तालाब से शुरू हुआ विवाद और खूनी संघर्ष
इस पूरे विवाद की जड़ गांव के 'खाता संख्या-98, प्लॉट संख्या-417' में स्थित एक तालाब है। इस तालाब पर होपना मुर्मू अपना मालिकाना हक जताते हैं, जबकि गांव के ग्रामप्रधान दारजी मुर्मू का दावा कुछ और है। विवाद 19 मार्च 2021 को तब हिंसक रूप ले लिया, जब होपना मुर्मू मछली पकड़ने के लिए तालाब पर गए थे। ग्रामप्रधान और उनके समर्थकों ने उन्हें वहां से हटने को कहा, जिसके बाद दोनों पक्षों के बीच तीखी नोकझोंक हुई। यह छोटी सी बहस देखते ही देखते एक खूनी संघर्ष में बदल गई, जिसने एक हंसते-खेलते परिवार को बेघर कर दिया।
पेड़ से बांधकर पिटाई और घर में तोड़फोड़
पीड़ित परिवार का आरोप है कि विवाद के दिन ग्रामप्रधान दारजी मुर्मू और उनके साथियों ने मिलकर होपना मुर्मू के परिवार पर जानलेवा हमला किया। हैवानियत का आलम यह था कि परिवार के सदस्यों को पेड़ से बांधकर बेरहमी से पीटा गया। इतना ही नहीं, हमलावरों ने उनके घर को बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया और घर में रखे कीमती सामान को लूट लिया। इस घटना ने परिवार के मन में ऐसा खौफ पैदा कर दिया कि वे अपनी जान बचाने के लिए गांव छोड़ने पर मजबूर हो गए।
मवेशियों की लूट और आर्थिक तबाही
आदिवासी समाज में खेती और मवेशी ही जीवन यापन का मुख्य आधार होते हैं। होपना मुर्मू ने बताया कि हमले के दौरान न केवल उनके घर को तोड़ा गया, बल्कि उनके पास जितने भी मवेशी (गाय-बैल आदि) थे, उन्हें भी विपक्षी दल अपने साथ हांक कर ले गए। अचानक हुए इस हमले और संपत्ति के नुकसान ने परिवार को आर्थिक रूप से पूरी तरह तोड़ दिया। उनके पास न रहने को छत बची और न ही जीविका का कोई साधन, जिसके कारण उन्हें पलायन का कड़वा घूँट पीना पड़ा।
गम्हरिया में शरण और 5 वर्षों का अज्ञातवास
गांव से भागने के बाद होपना मुर्मू का परिवार सरायकेला-खरसावां जिले के गम्हरिया क्षेत्र स्थित शिवनारायणपुर में जाकर रहने लगा। पिछले 5 वर्षों से यह परिवार किसी तरह मजदूरी और अन्य छोटे-मोटे काम करके अपना पेट पाल रहा है। अपनी ही जमीन और अपने ही घर से दूर रहना उनके लिए किसी मानसिक प्रताड़ना से कम नहीं रहा है। हर दिन उन्हें अपने पैतृक गांव की याद सताती है, लेकिन वहां वापस जाने का ख्याल आते ही वह खौफनाक मंजर उनकी आंखों के सामने तैरने लगता है।
उपायुक्त से सुरक्षा और घर वापसी की मांग
बुधवार को होपना मुर्मू, आदिवासी सेंगेल अभियान के नेता सोनाराम सोरेन और जूनियर मुर्मू के साथ उपायुक्त कार्यालय पहुंचे। उन्होंने डीसी को एक ज्ञापन सौंपकर अपनी आपबीती सुनाई। होपना मुर्मू ने स्पष्ट कहा कि वे अपने पैतृक गांव पड़ासीडुंगरी वापस जाना चाहते हैं और अपनी जमीन पर खेती करना चाहते हैं। हालांकि, उन्हें डर है कि ग्रामप्रधान और उनके लोग फिर से उन पर हमला कर सकते हैं। इसलिए उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि उन्हें सुरक्षा घेरे में गांव पहुँचाया जाए और वहां रहने के दौरान उन्हें उचित सुरक्षा मुहैया कराई जाए।
सामाजिक संगठनों का समर्थन और न्याय की उम्मीद
इस लड़ाई में 'आदिवासी सेंगेल अभियान' जैसे संगठन भी परिवार के साथ खड़े हैं। कार्यकर्ताओं का कहना है कि एक गरीब आदिवासी परिवार को पांच साल तक अपने ही घर से बाहर रहना पड़े, यह प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है। अब जब मामला फिर से प्रशासन के संज्ञान में आया है, तो परिवार को उम्मीद है कि डीसी इस पर कड़ा संज्ञान लेंगे। उन्हें उम्मीद है कि न केवल उन्हें उनका घर और जमीन वापस मिलेगी, बल्कि उनके मवेशियों और घर के नुकसान की भरपाई भी की जाएगी।

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