Jamshedpur News : जमशेदपुर के
मातृभाषा मां के दूध के समान: मुखिया
उद्घाटन के दौरान मुखिया कान्हू मुर्मू ने भाषा और पहचान पर गहरा प्रकाश डाला। उन्होंने एक बेहद भावनात्मक उदाहरण देते हुए कहा कि "मातृभाषा मां के दूध के समान है।" जिस प्रकार एक बच्चे के पोषण के लिए मां का दूध अनिवार्य है, उसी प्रकार समाज के मानसिक और सांस्कृतिक विकास के लिए अपनी भाषा का ज्ञान होना अनिवार्य है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अन्य भाषाओं की तुलना में अपनी मातृभाषा में शिक्षा ग्रहण करना और भावों को व्यक्त करना कहीं अधिक सरल और प्रभावशाली होता है।
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आधुनिक शिक्षा के साथ पारंपरिक लिपि का मेल
आज के वैश्वीकरण के दौर में जहाँ हिंदी और अंग्रेजी शिक्षा और रोजगार के लिए आवश्यक हैं, वहीं कान्हू मुर्मू ने संतुलित विकास की बात कही। उन्होंने छात्रों से अपील की कि वे भले ही हिंदी या अंग्रेजी माध्यम से उच्च शिक्षा प्राप्त करें, लेकिन उन्हें अपनी मूल लिपि 'ओलचिकी' में लिखना और पढ़ना अनिवार्य रूप से सीखना चाहिए। यह संदेश स्पष्ट था: आधुनिक बनें, लेकिन अपनी पहचान को पीछे न छोड़ें। उनके अनुसार, अपनी लिपि का ज्ञान ही एक संताली व्यक्ति को उसकी सांस्कृतिक विरासत से जोड़कर रखता है।
सिर्फ संताली समाज में जन्म लेना ही काफी नहीं है
समारोह में इस बात पर विशेष चर्चा हुई कि सिर्फ संताली समाज में जन्म लेना ही काफी नहीं है। समाज के प्रत्येक व्यक्ति की यह जिम्मेदारी है कि वह अपनी भाषा और संस्कृति को आगे बढ़ाए। मुखिया ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा को लेकर काफी सजग और उत्साहित दिख रही है। युवाओं की यह सक्रियता समाज में बढ़ती जागरूकता का परिचायक है। उन्होंने इस केंद्र को आने वाले समय में समाज के बौद्धिक विकास का केंद्र बताया।
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80 छात्र-छात्राओं ने अपना पंजीकरण कराया
केंद्र की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उद्घाटन के पहले ही दिन 80 छात्र-छात्राओं ने अपना पंजीकरण कराया। ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा के प्रति ऐसा उत्साह एक सकारात्मक बदलाव का संकेत है। कार्यक्रम के दौरान छात्रों ने अतिथियों का स्वागत अपनी परंपरा के अनुसार किया। अतिथियों को पत्तों से बना मुकुट पहनाकर सम्मानित किया गया, जो संताली संस्कृति की सादगी और प्रकृति प्रेम को दर्शाता है।
केंद्र के संचालन में महिला शिक्षकों की बड़ी भूमिका
इस केंद्र के संचालन में महिला शिक्षकों की बड़ी भूमिका है, जो समाज में महिला सशक्तिकरण का भी उदाहरण है। कार्यक्रम के दौरान शिक्षक सुमित्रा बास्के, अहला हांसदा, सीता सोरेन, जोबा बेसरा, पूर्णिमा टुडू, दुलारी हांसदा और सिनगो सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित थे। इन शिक्षकों ने संकल्प लिया कि वे गांव के बच्चों को ओलचिकी लिपि में निपुण बनाएंगे ताकि भविष्य में वे अपनी संस्कृति के संवाहक बन सकें। इस अवसर पर बड़ी संख्या में अभिभावक और ग्रामीण भी मौजूद रहे, जिन्होंने इस पहल की सराहना की।

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