कहते हैं कि हौसले बुलंद हों और इरादे फौलादी, तो मंजिल खुद-ब-खुद कदम चूमती है. अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर आज हम आपको एक ऐसी शख्सियत से रूबरू करा रहे हैं, जिन्होंने इस कहावत को चरितार्थ कर दिखाया है. आदित्यपुर गम्हरिया की 40 वर्षीय आदिवासी महिला मालती मार्डी आज उन लोगों के लिए एक मिसाल हैं, जो संसाधनों के अभाव या शिक्षा की कमी को अपनी तरक्की में बाधक मानते हैं. मालती ने कभी स्कूल की दहलीज नहीं लांघी, लेकिन आज वह कॉरपोरेट जगत और सिविल वर्क के क्षेत्र में बड़े-बड़े डिग्रीधारियों को पीछे छोड़ रही हैं. गम्हरिया थाना अंतर्गत शंकरपुर में रहने वाली मालती कोल्हान की संभवतः एकमात्र ऐसी महिला ठेकेदार हैं, जो औद्योगिक और सिविल निर्माण के कठिन कार्यों को पूरी कुशलता के साथ संभाल रही हैं. आज मालती न केवल खुद आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं, बल्कि वे 10 से 15 मजदूरों के लिए मसीहा भी हैं. उनके पास सिविल वर्क का अपना पूरा सेटअप है, जिसके जरिए वे इन मजदूरों को सालों भर काम उपलब्ध कराती हैं. जहां आज के दौर में पढ़े-लिखे युवा नौकरी के लिए परेशान हैं, वहीं बिना स्कूली शिक्षा के मालती ने अपना खुद का साम्राज्य खड़ा किया है और दूसरों को भी रोटी दे रही हैं. मालती मार्डी की कहानी बताती है कि कौशल कभी किताबी ज्ञान का मोहताज नहीं होता. यह जज्बा समाज की हर उस महिला को प्रेरित करता है जो अपनी पहचान बनाना चाहती है. वह साबित कर रही हैं कि एक महिला चाहे तो कंस्ट्रक्शन जैसे चुनौतीपूर्ण और पुरुष प्रधान क्षेत्र में भी अपनी मेहनत की खुमारी से सफलता का परचम लहरा सकती है.

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