Jharkhand: झारखंड प्रदेश में सात्विकता, आत्मशुद्धि और सूर्य उपासना के चार दिवसीय महापर्व 'चैती छठ' की शुरुआत नहाय-खाय के साथ श्रद्धापूर्वक हो गई है। चैत्र शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर व्रतियों ने स्नान-ध्यान के बाद अरवा चावल, चने की दाल और कद्दू (लौकी) की सब्जी का प्रसाद ग्रहण कर इस कठिन अनुष्ठान का संकल्प लिया। रांची के प्रमुख तालाबों से लेकर जमशेदपुर के स्वर्णरेखा और खरकई घाटों तक, हर ओर छठी मैया के मधुर गीत गूंजने लगे हैं। पूरा प्रदेश इस समय भक्तिमय वातावरण में सराबोर है और बाजारों में भी सूप, दउरा और पूजन सामग्री की खरीदारी को लेकर काफी चहल-पहल देखी जा रही है।
महापर्व की महत्ता: प्रकृति और सूर्य की साक्षात उपासना
लोक परंपरा के इस महान पर्व की महत्ता अद्वितीय है। छठ ही एक ऐसा पर्व है जो न केवल उगते सूर्य, बल्कि डूबते सूर्य को भी अर्घ्य देकर प्रकृति के प्रति सम्मान प्रकट करना सिखाता है। चैती छठ का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह कठिन तप का प्रतीक है। भीषण गर्मी की शुरुआत के बीच निर्जला उपवास रखना व्रतियों की अटूट आस्था को दर्शाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सूर्य देव की उपासना से आरोग्य, सुख-समृद्धि और संतान की प्राप्ति होती है। इसमें किसी मूर्ति की नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष देव सूर्य और उनकी शक्ति 'छठी मैया' की पूजा की जाती है, जो सामाजिक समरसता और शुद्धता का सबसे बड़ा उदाहरण है।
चार दिनों का कठिन अनुष्ठान और विधि-विधान
नहाय-खाय के बाद दूसरे दिन यानी खरना का अनुष्ठान होगा, जिसमें व्रती दिनभर उपवास रहकर शाम को गुड़ और चावल की बनी खीर का प्रसाद ग्रहण करेंगे। इसके बाद 36 घंटे का निर्जला उपवास शुरू होगा। पर्व के तीसरे दिन डूबते हुए सूर्य को 'अस्ताचलगामी अर्घ्य' अर्पित किया जाएगा, जिसमें फल, ठेकुआ और अन्य पकवानों से सजे सूप को जल में खड़े होकर भगवान भास्कर को समर्पित किया जाएगा। चौथे दिन की सुबह 'उदीयमान सूर्य' को अर्घ्य देने के साथ ही इस महापर्व का विधिवत समापन होगा। झारखंड के विभिन्न जिलों में प्रशासन द्वारा घाटों की साफ-सफाई और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं ताकि श्रद्धालु निर्विघ्न रूप से अपनी पूजा संपन्न कर सकें।

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