Majhi Pargana Mahal : पूर्वी सिंहभूम जिले के घाटशिला प्रखंड अंतर्गत पावड़ा के सिदो-कान्हू मैदान में शनिवार को एक ऐतिहासिक दृश्य देखने को मिला। अवसर था धाड़ दिशोम माझी परगना महाल के 15वें दो दिवसीय महासम्मेलन का। इस सम्मेलन का शुभारंभ पारंपरिक विधि-विधान से पूजा-अर्चना और समाज के अमर शहीदों व दिवंगत परगना बाबाओं की तस्वीरों पर माल्यार्पण के साथ हुआ। यह महासम्मेलन केवल एक सभा नहीं, बल्कि झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल से आए सैकड़ों प्रतिनिधियों (डेलीगेट्स) का एक ऐसा साझा मंच है, जहाँ आदिवासी समाज के वजूद, उनकी अस्मिता और उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए रणनीति तैयार की जा रही है। वर्तमान विषम परिस्थितियों में, जहाँ आदिवासी समाज अपनी पहचान और अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है, वहां इस तरह के विचार-मंथन की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। सम्मेलन के पहले दिन वक्ताओं ने समाज के आंतरिक सुधारों और भविष्य की चुनौतियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। सम्मेलन के देश परगना धाड़ दिशोम बैजू मुर्मू, पारानिक दुर्गा चरण मुर्मू, परगना बाबा हरिपोदो मुर्मू, तोरोप परगना दसमत हांसदा, सुशील हांसदा, बैजू टुडू, पुंता मुर्मू, पद्मावती हेंब्रम, लेदेम किस्कू, बिरेन टुडू, शत्रुघ्न मुर्मू, सुशील मुर्मू, सुशांत हेंब्रम, बिंदे सोरेन समेत आदि काफी संख्या में समाज के प्रतिनिधि उपस्थित थे.

'माझी बाबा' केवल एक पद नहीं, बल्कि एक गहरी जिम्मेदारी है
महासम्मेलन को संबोधित करते हुए देश परगना बैजू मुर्मू ने अत्यंत महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने स्पष्ट किया कि 'माझी बाबा' केवल एक पद नहीं, बल्कि एक गहरी जिम्मेदारी है। आदिवासी समाज की स्वशासन व्यवस्था आदिकाल से चली आ रही है और इसकी गरिमा को बनाए रखना हर माझी बाबा का परम कर्तव्य है। उन्होंने आह्वान किया कि गांव के माझी बाबा, तोरोप परगना और पारानिक अपनी जवाबदेही को समझें। समाज को उन्नति और प्रगति की राह पर ले जाने के लिए इन पदों पर आसीन व्यक्तियों को नि:स्वार्थ भाव से कार्य करना होगा। माझी बाबा को समाज के अंतिम व्यक्ति के हित में निष्पक्ष फैसले लेने चाहिए, ताकि परंपरा की पवित्रता बनी रहे।
स्वशासन व्यवस्था में ईर्ष्या या भेदभाव के लिए कोई स्थान नहीं
बैजू मुर्मू ने अपने संबोधन में नैतिकता और सामाजिक सद्भाव पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि हमारी पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था में किसी के प्रति द्वेष, ईर्ष्या या भेदभाव के लिए कोई स्थान नहीं है। यदि किसी माझी बाबा या परगना के मन में किसी व्यक्ति विशेष के प्रति दुर्भावना है, तो वह न्याय नहीं कर सकता। स्वशासन व्यवस्था का मूल मंत्र ही 'सबका साथ और सबका न्याय' है। उन्होंने स्वशासन के प्रमुखों को सचेत किया कि वे व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर जनहित में कार्य करें। जब निर्णय नि:स्वार्थ और पारदर्शी होंगे, तभी समाज में व्यवस्था के प्रति विश्वास और मजबूत होगा।
समाज में पनपते असंतोष पर चिंतन जरूरी
