सुमित्रा सोरेन का निधन 26 जुलाई 2023 को हो गया था, इसलिए यह सम्मान उन्हें मरणोपरांत दिया जा रहा है। उनके इस सम्मान से परिवार, साहित्यकारों और संताली भाषा के पाठकों में खुशी की लहर है। साहित्य अकादमी के अनुसार पुरस्कार के अंतर्गत ताम्र पट्टिका, शॉल और नकद राशि प्रदान की जाएगी।
सुमित्रा सोरेन का जन्म 15 फरवरी 1970 को ओडिशा के मयूरभंज जिले के बारीपदा (श्रीपदा) में स्वर्गीय लोकनाथ मरांडी और दुलारी मरांडी के घर हुआ था। उन्होंने संताली भाषा और साहित्य को समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। अपने लेखन के माध्यम से उन्होंने आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपरा और जीवन के विभिन्न पहलुओं को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।
उनकी प्रमुख कृतियों में “मिड बिरना चेन्ने साओन इनाग सागाई” (लघुकथा संग्रह), “गुपी गिद्रावग कुकमु” (लघु कथाओं का संग्रह) और “रेंगेज होराग मेड्डाग” (कविता संग्रह) शामिल हैं। “मिड बिरना चेन्ने साओन इनाग सागाई” संताली लघुकथाओं का एक महत्वपूर्ण संग्रह है, जिसमें उनकी चर्चित लघुकथा “कोयल” भी शामिल है। यह पुस्तक झारखंड के जमशेदपुर से प्रकाशित संताली लघुकथा संग्रह का हिस्सा रही है।
सुमित्रा सोरेन संताली भाषा के विकास, आदिवासी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और भाषा के प्रसार के लिए सक्रिय रूप से कार्य करती रहीं। उन्होंने साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित संताली कविता सम्मेलनों में भी भाग लिया और अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज की समस्याओं तथा सांस्कृतिक मूल्यों को अभिव्यक्त किया।
उनके परिवार में पति मदनमोहन सोरेन और एक पुत्र हिमांशु हैं। मदनमोहन सोरेन वर्तमान में बारीपदा में भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) में प्रशासनिक अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं।
साहित्यकारों का मानना है कि सुमित्रा सोरेन को मिला यह सम्मान संताली साहित्य के लिए गौरव की बात है। इससे ओडिशा, झारखंड और अन्य आदिवासी क्षेत्रों में संताली भाषा और साहित्य को नई ऊर्जा और पहचान मिलने की उम्मीद है। उनकी रचनाएँ आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेंगी और आदिवासी समाज की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती
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