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दलमा को लेकर आदिवासियों ने उठाई हक और अधिकार की आवाज

 Jamshedpur News: परसुडीह क्षेत्र स्थित गदड़ा में मंगलवार को 'दलमा बुरू सेंदरा समिति' की एक महत्वपूर्ण बैठक संपन्न हुई। दलमा राजा राकेश हेंब्रम की अध्यक्षता में आयोजित इस बैठक में न केवल आगामी सेंदरा पर्व की तिथि तय की गई, बल्कि आदिवासी समाज के पारंपरिक अधिकारों और वन विभाग की कार्यशैली पर भी गंभीर चर्चा हुई। यह बैठक इसलिए भी खास रही क्योंकि इसमें स्वशासन व्यवस्था के प्रमुखों—परगना, माझी बाबा और मानकी-मुंडा ने हिस्सा लिया और एकजुट होकर अपनी विरासत को बचाने का संकल्प लिया।




27 अप्रैल को मनेगा सेंदरा पर्व: 3 अप्रैल को जारी होगा 'गिरा सकाम'

बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि इस वर्ष 27 अप्रैल को पारंपरिक सेंदरा पर्व मनाया जाएगा। हालांकि, इसकी आधिकारिक और सार्वजनिक घोषणा एक विशेष प्रक्रिया के तहत की जाएगी। दलमा राजा राकेश हेंब्रम ने बताया कि 3 अप्रैल को गदड़ा में सेंदरा पूजा का आयोजन होगा। इसके पश्चात, 'गिरा सकाम' (खजूर के पत्तों से बना पारंपरिक निमंत्रण पत्र) सेंदरा वीरों को भेजा जाएगा। यह आदिवासियों की सदियों पुरानी संचार पद्धति है, जिसके माध्यम से पर्व की तिथि को अंतिम रूप से सार्वजनिक किया जाता है।



वन विभाग की कार्रवाई पर नाराजगी और सीएम से मिलने की तैयारी

सेंदरा समिति ने वन विभाग के रवैये पर कड़ा ऐतराज जताया है। राकेश हेंब्रम का कहना है कि आदिवासी समाज साल में केवल एक दिन अपनी परंपरा निभाने जंगल जाता है, लेकिन वन विभाग उन्हें अपराधी की तरह देखता है। सेंदरा के दिन आदिवासियों को परेशान करना और उनके पारंपरिक हथियार (तीर-धनुष) छीनना गलत है। समिति ने निर्णय लिया है कि वे जल्द ही मुख्यमंत्री से मिलकर एक मांग पत्र सौंपेंगे, जिसमें आदिवासियों की धार्मिक स्वतंत्रता और पारंपरिक अधिकारों की रक्षा की मांग की जाएगी।

"वन विभाग अपने मूल काम से भटका": पर्यटन पर उठाए सवाल

दलमा राजा ने वन विभाग पर तीखा हमला करते हुए कहा कि विभाग जंगलों को बचाने के बजाय उसे 'पर्यटन केंद्र' बनाने में जुटा है। उन्होंने तर्क दिया कि जंगल पशु-पक्षियों का घर है, लेकिन वहां रिसॉर्ट और कंक्रीट के भवन बनाकर मानवीय दखल बढ़ाया जा रहा है। आदिवासियों के अनुसार, जंगली जानवरों के शहर और गांवों की ओर रुख करने का मुख्य कारण वनों का व्यवसायीकरण है। उन्होंने मांग की कि जंगलों में रिसॉर्ट निर्माण बंद हो और शहरी आबादी को जंगल के पास बसने से रोका जाए।

मालगुजारी का दावा: दलमा पहाड़ पर ऐतिहासिक अधिकार

बैठक में एक ऐतिहासिक तथ्य भी सामने रखा गया। राकेश हेंब्रम ने दावा किया कि 1970-80 के दशक तक दलमा पहाड़ की मालगुजारी (लगान) उनके पूर्वजों के नाम पर कटती थी, जिसे बाद में बंद कर दिया गया। अब सेंदरा समिति इस मालगुजारी व्यवस्था को फिर से बहाल करने की मांग कर रही है। उनका तर्क है कि चूंकि यह भूमि आदिवासियों की पैतृक विरासत है, इसलिए इस पर उनका प्रशासनिक और मालिकाना हक कानूनी रूप से भी मान्य होना चाहिए।

राजस्व में 25% हिस्सेदारी की मांग

समिति का कहना है कि आज वन विभाग दलमा में सफारी वाहन, गेस्ट हाउस और रिसॉर्ट चलाकर अच्छा-खासा मुनाफा कमा रहा है। राकेश हेंब्रम ने मांग की है कि इस आय का कम से कम 25 प्रतिशत हिस्सा 'दलमा बुरु सेंदरा समिति' को मिलना चाहिए। उनका तर्क सीधा है—दलमा आदिवासियों की धरोहर है और यदि इसके नाम पर कोई व्यापार हो रहा है, तो उस लाभ का बड़ा हिस्सा उस समाज के विकास पर खर्च होना चाहिए जो सदियों से इस पहाड़ की रक्षा कर रहा है।

1340 ईस्वी से चली आ रही है परंपरा

आदिवासी समाज का दलमा से जुड़ाव कोई नया नहीं है। राकेश हेंब्रम ने बताया कि दलमा की तराई में वर्ष 1340 ई. से सेंदरा पर्व मनाया जा रहा है। लगभग 686 वर्षों से आदिवासी समाज यहां वन देवी-देवताओं की पूजा करता आ रहा है। यह लंबी परंपरा ही इस बात का प्रमाण है कि दलमा और आदिवासियों का रिश्ता अटूट है। समिति ने स्पष्ट कर दिया है कि वे अपने इस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक हक के लिए आगे भी आवाज उठाते रहेंगे।

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