सम्मेलन के दौरान समाज में हाल के दिनों में पनप रहे असंतोष पर भी चिंता व्यक्त की गई। बैजू मुर्मू ने स्वीकार किया कि यदि लोगों के मन में अपनी ही व्यवस्था के प्रति असंतोष की भावना आ रही है, तो इसका सीधा अर्थ है कि कहीं न कहीं कोई चूक हो रही है। उन्होंने कहा कि इस 'चूक' को पहचानने के लिए गहन मंथन की आवश्यकता है। क्या हम आधुनिकता के दौर में अपनी जड़ों को भूल रहे हैं? या फिर पद का अहंकार सामाजिक कर्तव्यों पर भारी पड़ रहा है? इन बिंदुओं पर चिंतन करना जरूरी है ताकि भविष्य में ऐसी गलतियों को सुधारा जा सके और समाज का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित हो सके।
भाषा, संस्कृति और धरोहरों को बचाने का लिया संकल्प
आदिवासी समाज की पहचान उसकी समृद्ध भाषा, अनूठी संस्कृति, पारंपरिक रीति-रिवाज और विशेष पूजा पद्धति में निहित है। महासम्मेलन में इन धरोहरों को बचाए रखने की अपील की गई। वक्ताओं ने कहा कि जल-जंगल-जमीन के साथ-साथ हमारी सांस्कृतिक विरासत भी खतरे में है। इसे बचाने के लिए स्वशासन व्यवस्था के सभी प्रमुखों को समय-समय पर एक साथ बैठकर विचार-विमर्श करना चाहिए। परस्पर संवाद और आपसी तालमेल ही वह रास्ता है, जिससे हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को उनकी असली पहचान सौंप पाएंगे। भाषा और लिपि का संरक्षण इसमें सबसे अहम कड़ी है।
तीन राज्यों के प्रतिनिधियों का हुआ समागम
इस 15वें महासम्मेलन की भव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें झारखंड के अलावा पड़ोसी राज्य ओडिशा और पश्चिम बंगाल के भी सैकड़ों डेलीगेट्स ने शिरकत की। यह इस बात का प्रतीक है कि आदिवासी समाज भौगोलिक सीमाओं से परे अपनी सांस्कृतिक एकता के लिए एकजुट है। विभिन्न क्षेत्रों से आए बुद्धिजीवियों ने अपने-अपने अनुभवों को साझा किया और आदिवासी समाज के वजूद को बचाने के लिए नए विचार प्रस्तुत किए। इस एकजुटता ने यह संदेश दिया कि अपनी समस्याओं के समाधान के लिए पूरा आदिवासी समाज अब एक स्वर में बोलने को तैयार है।
संवैधानिक अधिकारों व पेसा कानून पर मंथन कल
महासम्मेलन का दूसरा दिन (रविवार) अत्यंत महत्वपूर्ण होने वाला है। इसमें आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों और विशेष रूप से 'पेसा कानून-2025' (PESA Act) पर विस्तार से परिचर्चा की जाएगी। स्वशासन व्यवस्था को संवैधानिक मजबूती कैसे मिले और पेसा कानून के प्रावधानों को धरातल पर कैसे प्रभावी बनाया जाए, यह इस चर्चा का मुख्य केंद्र होगा। आदिवासी बुद्धिजीवियों का मानना है कि जब तक समाज को उनके संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं किया जाएगा, तब तक सर्वांगीण विकास की कल्पना अधूरी है। इसके अलावा शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक आत्मनिर्भरता जैसे बिंदुओं पर भी ठोस रणनीति बनाई जाएगी।
समाज के हर वर्ग को साथ लेकर ही प्रगति संभव
सम्मेलन में उपस्थित प्रतिनिधियों की बड़ी संख्या यह बताती है कि समाज में चेतना का संचार हो रहा है। देश परगना बैजू मुर्मू के साथ-साथ पारानिक दुर्गा चरण मुर्मू, हरिपोदो मुर्मू, दसमत हांसदा और अन्य ने सामूहिक नेतृत्व की शक्ति को प्रदर्शित किया। महिलाओं की भागीदारी ने यह स्पष्ट किया कि समाज के हर वर्ग को साथ लेकर ही प्रगति संभव है। यह महासम्मेलन कोल्हान और धाड़ दिशोम के इतिहास में एक नया अध्याय लिखेगा, जहाँ परंपरा और आधुनिक अधिकारों का समन्वय देखने को मिलेगा।
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