Jamshedpur News: जमशेदपुर के मानगो स्थित दाईघुटु जाहेरथान परिसर शनिवार को एक अलग ही रंग में रंगा नजर आया। ऊंची-ऊंची इमारतों और शहरी शोर-शराबे के बीच बसे इस पवित्र स्थल पर जैसे ही मांदर और नगाड़ों की थाप गूंजी, पूरा वातावरण उत्सवमय हो गया। मौका था संताल समाज के सबसे पवित्र त्योहारों में से एक 'बाहा' पर्व का। यह पर्व वसंत ऋतु के आगमन और प्रकृति के नव-श्रृंगार का उत्सव है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में महिला-पुरुष अपनी पारंपरिक वेशभूषा में शामिल हुए। पुरुषों के सफेद परिधान और महिलाओं की लाल पाड़ वाली साड़ियों ने इस पर्व की सुंदरता को और बढ़ा दिया, जो उनकी समृद्ध आदिवासी संस्कृति और प्रकृति के प्रति अटूट आस्था का परिचय दे रही थी।

नायके बाबा ने की विधिवत पूजा-अर्चना और सरजोम बाहा का वितरण

कार्यक्रम की शुरुआत दिशोम जाहेरथान में पूरी तरह से पारंपरिक और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ हुई। नायके बाबा सावना किस्कू ने पूरे विधि-विधान के साथ मरांग बुरु, जाहेर आयो, मोणे को और तुरुईको सहित अन्य इष्ट देवी-देवताओं का आह्वान किया। इस विशेष पूजा के दौरान समाज की सुख-शांति, अच्छी फसल और प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने के लिए सामूहिक प्रार्थना की गई। पूजा संपन्न होने के बाद, नायके बाबा ने श्रद्धा के साथ सभी श्रद्धालुओं के बीच 'सरजोम बाहा' (सखुआ के फूल) का वितरण किया। संताल समाज में सखुआ के फूलों को बेहद पवित्र माना जाता है और इसे प्राप्त करना देवताओं के आशीर्वाद के समान है।

श्रद्धा और उल्लास: जब सखुआ फूलों से महका जाहेरथान

जैसे ही नायके बाबा ने सखुआ के फूल बांटे, पूरा जाहेरथान परिसर श्रद्धा और उल्लास की लहरों से भर उठा। आदिवासी परंपरा के अनुसार, महिलाओं ने इन पवित्र फूलों को बड़े ही सम्मान के साथ अपने जूड़े में सजाया, जो उनके सौंदर्य और प्रकृति के प्रति सम्मान को दर्शाता है। वहीं, पुरुषों ने गर्व के साथ इन फूलों को अपने कानों में धारण किया। यह दृश्य केवल एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि यह प्रकृति और मानव के उस आदिम संबंध की जीवंत झलक थी, जो आज के तकनीकी युग में भी पूरी मजबूती के साथ कायम है। फूलों की सोंधी खुशबू और लोगों की भक्ति ने मानगो के इस इलाके को शांति और दिव्यता से भर दिया।

मांदर की लय पर थिरके कदम, बाहा नृत्य ने बांधा समां

बाहा पर्व बिना नृत्य और संगीत के अधूरा है। इस अवसर पर विशेष रूप से बाहा नृत्य का आयोजन किया गया, जिसमें पुरीहासा से आए प्रसिद्ध नृत्य दल ने अपनी मनमोहक प्रस्तुति दी। जैसे ही मांदर और नगाड़ों की लय तेज हुई, कलाकार और श्रद्धालु एक साथ थिरकने लगे। नृत्य दल की लयबद्ध प्रस्तुति ने पारंपरिक संस्कृति की खूबसूरती को सबके सामने जीवंत कर दिया। मांदर की थाप पर थिरकते हुए पैर और हवा में लहराते हाथ इस बात का प्रमाण थे कि अपनी जड़ों से जुड़ाव ही वास्तविक खुशी है। इस सांस्कृतिक प्रस्तुति ने न केवल उपस्थित लोगों का दिल जीता, बल्कि युवा पीढ़ी को अपनी कला से रूबरू भी कराया।

सामाजिक एकजुटता और संस्कृति संरक्षण का संदेश

कार्यक्रम के दौरान सामाजिक कार्यकर्ता मदन मोहन सोरेन ने बाहा पर्व के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बाहा केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव के अटूट संबंध का प्रतीक है। यह पर्व हमें सिखाता है कि प्रकृति के बिना मानव अस्तित्व संभव नहीं है। उन्होंने युवाओं से विशेष अपील की कि वे अपनी महान संस्कृति और प्राचीन परंपराओं को संजोकर रखें और इसे आधुनिकता की भीड़ में खोने न दें। कार्यक्रम में माझी बाबा बिरेन मुर्मू, शंकर किस्कु, जोगेश्वर बेसरा सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित थे, जिन्होंने सामूहिक एकता का संदेश दिया। अंततः, मानगो का यह आयोजन परंपरा, आस्था और सामुदायिक भाईचारे की एक नई मिसाल पेश कर गया।