दलमा राजा के आवास पर सेंदरा वीरों का महाजुटान
इस वर्ष के सेंदरा पर्व की रूपरेखा तैयार करने के लिए रविवार सुबह 8 बजे से गदड़ा स्थित दलमा राजा राकेश हेंब्रम के आवास पर एक विशेष बैठक बुलाई गई है। इस बैठक में जमशेदपुर और उसके आसपास के विभिन्न क्षेत्रों जैसे सरजामदा, पुरीहासा, जादूगोड़ा, नरवा, मुसाबनी, बहरागोड़ा, चांडिल और राजनगर के पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था के प्रमुख और 'सेंदरा वीर' (शिकारी/योद्धा) शिरकत करेंगे। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य समाज के सभी अंगों के साथ विचार-विमर्श करना और पर्व की सफलता के लिए सामूहिक निर्णय लेना है।
सेंदरा 2026 की तिथि पर लगेगी अंतिम मुहर
सेंदरा पर्व किस दिन मनाया जाएगा, यह पूरे आदिवासी समाज के लिए सबसे बड़ा सवाल होता है। इस बैठक का सबसे प्रमुख एजेंडा सेंदरा की तिथि का निर्धारण करना है। चूँकि सेंदरा की गणना चांद की स्थिति और पारंपरिक पंचांग के अनुसार की जाती है, इसलिए विभिन्न क्षेत्रों से आए विद्वान और प्रमुख अपनी राय रखेंगे। सभी के मंतव्य लेने के बाद सर्वसम्मति से एक अंतिम तिथि घोषित की जाएगी, जिस दिन हजारों की संख्या में आदिवासी सेंदरा वीर दलमा की पहाड़ियों पर अपनी परंपरा निभाने उतरेंगे।
दलमा बुरु सेंदरा समिति का पुनर्गठन और नई जिम्मेदारी
किसी भी बड़े आयोजन को सफल बनाने के लिए एक मजबूत संगठन की आवश्यकता होती है। बैठक के दौरान दलमा बुरु सेंदरा समिति का पुनर्गठन किया जाएगा। पुराने कार्यों की समीक्षा होगी और सक्रिय सदस्यों को नई जिम्मेदारियां सौंपी जाएंगी। कार्यों का बंटवारा इस प्रकार किया जाएगा कि सुरक्षा, रसद, पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन और बाहरी हस्तक्षेप से बचाव जैसे पहलुओं पर अलग-अलग टीमें काम कर सकें। समिति का लक्ष्य है कि इस वर्ष का आयोजन पिछले वर्षों की तुलना में अधिक अनुशासित और भव्य हो।
सांस्कृतिक विरासत को बचाने की चुनौती: डेमका सोय
समिति के वरीय सदस्य डेमका सोय ने इस अवसर पर एक गंभीर विषय की ओर समाज का ध्यान आकर्षित किया है। उन्होंने कहा कि आज के आधुनिक युग में सेंदरा जैसी सांस्कृतिक महत्ता को जीवित रखना एक बड़ी चुनौती बन गई है। दलमा के अलावा अयोध्या पहाड़, रंगा पहाड़ और नारान बेड़ा जैसे क्षेत्रों में भी सेंदरा की परंपरा पर संकट मंडरा रहा है। सोय के अनुसार, यदि समाज ने आज अपनी इन परंपराओं के संरक्षण के लिए ठोस रणनीति नहीं बनाई, तो आने वाले समय में सेंदरा केवल इतिहास की किताबों और कहानियों तक सीमित रह जाएगा।
वन विभाग और सेंदरा वीरों के बीच बढ़ता टकराव
बैठक में वन विभाग के रवैये पर भी विस्तृत चर्चा की जाएगी। आदिवासियों का आरोप है कि प्रत्येक वर्ष सेंदरा के दौरान वन विभाग के कर्मी उनके पारंपरिक औजारों (तीर-धनुष आदि) को बलपूर्वक छीन लेते हैं। समाज का तर्क है कि ये औजार उनकी धार्मिक आस्था और पहचान का हिस्सा हैं, न कि केवल शिकार का साधन। विभाग द्वारा उन्हें 'जंगली' कहकर संबोधित करने और उनके रास्ते रोकने की शिकायतों पर इस बार समिति एक कड़ा रुख अख्तियार करने के मूड में है।
पर्यावरण क्षरण: अवैध शराब और पेड़ों की कटाई का मुद्दा
सेंदरा समिति ने वन विभाग की दोहरी नीति पर भी सवाल उठाए हैं। एक ओर विभाग सेंदरा वीरों को रोकता है, वहीं दूसरी ओर दलमा की तलहटी में अवैध महुआ शराब की भट्टियां धड़ल्ले से चल रही हैं। समिति का कहना है कि वनों की अंधाधुंध कटाई हो रही है और वन्यजीव असुरक्षित हैं, लेकिन विभाग का ध्यान केवल आदिवासियों को रोकने पर है। इसके अतिरिक्त, दलमा के शांत वातावरण में मैराथन जैसे आधुनिक आयोजनों से वन्यजीवों की शांति भंग होने और प्रदूषण बढ़ने पर भी गहरी चिंता जताई गई है।
मुख्यमंत्री से गुहार और आंदोलन की चेतावनी
बैठक के समापन पर एक ठोस रणनीति तैयार की जाएगी, जिसके तहत समिति का एक प्रतिनिधिमंडल जल्द ही झारखंड के मुख्यमंत्री से मुलाकात करेगा। समिति की मांग होगी कि दलमा क्षेत्र के उन अधिकारियों को हटाया जाए जो वन सुरक्षा के नाम पर केवल फंड का दुरुपयोग कर रहे हैं और स्थानीय परंपराओं का सम्मान नहीं करते। यदि सरकार और प्रशासन उनकी मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार नहीं करते हैं, तो आदिवासी समाज अपनी अस्मिता और परंपरा की रक्षा के लिए जोरदार आंदोलन की शुरुआत कर सकता है।

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