Ghatshila News: घाटशिला में धाड़ दिशोम माझी परगना महाल का दो दिवसीय 15वां महासम्मेलन रविवार को भव्य रूप से संपन्न हो गया। इस महासम्मेलन में बड़ी संख्या में माझी बाबा, परगना बाबा, सामाजिक प्रतिनिधि एवं विभिन्न क्षेत्रों से आए बुद्धिजीवी शामिल हुए। समापन सत्र में पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था को सुदृढ़ करने, सामाजिक एकता को मजबूत करने तथा आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान को बचाए रखने का सामूहिक संकल्प लिया गया। इस अवसर पर देश परगना बाबा बैजू मुर्मू, विधायक सोमेश चंद्र सोरेन, टीएसी सदस्य जोसाई मार्डी, देश पारानिक बाबा दुर्गाचरण मुर्मू, पिथो मार्डी, हरिपोदो मुर्मू, परगना आयो पुंता मुर्मू, पद्मावती हेंब्रम, जायरेत बिरेन टुडू, मार्शल मुर्मू, मधु सोरेन, बिंदु सोरेन, लखन मार्डी, सुनील मुर्मू, रामराय हांसदा, सुशांत हेंब्रम, मानिक मुर्मू, युवराज टुडू, बिपिन चंद्र मुर्मू सहित बड़ी संख्या में समाज के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

पारंपरिक स्वशासन को मजबूत करने पर जोर


समापन सत्र के दौरान वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी समाज की पहचान उसकी पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था से जुड़ी हुई है। देश परगना बैजू मुर्मू ने अपने संबोधन में कहा कि वर्तमान समय में कुछ समाज विरोधी तत्व इस व्यवस्था को कमजोर करने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे तत्वों से सतर्क रहने की आवश्यकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि पूर्वजों द्वारा स्थापित रीति-रिवाज और न्याय प्रणाली समाज की मजबूती का आधार हैं, जिन्हें हर हाल में सुरक्षित रखना होगा।

युवा पीढ़ी को परंपराओं से जोड़ने की अपील


महासम्मेलन में यह चिंता भी सामने आई कि युवा पीढ़ी धीरे-धीरे अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं से दूर होती जा रही है। वक्ताओं ने कहा कि आधुनिकता के साथ-साथ अपनी जड़ों से जुड़े रहना भी जरूरी है। माझी और परगना बाबाओं से आग्रह किया गया कि वे युवाओं को जागरूक करें और उन्हें समाज की परंपराओं, पूजा पद्धति और सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ने का प्रयास करें।

शिक्षा और जागरूकता को बताया विकास का आधार


सम्मेलन में शिक्षा को समाज के सर्वांगीण विकास का मुख्य आधार बताया गया। हल्दीपोखर तोरोप परगना के सुशील कुमार हांसदा ने कहा कि शिक्षित समाज ही अपने अधिकारों की रक्षा कर सकता है। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे आधुनिक शिक्षा और कौशल को अपनाकर समाज को नई दिशा दें। शिक्षा के माध्यम से ही सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सशक्तिकरण संभव है।

जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा पर चर्चा

महासम्मेलन में जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा को लेकर गंभीर चर्चा हुई। प्रतिनिधियों ने कहा कि यह आदिवासी समाज की जीवनरेखा है और इसे बचाना हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है। साथ ही, संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए जागरूकता बढ़ाने और सामूहिक प्रयास करने पर जोर दिया गया। वक्ताओं ने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के बिना समाज का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।


पेसा कानून में संशोधन की उठी मांग

सम्मेलन में पेसा (PESA) कानून की वर्तमान स्थिति पर भी चर्चा की गई। वक्ताओं ने कहा कि पेसा नियमावली में कई त्रुटियां हैं, जिन्हें दूर करने की आवश्यकता है।
यह मांग की गई कि ग्राम सभा की अध्यक्षता केवल पारंपरिक प्रधानों—माझी, मुंडा और मानकी—को ही दी जाए। साथ ही प्रशासन से गैर-आदिवासी हस्तक्षेप पर रोक लगाने की मांग भी उठाई गई, ताकि आदिवासी समाज के अधिकार और पहचान सुरक्षित रह सकें।

महिलाओं की भागीदारी और सशक्तिकरण पर बल


महासम्मेलन में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और उपलब्धियों को सराहा गया। परगना आयो पुंता मुर्मू ने कहा कि आज महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, जो समाज के लिए गर्व की बात है। उन्होंने देश की प्रथम महिला राष्ट्रपति का उदाहरण देते हुए कहा कि यह आदिवासी समाज की महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। महिलाओं की प्रगति को समाज के उज्ज्वल भविष्य का संकेत बताया गया।


सामाजिक एकता और सहयोग का आह्वान


समापन सत्र में समाज के सभी वर्गों से एकजुट होकर कार्य करने की अपील की गई। जुगसलाई तोरोप परगना दशमत हांसदा ने कहा कि समाज के विकास के लिए हर व्यक्ति को अपनी क्षमता अनुसार योगदान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब समाज का हर सदस्य अपनी जड़ों से जुड़कर सामूहिक प्रयास करेगा, तभी सामाजिक एकता मजबूत होगी और सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रह पाएगी।