Jharkhand news: झारखंड में एक बार फिर ‘सरना धर्म कोड’ को जनगणना में शामिल करने की मांग जोर पकड़ने लगी है। राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए राष्ट्रपति को पत्र लिखकर आदिवासी समुदाय की धार्मिक पहचान को अलग से दर्ज करने की अपील की है। लंबे समय से आदिवासी समाज यह मांग करता रहा है कि उनकी आस्था, परंपरा और प्रकृति-पूजक जीवनशैली को अलग धर्म के रूप में मान्यता मिले।

राष्ट्रपति को पत्र लिखकर उठाया मुद्दा
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने पत्र में कहा है कि देश की जनगणना में आदिवासी समुदाय की धार्मिक पहचान स्पष्ट रूप से सामने नहीं आ पाती है। उन्होंने आग्रह किया कि वर्ष 2027 की जनगणना में ‘सरना धर्म कोड’ को शामिल किया जाए, ताकि आदिवासियों की वास्तविक धार्मिक स्थिति दर्ज हो सके। उन्होंने यह भी कहा कि इससे नीति निर्माण में सटीकता आएगी और आदिवासी समाज के हितों की बेहतर सुरक्षा हो सकेगी।
 

आदिवासी समाज की पहचान का सवाल
झारखंड सहित देश के कई राज्यों में रहने वाला आदिवासी समुदाय प्रकृति की पूजा करता है और ‘सरना’ उनकी आस्था का प्रमुख केंद्र है। लेकिन वर्तमान में जनगणना के दौरान उन्हें हिंदू, ईसाई या अन्य धर्मों के अंतर्गत दर्ज कर लिया जाता है, जिससे उनकी विशिष्ट पहचान धुंधली हो जाती है। इस वजह से आदिवासी संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने लंबे समय से अलग धर्म कोड की मांग उठाई है।

राजनीतिक और सामाजिक समर्थन भी मिल रहा 
इस मुद्दे को झारखंड की राजनीति में भी व्यापक समर्थन मिल रहा है। विभिन्न दलों और संगठनों ने सरना धर्म कोड को लागू करने की मांग को उचित ठहराया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के इस कदम को आदिवासी हितों की दिशा में बड़ा प्रयास माना जा रहा है। साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि इससे आदिवासी संस्कृति और परंपराओं को संरक्षित करने में मदद मिलेगी।


जनगणना 2027 में शामिल करने की उम्मीद
राज्य सरकार को उम्मीद है कि केंद्र सरकार इस मांग पर सकारात्मक विचार करेगी और 2027 की जनगणना में सरना धर्म कोड को शामिल किया जाएगा। यदि ऐसा होता है, तो पहली बार देशभर में आदिवासी समुदाय की वास्तविक संख्या और उनकी धार्मिक पहचान स्पष्ट रूप से सामने आ सकेगी। इससे योजनाओं और संसाधनों के वितरण में भी पारदर्शिता आएगी।

यह आदिवासी अस्मिता और सम्मान से जुड़ा विषय
सरना धर्म कोड की मांग केवल एक प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि यह आदिवासी अस्मिता और सम्मान से जुड़ा विषय है। यदि इसे मान्यता मिलती है, तो यह आदिवासी समाज के लिए ऐतिहासिक कदम साबित होगा। इससे उनकी सांस्कृतिक पहचान को मजबूती मिलेगी और आने वाली पीढ़ियों के लिए उनकी परंपराओं का संरक्षण सुनिश्चित हो सकेगा। मुख्यमंत्री का यह प्रयास इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।