Jamshedpur News: जमशेदपुर में संताली भाषा और शिक्षा के अधिकारों को लेकर विभिन्न आदिवासी संगठनों का एक संयुक्त प्रतिनिधिमंडल कोल्हान विश्वविद्यालय प्रशासन से मिला। प्रतिनिधिमंडल ने संताली भाषा के पाठ्यक्रम और परीक्षा व्यवस्था में ओलचिकी लिपि को अनिवार्य रूप से लागू करने की मांग उठाई। संगठनों का कहना है कि संताली भाषा की मूल पहचान ओलचिकी लिपि से जुड़ी हुई है और इसे शिक्षा व्यवस्था में पूरी तरह सम्मान मिलना चाहिए।
प्रतिनिधिमंडल ने विश्वविद्यालय प्रशासन को एक सूत्री मांग पत्र सौंपते हुए कहा कि संताली भाषा के छात्रों के हित में जल्द सकारात्मक निर्णय लिया जाए।

विभिन्न संगठनों ने मिलकर उठाई आवाज
इस संयुक्त प्रतिनिधिमंडल में कई प्रमुख आदिवासी और संताली भाषा से जुड़े संगठन शामिल थे। इनमें ऑल इंडिया संताली राइटर्स एसोसिएशन, आसेका, फोरम फॉर संताली लैंग्वेज तथा ऑल संताल इंटेलेक्चुअल एसोसिएशन के प्रतिनिधि शामिल थे। संगठनों के सदस्यों ने कहा कि संताली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान मिलने के बावजूद अब भी कई शैक्षणिक संस्थानों में ओलचिकी लिपि को अपेक्षित महत्व नहीं मिल रहा है। इससे छात्रों को पढ़ाई और परीक्षा में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

ओलचिकी लिपि में सिलेबस और प्रश्न पत्र की मांग
प्रतिनिधिमंडल की मुख्य मांग थी कि संताली भाषा का पूरा सिलेबस और सभी प्रश्न पत्र केवल ओलचिकी लिपि में ही तैयार किए जाएं। प्रतिनिधियों ने कहा कि ओलचिकी संताली भाषा की मूल और वैज्ञानिक लिपि है, जिसे संताली समाज की सांस्कृतिक पहचान के रूप में देखा जाता है।
उन्होंने बताया कि कई बार प्रश्न पत्र दूसरी लिपियों में प्रकाशित होने से विद्यार्थियों को असुविधा होती है और उनकी शैक्षणिक तैयारी प्रभावित होती है। इसलिए विश्वविद्यालय को स्पष्ट नीति बनाकर ओलचिकी लिपि को अनिवार्य करना चाहिए। प्रतिनिधिमंडल का कहना था कि यह केवल भाषा का नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की सांस्कृतिक अस्मिता और अधिकारों का भी प्रश्न है।

विश्वविद्यालय प्रशासन के साथ हुई विस्तृत चर्चा
कुलपति की अनुपस्थिति में प्रतिनिधिमंडल ने उनके सचिव को मांग पत्र सौंपा। इसके बाद प्रतिनिधियों ने विश्वविद्यालय के डीन डॉ. तपन कुमार के साथ इस विषय पर विस्तृत चर्चा की। बैठक में संताली भाषा की वर्तमान स्थिति, पाठ्यक्रम व्यवस्था और परीक्षा प्रणाली से जुड़े कई मुद्दों पर विचार-विमर्श हुआ। प्रतिनिधियों ने डीन को बताया कि राज्य और देश के विभिन्न हिस्सों में संताली भाषा को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास हो रहे हैं। ऐसे में विश्वविद्यालय स्तर पर भी संताली भाषा और ओलचिकी लिपि को उचित सम्मान मिलना आवश्यक है।

डीन ने दिया सकारात्मक आश्वासन
बैठक के दौरान डीन डॉ. तपन कुमार ने प्रतिनिधिमंडल को आश्वस्त किया कि भविष्य में संताली भाषा के प्रश्न पत्र ओलचिकी लिपि में ही प्रकाशित किए जाएंगे। इस आश्वासन के बाद प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने संतोष व्यक्त किया और उम्मीद जताई कि विश्वविद्यालय जल्द ही इस दिशा में ठोस कदम उठाएगा। संगठनों ने कहा कि यदि विश्वविद्यालय प्रशासन इस मांग को पूरी तरह लागू करता है तो इससे संताली भाषा के विद्यार्थियों को काफी लाभ मिलेगा और भाषा संरक्षण को भी मजबूती मिलेगी।

प्रतिनिधिमंडल में कई प्रमुख लोग रहे शामिल
इस प्रतिनिधिमंडल में संताली भाषा और आदिवासी समाज से जुड़े कई प्रमुख शिक्षाविद् और सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित थे। इनमें प्रो. लखाई बास्के, प्रो. बाबूराम सोरेन, आसेका के महासचिव शंकर सोरेन और संताली राइटर्स एसोसिएशन के सहायक महासचिव मानसिंह मांझी प्रमुख रूप से शामिल थे। प्रतिनिधियों ने कहा कि संताली भाषा और ओलचिकी लिपि के संरक्षण और विकास के लिए समाज को संगठित होकर प्रयास करना होगा। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में शैक्षणिक संस्थानों में संताली भाषा को और अधिक सम्मान और पहचान मिलेगी।