Education in village: देश के आदिवासी बहुल गांवों में आज शिक्षा सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन चुकी है। सरकारी योजनाओं और घोषणाओं के बावजूद गांवों की वास्तविक स्थिति बेहद चिंताजनक दिखाई देती है। गरीब आदिवासी परिवार आज भी अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। शिक्षा का निजीकरण, विद्यालयों में संसाधनों की कमी और शिक्षकों की अनुपस्थिति ने हालात को और गंभीर बना दिया है। ऐसे समय में नेपाल के सामुदायिक शिक्षा मॉडल की चर्चा भी तेज होने लगी है, जिसे कई लोग आदिवासी क्षेत्रों के लिए उपयोगी मान रहे हैं।

आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा की जमीनी हकीकत
ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में आज भी कई विद्यालय बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। कहीं शिक्षक नहीं हैं तो कहीं भवन जर्जर अवस्था में हैं। कई गांवों में बच्चों को स्कूल पहुंचने के लिए कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। बरसात के दिनों में स्थिति और खराब हो जाती है। गरीबी के कारण अधिकांश परिवार बच्चों को जल्दी मजदूरी या खेती के काम में लगा देते हैं। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में बच्चे बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी जरूर है, लेकिन सुविधाओं के अभाव में उसका लाभ समाज तक नहीं पहुंच पा रहा है।

शिक्षा के निजीकरण ने बढ़ाई परेशानी
सरकार द्वारा धीरे-धीरे शिक्षा व्यवस्था में निजी संस्थानों को बढ़ावा देने से गरीब और आदिवासी परिवारों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। निजी स्कूलों की फीस, किताबें, ड्रेस और अन्य खर्च इतने अधिक हैं कि गरीब परिवार उन्हें वहन नहीं कर पाते।
सरकारी स्कूलों की स्थिति कमजोर होने के कारण लोग मजबूरी में निजी विद्यालयों की ओर देखते हैं, लेकिन आर्थिक तंगी उनके रास्ते की सबसे बड़ी बाधा बन जाती है। इसका सीधा असर बच्चों के भविष्य पर पड़ रहा है। शिक्षा अब अधिकार कम और व्यापार अधिक बनती जा रही है।

गांवों में शिक्षकों और संसाधनों की भारी कमी
कई आदिवासी गांवों में विद्यालय तो हैं, लेकिन वहां नियमित शिक्षक नहीं पहुंचते। कहीं एक ही शिक्षक पूरे स्कूल को संभाल रहा है तो कहीं महीनों तक पढ़ाई नहीं होती। विज्ञान, गणित और अंग्रेजी जैसे विषयों के शिक्षक ग्रामीण स्कूलों में लगभग नहीं के बराबर हैं। डिजिटल शिक्षा की बात तो की जाती है, लेकिन अधिकांश गांवों में बिजली और इंटरनेट तक की व्यवस्था नहीं है। बच्चों के पास न पुस्तकालय है, न प्रयोगशाला और न ही खेलकूद की समुचित सुविधा। ऐसी परिस्थितियों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कल्पना करना कठिन हो जाता है।

नेपाल मॉडल से मिल सकती है नई दिशा
नेपाल के कई ग्रामीण क्षेत्रों में सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से शिक्षा व्यवस्था को मजबूत किया गया है। वहां गांव के लोग मिलकर स्कूलों के संचालन, शिक्षकों की निगरानी और बच्चों की पढ़ाई में सहयोग करते हैं। स्थानीय भाषा और संस्कृति को भी शिक्षा का हिस्सा बनाया गया है।
यदि आदिवासी क्षेत्रों में भी इसी प्रकार समुदाय आधारित शिक्षा मॉडल लागू किया जाए, तो स्थिति में सुधार संभव है। गांव के शिक्षित युवाओं को शिक्षण कार्य से जोड़कर बच्चों को स्थानीय स्तर पर बेहतर मार्गदर्शन दिया जा सकता है। इससे शिक्षा और समाज के बीच जुड़ाव भी मजबूत होगा।

मातृभाषा में शिक्षा की जरूरत
आदिवासी बच्चों की सबसे बड़ी समस्या यह भी है कि प्रारंभिक शिक्षा उनकी मातृभाषा में नहीं होती। बच्चे घर में संथाली, हो, मुंडारी, कुरुख या अन्य स्थानीय भाषाएं बोलते हैं, लेकिन स्कूल में सीधे हिंदी या अंग्रेजी माध्यम का सामना करना पड़ता है। इस कारण कई बच्चे पढ़ाई में रुचि खो देते हैं। यदि प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा दी जाए, तो बच्चे तेजी से सीख सकते हैं। साथ ही उनकी संस्कृति और पहचान भी सुरक्षित रहेगी। नई शिक्षा नीति में मातृभाषा पर जोर दिया गया है, लेकिन इसे जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू करने की आवश्यकता है।

शिक्षा बचाने के लिए सामूहिक पहल जरूरी
आज जरूरत इस बात की है कि सरकार, समाज और स्थानीय समुदाय मिलकर शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करें। केवल योजनाएं बनाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि गांव-गांव तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुंचानी होगी। शिक्षकों की नियुक्ति, स्कूलों में आधारभूत सुविधाएं और गरीब छात्रों के लिए आर्थिक सहायता सुनिश्चित करनी होगी। आदिवासी समाज को भी शिक्षा के महत्व को समझते हुए अपने बच्चों को पढ़ाई से जोड़ना होगा। शिक्षा ही वह माध्यम है, जिससे समाज गरीबी, बेरोजगारी और शोषण से बाहर निकल सकता है। यदि समय रहते इस दिशा में गंभीर प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाली पीढ़ियां विकास की दौड़ में और पीछे छूट जाएंगी।