Jamshedpur news : बदलते जमाने के साथ माहवारी स्वच्छता और महिला सशक्तिकरण को लेकर देश भर में जागरूकता बढ़ रही है। लेकिन किसी भी बड़े सामाजिक बदलाव की असली सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह समाज के अंतिम व्यक्ति तक किस रूप में पहुंच रही है। ग्रामीण भारत, जो हमारे देश की आत्मा है, वहां इस तरह के मुद्दों पर खुलकर बात करना आज भी एक चुनौती माना जाता है। इस रूढ़िवादिता को तोड़ते हुए झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले का केरूआडूंगरी पंचायत आज पूरे देश के सामने एक नई और प्रेरणादायक मिसाल पेश कर रहा है। पंचायती राज व्यवस्था और सामुदायिक सहभागिता के अनूठे समन्वय से इस पंचायत ने महिला स्वास्थ्य की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है, जिसकी गूंज पूरे राज्य में सुनाई दे रही है।
तीन वर्षों का कठिन संघर्ष के बाद मुहिम हुआ सफल
केरूआडूंगरी पंचायत के प्रत्येक गांव और टोले की महिलाओं को माहवारी स्वच्छता के प्रति जागरूक करने और उनके बेहतर स्वास्थ्य के लिए सैनिटरी पैड के उपयोग को बढ़ावा देने की मुहिम लगभग तीन वर्ष पहले शुरू की गई थी। शुरुआत में ग्रामीण महिलाओं के बीच संकोच, झिझक और सामाजिक रूढ़ियों की एक बड़ी दीवार थी, जिसे पार करना आसान नहीं था। लेकिन पंचायत के जनप्रतिनिधियों, समर्पित सामाजिक कार्यकर्ताओं, और 'निश्चय फाउंडेशन' तथा 'प्रोजेक्ट बाला' जैसी संस्थाओं ने इस चुनौती को स्वीकार किया। तीन सालों तक बिना रुके लगातार चलाए गए सघन जागरूकता अभियानों, कार्यशालाओं और घर-घर जाकर की गई काउंसलिंग का परिणाम आज एक ऐतिहासिक बदलाव के रूप में सबके सामने है।
'मेंस्ट्रुअल वेस्ट फ्री विलेज' का वास्तविक अर्थ और महत्व
मेंस्ट्रुअल वेस्ट फ्री विलेज" (माहवारी अपशिष्ट मुक्त गांव) का तात्पर्य एक ऐसे आदर्श गांव से है, जहां की महिलाएं और किशोरियां माहवारी के दौरान केवल पर्यावरण के अनुकूल, बार-बार इस्तेमाल किए जा सकने वाले (रियूजेबल) सैनिटरी पैड या अन्य सुरक्षित विकल्पों का उपयोग करती हैं। आम तौर पर जब कोई गांव सैनिटरी पैड के इस्तेमाल को अपनाता है, तो वहां प्लास्टिक युक्त पैड्स के कचरे का एक नया संकट खड़ा हो जाता है, जो सदियों तक नष्ट नहीं होता। इसका अर्थ यह है कि इस गांव से माहवारी से जुड़ा ऐसा कोई भी कचरा बाहर नहीं निकलता जो मिट्टी, जल या पर्यावरण को प्रदूषित करे। यह व्यवस्था न केवल महिलाओं के स्वास्थ्य को सुरक्षित रखती है, बल्कि जैव-अपघटनीय (बायोडिग्रेडेबल) विकल्पों के कारण कचरा प्रबंधन की समस्या को भी जड़ से समाप्त कर देती है।
तुरामडीह गांव ने रचा इतिहास, बना पहला कचरा मुक्त गांव
शनिवार का दिन केरूआडूंगरी पंचायत के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय की तरह दर्ज हो गया, जब तुरामडीह गांव को पंचायत का पहला "मेंस्ट्रुअल वेस्ट फ्री विलेज" घोषित किया गया। वर्तमान में इस गांव की शत-प्रतिशत महिलाएं और किशोरियां पारंपरिक और असुरक्षित तौर-तरीकों तथा प्लास्टिक वाले पैड्स को पूरी तरह छोड़कर रियूजेबल सैनिटरी पैड अपना चुकी हैं। इस ऐतिहासिक कदम से न केवल गांव की महिलाओं को हर महीने बाजार से महंगे सैनिटरी पैड खरीदने के आर्थिक बोझ से मुक्ति मिली है, बल्कि गांव की नालियों, खेतों और सड़कों पर पैड्स के कचरे का दिखना भी पूरी तरह बंद हो गया है। तुरामडीह की महिलाओं ने समाज के पुराने टैबू को तोड़कर अपनी आत्मनिर्भरता साबित की है।
पूरे पंचायत को मॉडल बनाने का संकल्प
