकिन जब वही जमीन दो वक्त की रोटी देने में असमर्थ हो जाए, तो शहर की ओर कूच करना उसकी नियति बन जाती है।






खेती का संकट और सिमटते आजीविका के साधन
गांवों में पलायन का सबसे बड़ा कारण कृषि क्षेत्र की बदहाली है। कोल्हान के अधिकांश इलाकों में खेती आज भी मानसून पर निर्भर है। सिंचाई सुविधाओं का अभाव और उन्नत बीजों तक पहुंच न होने के कारण पैदावार इतनी भी नहीं होती कि साल भर एक परिवार का पेट भरा जा सके। जो जमीन कभी सोना उगलती थी, वह अब पथरीली और अनुर्वर महसूस होने लगी है। इसके अतिरिक्त, लघु वनोपजों पर निर्भरता भी कम हुई है, जिससे ग्रामीणों के पास आय का कोई ठोस जरिया नहीं बचा है। बिना काम और बिना अनाज के, गांव अब केवल रहने का ठिकाना बनकर रह गए हैं, आजीविका का केंद्र नहीं।

शहरों की ओर पलायन: एकतरफा सफर
चिंता का सबसे बड़ा विषय यह है कि यह पलायन अब अस्थायी नहीं रहा। पहले लोग काम खत्म करके वापस गांव लौट आते थे, लेकिन अब जो एक बार शहर की चकाचौंध और वहां मिलने वाली दिहाड़ी की आदत डाल लेता है, वह दोबारा गांव की ओर मुड़कर नहीं देख रहा। शहर की तंग गलियों में रहकर भी उन्हें लगता है कि कम से कम वहां भूखे सोने की नौबत नहीं आएगी। परिणाम स्वरूप, कोल्हान के कई गांवों में अब केवल बुजुर्ग और बच्चे ही शेष रह गए हैं। कार्यबल (युवा शक्ति) का इस तरह पूरी तरह से पलायन करना ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ को तोड़ रहा है।

महिला और पुरुष: कंधे पर भारी बोझ
इस पलायन की त्रासदी में महिलाएं और पुरुष दोनों समान रूप से झुलस रहे हैं। पहले केवल पुरुष सदस्य ही बाहर जाते थे, लेकिन अब पूरी की पूरी गृहस्थी शहर के किसी निर्माण स्थल या छोटे कमरों में सिमट रही है। महिलाएं भी शहरों में घरेलू कामगार या निर्माण मजदूर के रूप में काम करने को मजबूर हैं। इससे न केवल उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है, बल्कि बच्चों की शिक्षा और उनका भविष्य भी अधर में लटक गया है। गांव के आंगन अब सूने पड़े हैं और उन पर ताले लटक रहे हैं।

जनप्रतिनिधियों की उदासीनता और नीतिगत विफलता
स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के लिए यह समय गहरी आत्ममंथन का है। चुनाव के समय किए गए वादे केवल कागजों तक सीमित रह जाते हैं। मनरेगा जैसी योजनाओं का सही क्रियान्वयन न होना और स्थानीय स्तर पर सूक्ष्म उद्योगों को बढ़ावा न देना एक बड़ी नीतिगत विफलता है। यदि स्थानीय स्तर पर ही रोजगार के अवसर सृजित किए जाते, तो शायद आज ये गांव वीरान न होते। जनप्रतिनिधियों को इस समस्या को प्राथमिकता के आधार पर लेना होगा, वरना उनकी राजनीति करने के लिए गांवों में लोग ही नहीं बचेंगे।

वीरान होते गांव और विलुप्त होती संस्कृति
गांव केवल घरों का समूह नहीं होते, वे एक संस्कृति, परंपरा और सामूहिक पहचान का केंद्र होते हैं। जब गांव के लोग पलायन करते हैं, तो उनके साथ उनकी भाषा, लोकगीत और पारंपरिक ज्ञान भी खत्म होने लगता है। कोल्हान की समृद्ध जनजातीय संस्कृति पर यह पलायन एक गहरा आघात है। यदि यह सिलसिला इसी गति से जारी रहा, तो आने वाले दो दशकों में कई गांव मानचित्र से गायब हो जाएंगे या केवल 'घोस्ट विलेज' बनकर रह जाएंगे। सामुदायिक उत्सवों की रौनक अब शहर की भीड़ में कहीं खो गई है।

समाधान की तलाश: क्या लौट पाएगी रौनक?
इस संकट का समाधान केवल भाषणों से नहीं, बल्कि ठोस धरातलीय कार्यों से संभव है। सरकार को कोल्हान के ग्रामीण क्षेत्रों में जल संचयन और सिंचाई की आधुनिक तकनीकों को बढ़ावा देना होगा। कृषि आधारित उद्योगों की स्थापना, कौशल विकास केंद्रों का विस्तार और स्थानीय हस्तशिल्प को बाजार उपलब्ध कराना अनिवार्य है। जब तक ग्रामीण को अपनी मिट्टी में सम्मानजनक कमाई का रास्ता नहीं दिखेगा, वह शहर की ओर भागता रहेगा। समय हाथ से निकलता जा रहा है, और यदि अब भी कदम नहीं उठाए गए, तो कोल्हान का ग्रामीण परिवेश केवल इतिहास के पन्नों में दर्ज रह जाएगा।

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