Chandil News: सरायकेला-खरसावां जिले की पहचान माने जाने वाले चांडिल डैम की लहरों के नीचे सिर्फ पानी नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के सपने और उनके पुरखों की जमीन दफन है। दशकों बीत गए, लेकिन विस्थापितों के आंसू आज भी सूखे नहीं हैं। इसी गंभीर मुद्दे को लेकर हाल ही में दलमा क्षेत्र सुरक्षा मंच, कोल्हान के वरीय पदाधिकारियों और आदिवासी समन्वय समिति, चांडिल ने संयुक्त रूप से डैम क्षेत्र का एक विस्तृत और भावुक निरीक्षण किया। यह दौरा केवल एक औपचारिक निरीक्षण नहीं था, बल्कि उन परिवारों की सिसकियों को सुनने की कोशिश थी जिन्हें विकास के नाम पर अपनी जड़ों से उखाड़ तो दिया गया, लेकिन 'पुनर्वास' के नाम पर सिर्फ खोखले वादे मिले।
विस्थापन का दंश: जब अपनी ही जमीन पर बेगाने हुए लोग
निरीक्षण की शुरुआत उन गांवों से हुई जो चांडिल डैम के निर्माण से सीधे प्रभावित हुए हैं। पदाधिकारियों ने जब गलियों में कदम रखा, तो बुजुर्गों की आंखों में अपनी डूबती खेती और ढहते मकानों की यादें ताजा हो गईं। विस्थापित परिवारों ने अपनी व्यथा साझा करते हुए बताया कि बांध बनने के समय जो सुनहरे सपने दिखाए गए थे, वे आज दुःस्वप्न बन चुके हैं। अधिकारियों के सामने अपनी बात रखते हुए महिलाओं और युवाओं ने कहा कि वे आज भी अपनी ही जमीन पर शरणार्थियों जैसा जीवन जीने को मजबूर हैं।
मुआवजे की कछुआ चाल और सरकारी उदासीनता
निरीक्षण के दौरान सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि कई दशकों के बाद भी एक बड़ी आबादी को पूर्ण मुआवजा नहीं मिला है। पदाधिकारियों ने पाया कि फाइलों में मुआवजा वितरण की प्रक्रिया वर्षों से 'लंबित' श्रेणी में है। स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते उनकी एक पीढ़ी गुजर गई, लेकिन उचित मूल्यांकन और भुगतान आज भी एक पहेली बना हुआ है। इस स्थिति पर संयुक्त समिति के पदाधिकारियों ने गहरी नाराजगी व्यक्त की और इसे प्रशासनिक विफलता करार दिया।
पुनर्वास स्थल: सुविधाओं के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति
पुनर्वास (Rehabilitation) का मतलब केवल जमीन का एक टुकड़ा देना नहीं होता, बल्कि एक सम्मानजनक जीवन देना होता है। लेकिन चांडिल के विस्थापितों की कहानी अलग है। निरीक्षण दल ने देखा कि जिन क्षेत्रों में विस्थापितों को बसाया गया है, वहां बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है। बिजली, सड़क और स्वच्छ पेयजल जैसी बुनियादी जरूरतें भी आज इन परिवारों के लिए विलासिता बनी हुई हैं। "विकास की रोशनी के नीचे यह अंधेरा बर्दाश्त के बाहर है," यह शब्द वहां मौजूद सामाजिक कार्यकर्ताओं के थे।
दलमा टाइगर सुकलाल पहाड़िया का कड़ा रुख
इस पूरे दौरे के केंद्र बिंदु रहे दलमा टाइगर सुकलाल पहाड़िया। उन्होंने विस्थापितों की दुर्दशा देखकर कड़े शब्दों में प्रशासन को चेताया। उन्होंने कहा कि जल-जंगल-जमीन की रक्षा करने वाले आदिवासियों और मूलवासियों को उनके अधिकारों से वंचित रखना एक ऐतिहासिक अपराध है। सुकलाल पहाड़िया ने स्पष्ट किया कि अब बातचीत का समय बीत चुका है और हक के लिए धरातल पर उतरने की जरूरत है। उनकी मौजूदगी ने विस्थापितों के भीतर एक नए जोश और उम्मीद का संचार किया है।
रोजगार और सामाजिक सुरक्षा का अभाव
डैम बनने से हजारों किसानों की उपजाऊ जमीन जलमग्न हो गई, जिससे उनकी आजीविका का मुख्य साधन छिन गया। पदाधिकारियों ने अपनी समीक्षा में पाया कि विस्थापित युवाओं को न तो डैम से संबंधित परियोजनाओं में प्राथमिकता मिली और न ही सरकारी स्तर पर कोई वैकल्पिक रोजगार उपलब्ध कराया गया। "जमीन गई, खेती गई, अब भविष्य भी अंधकार में है," यह दर्द हर दूसरे विस्थापित परिवार का था। समिति ने मांग की कि प्रभावित परिवारों के शिक्षित युवाओं को सरकारी नौकरियों और स्थानीय उद्योगों में आरक्षण मिलना चाहिए।
आदिवासी समन्वय समिति: एकजुटता ही एकमात्र विकल्प
चांडिल की आदिवासी समन्वय समिति के पदाधिकारियों ने निरीक्षण के दौरान एकता का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि प्रशासन विस्थापितों को टुकड़ों में बांटकर उनकी आवाज दबाने की कोशिश करता रहा है, लेकिन अब दलमा क्षेत्र सुरक्षा मंच और समन्वय समिति एक साथ मिलकर इस लड़ाई को लड़ेंगे। प्रकाश मार्डी, आजाद शेखर टुडू और डोमन बास्के जैसे नेताओं ने एक स्वर में कहा कि जब तक अंतिम विस्थापित को उसका अधिकार नहीं मिल जाता, यह मोर्चा पीछे नहीं हटेगा।
आंदोलन की सुगबुगाहट: प्रशासन को अंतिम चेतावनी
निरीक्षण के अंत में पदाधिकारियों ने एक संयुक्त प्रेस वार्ता की तरह विस्थापितों को संबोधित किया। उन्होंने प्रशासन को अल्टीमेटम दिया कि यदि एक निश्चित समय सीमा के भीतर मुआवजा, आवास और लंबित मामलों का निपटारा नहीं किया गया, तो पूरे कोल्हान क्षेत्र में एक विशाल जन-आंदोलन छेड़ा जाएगा। पदाधिकारियों ने चेतावनी दी कि चक्का जाम और अनिश्चितकालीन धरना जैसे कदम उठाने के लिए वे मजबूर होंगे, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन और संबंधित विभाग की होगी।
संघर्ष का संकल्प और गणमान्य जनों की उपस्थिति
इस महत्वपूर्ण निरीक्षण कार्यक्रम में गुरुचरण कर्मकार, महावीर हांसदा, मंगल मांझी सहित क्षेत्र के कई गणमान्य लोग और सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित थे। सभी ने हाथ उठाकर यह संकल्प लिया कि वे विस्थापितों के साथ होने वाले इस अन्याय के खिलाफ एकजुट रहेंगे। बैठक का समापन इस प्रण के साथ हुआ कि "चांडिल डैम का पानी अगर शहर की प्यास बुझाता है, तो इसकी कीमत चुकाने वाले विस्थापितों के घर में भी खुशहाली का चिराग जलना चाहिए।"
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