तुरामडीह गांव की इस अभूतपूर्व सफलता के बाद अब इस अभियान को और गति दी जा रही है। पंचायत प्रशासन और सामाजिक संस्थाओं का अगला लक्ष्य केरूआडूंगरी पंचायत के अंतर्गत आने वाले अन्य सभी गांवों को भी जल्द से जल्द इसी तर्ज पर "मेंस्ट्रुअल वेस्ट फ्री विलेज" घोषित करना है। जब इस पंचायत के सभी गांव इस लक्ष्य को हासिल कर लेंगे, तो यह समूचा पंचायत ही पूरी तरह से मेंस्ट्रुअल वेस्ट फ्री बन जाएगा। रणनीतिक योजना के अनुसार, आगामी कुछ महीनों में हर गांव में विशेष शिविर लगाकर किशोरियों को प्रशिक्षित किया जाएगा, जिससे यह संभवतः झारखंड राज्य का पहला पूर्ण माहवारी अपशिष्ट मुक्त पंचायत होने का गौरव प्राप्त करेगा।
नागरिकों के स्वास्थ्य व सोच में सुधार से होता है गांवों का वास्तविक विकास
मुखिया कान्हू मुर्मू ने अपने संबोधन में कहा कि आज हमारे पंचायत के तुरामडीह गांव ने जो मुकाम हासिल किया है, उस पर हमें गर्व है। एक जनप्रतिनिधि के रूप में मेरा हमेशा से मानना रहा है कि गांवों का वास्तविक विकास केवल पक्की सड़कों या नालियों के निर्माण से नहीं, बल्कि वहां रहने वाले नागरिकों के स्वास्थ्य और सोच में सुधार से होता है। हमारी माताओं, बहनों और बेटियों का स्वास्थ्य ही हमारे समाज की असली पूंजी है। आज तुरामडीह की हर महिला ने पर्यावरण के अनुकूल रियूजेबल पैड अपनाकर न सिर्फ अपने स्वास्थ्य की रक्षा की है, बल्कि आर्थिक बचत का एक नया रास्ता भी चुना है। हमारा यह संकल्प यहीं नहीं रुकेगा, बल्कि बहुत जल्द हम केरूआडूंगरी पंचायत के हर एक गांव को मेंस्ट्रुअल वेस्ट फ्री बनाकर पूरे झारखंड में एक नया कीर्तिमान स्थापित करेंगे।
गांवों में इस विषय पर बात करना भी पाप समझा जाता था
झारखंड में माहवारी स्वच्छता के क्षेत्र में क्रांति लाने वाले और 'पैडमैन' के नाम से मशहूर निश्चय फाउंडेशन के संस्थापक तरुण कुमार ने कहा कि लगभग एक दशक पहले जब हमने ग्रामीण क्षेत्रों में माहवारी स्वच्छता और महिला मुद्दों पर काम करना शुरू किया था, तब गांवों में इस विषय पर बात करना भी पाप समझा जाता था। हमने तब एक सपना देखा था कि एक दिन हमारी ग्रामीण महिलाएं इस शर्म और अंधविश्वास को पीछे छोड़कर अपने हक और स्वास्थ्य के लिए आगे आएंगी। आज तुरामडीह गांव को देखकर लग रहा है कि सालों का हमारा वह संघर्ष और तपस्या सफल हो रही है। सामाजिक और व्यावहारिक बदलाव लाने में स्थानीय पंचायत और मुखिया जैसे जनप्रतिनिधियों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। केरूआडूंगरी पंचायत ने जो कर दिखाया है, वह निकट भविष्य में न केवल झारखंड बल्कि समूचे भारत के हजारों पंचायतों के लिए मार्गदर्शन और एक नई मिसाल का काम करेगा।
स्थानीय महिलाओं की मदद से मुहिम को धरातल पर उतारा
इस परिवर्तन के पीछे स्थानीय महिला नेतृत्व और जमीनी कार्यकर्ताओं की सबसे बड़ी भूमिका रही है। कार्यक्रम के दौरान गांव की सैकड़ों महिलाओं और किशोरियों की उपस्थिति ने इस उत्सव को और खास बना दिया। इस अवसर पर मुख्य रूप से सहिया साथी शुरुबाली हेंब्रम, आंगनबाड़ी सेविका सविता नायक, सहिया रानदाय हो, वार्ड सदस्य सुमन पाडेया और टीएसएफ फेलो सिदलाल टुडू उपस्थित थे। इन सभी महिला योद्धाओं ने घर-घर जाकर अलख जगाई थी। कार्यक्रम के अंत में सभी महिलाओं ने सामूहिक रूप से शपथ ली कि वे इस स्वास्थ्यप्रद और पर्यावरण-अनुकूल बदलाव को न सिर्फ जारी रखेंगी, बल्कि आसपास के अन्य गांवों की महिलाओं को भी इसके प्रति प्रेरित करेंगी।

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