सुंदरनगर स्थित तालसा गांव में आयोजित तीन दिवसीय बाहा पाता महोत्सव ने आदिवासी अस्मिता और प्रकृति के प्रति अटूट आस्था की अनूठी मिसाल पेश की है. यह आयोजन केवल एक नृत्य प्रतियोगिता तक सीमित न रहकर झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा के बीच एक मजबूत सांस्कृतिक सेतु के रूप में उभरा. बाहा पाता महोत्सव का मुख्य आकर्षण संताल समाज की महिलाओं का अभूतपूर्व अनुशासन रहा, जहां पारंपरिक लाल और हरा झल साड़ी में सजी 70 से 80 नृत्यांगनाओं ने एक साथ मांदर और नगाड़े की थाप पर कदमताल कर अपनी सामूहिक शक्ति का परिचय दिया. आदिवासी नवयुवक क्लब और ग्राम सभा तालसा के देखरेख में हुए इस सांस्कृतिक महाकुंभ ने यह संदेश दिया कि उनकी वेशभूषा और परंपराएं जल, जंगल व जमीन से उनके गहरे जुड़ाव का प्रतीक है. बाहा यानी फूलों के इस त्योहार के माध्यम से समाज ने न केवल वसंत का स्वागत किया, बल्कि अपनी जड़ों और सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने का संकल्प भी दोहराया.
तीन राज्यों के कलाकारों का मिलन केंद्र बना तालसा गांव
तालसा गांव में प्रकृति की पूजा और लोक कला का ऐसा मेल देखने को मिला है, जिसने बाहा पाता को एक विशाल सांस्कृतिक महाकुंभ बना दिया. यहां केवल नाच-गाना नहीं हुआ, बल्कि झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा-इन तीन राज्यों की साझा विरासत और भाईचारे का शानदार प्रदर्शन हुआ. संताल समाज की महिलाओं ने जब अपनी पारंपरिक लाल और हरा झल साड़ी पहनकर मैदान में कदम रखा, तो ऐसा लगा मानो पूरा जंगल अपनी हरियाली और पलाश के फूलों की लालिमा के साथ जीवंत हो उठा हो. एक-एक नृत्य मंडली में 70 से 80 महिलाओं का मांदर और नगाड़े की थाप पर एक साथ थिरकना किसी प्रोफेशनल परफॉर्मेंस जैसा लग रहा था. यह दृश्य बताता है कि संताल समाज की एकता कितनी गहरी है. हवा में गूंजती मांदर की आवाज और नगाड़ों की धमक ने यह बता दिया कि आदिवासी संस्कृति आज भी उतनी ही मजबूत और ऊर्जावान है, जितनी सदियों पहले थी. इस तीन दिवसीय कार्यक्रम में दूर-दराज के गांवों और पड़ोसी राज्यों से आये कलाकारों ने तालसा को सांस्कृतिक मिलन का केंद्र बना दिया.''बाहा'' का शाब्दिक अर्थ ''फूल'' होता है और इस उत्सव में हर चेहरा किसी खिले हुए फूल की तरह अपनी जड़ों से जुड़ा नजर आया. सबसे सुखद बात यह रही कि आज की आधुनिक पीढ़ी के युवक-युवतियों ने भी इस आयोजन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. यह इस बात का प्रमाण है कि आदिवासी समाज अपनी विरासत पर कितना गर्व करता है और इसे आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह तैयार है. गांव की मिट्टी की सोंधी खुशबू, पुराने वाद्ययंत्रों का शोर और पारंपरिक साड़ियों की चमक मिलकर एक ऐसी तस्वीर पेश कर रही थी, जो असली भारत की पहचान है. यहां विकास की बातें भी हैं और अपनी पुरानी पहचान को सहेजने का जज्बा भी. इस आयोजन ने यह स्पष्ट कर दिया कि सादगी ही दुनिया का सबसे बड़ा सौंदर्य है. हमारी सांस्कृतिक एकता ही वह ताकत है, जो आधुनिकता की भीड़ में हमें एक अलग और खास पहचान दिलाती है. बाहा पाता केवल एक नृत्य प्रतियोगिता नहीं है, बल्कि यह संताल समाज के गौरव, उनके संघर्ष और अटूट एकता की वह कहानी है, जो आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करेगी. यह आयोजन हमें सिखाता है कि हम दुनिया में कहीं भी पहुंच जाएं, लेकिन अपनी जड़ों की ओर लौटना और अपनी संस्कृति का सम्मान करना ही सबसे बड़ी आधुनिकता है.
संताली ड्रामा का हुआ मंचन
शाम धनबाद के लुगू बुरु ओपेरा द्वारा संताली ड्रामा-आंगेनेना दुलाड़ कुहड़ा धुआं रे-ञुतुम ओल आकान सोंतोक साकोम रे- का मंचन किया गया. बाहा पाता के दौरान पुरस्कार वितरण समारोह में बतौर मुख्य अतिथि के यूसिल तुरामडीह के सहायक प्रशासनिक पदाधिकारी हरिनाथ रजक उपस्थित थे. कार्यक्रम को सफल बनाने में माझी बाबा दुर्गाचरण मुर्मू, क्लब के सलाहकार सोमाय हांसदा, मुखिया कान्हू मुर्मू, वकील हेंब्रम, जितेन हेंब्रम, दारोगा हेंब्रम, भगीरथी मार्डी, मगत मार्डी, सुधीर बेसरा, साहेबराम मुर्मू, शिशू मुर्मू, सुरेश हेंब्रम, सनातन सोरेन, सनातन हेंब्रम और मानू हेंब्रम सहित अन्य सदस्यों ने योगदान दिया.खेल के मैदान में अब तक आपने खिलाड़ियों को शॉर्ट्स और जर्सी में देखा होगा, लेकिन रविवार को जमशेदपुर के तालसा में एक अनूठा नजारा दिखने वाला है. यहां पारंपरिक साड़ी पहनकर आदिवासी महिलाएं फुटबॉल के मैदान में अपना जौहर दिखायेंगी. वे न केवल मैदान में चहल-कदमी करेंगी, बल्कि साड़ी की गरिमा के साथ फुटबॉल को किक मारकर गोल भी दागेंगी. इस अनोखी प्रतियोगिता को लेकर स्थानीय लोगों में जबरदस्त क्रेज और उत्साह है. आयोजकों ने बताते हैं कि इस आयोजन का मुख्य मकसद महिलाओं को खेलों के प्रति प्रोत्साहित करना और साथ ही उन्हें अपनी आदिवासी परंपरा व संस्कृति से जोड़े रखना है.




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