सेंदरा तिथि का निर्धारण और 'गिरा सकाम' की परंपरा
बैठक के दौरान दलमा राजा ने बताया कि सेंदरा की तिथि तय करने के लिए समाज के विभिन्न प्रमुखों जैसे परगना, माझी बाबा, मानकी-मुंडा और दिसुआ सेंदरा वीरों के साथ गहन विचार-विमर्श किया गया है। हालांकि, तिथि का चयन हो चुका है, लेकिन इसे तुरंत सार्वजनिक नहीं किया गया। आदिवासी परंपरा के अनुसार, 3 अप्रैल को गदड़ा में सेंदरा पूजा आयोजित की जाएगी। इसी दिन 'गिरा सकाम' (खजूर के पत्तों से बना निमंत्रण पत्र) तैयार कर सेंदरा वीरों को भेजा जाएगा। इस पूजा के बाद ही सेंदरा की तिथि को औपचारिक रूप से घोषित किया जाएगा। यह परंपरा दर्शाती है कि आदिवासी समाज आज भी अपनी जड़ों और विधिवत नियमों से कितना गहराई से जुड़ा हुआ है।
मुख्यमंत्री से मुलाकात और परंपरा को बचाने की गुहार
दलमा राजा राकेश हेंब्रम ने इस बात पर जोर दिया कि सेंदरा की परंपरा पर आधुनिकता और कानूनी बंदिशों का खतरा मंडरा रहा है। उन्होंने घोषणा की कि समिति का एक प्रतिनिधिमंडल जल्द ही रांची जाकर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मुलाकात करेगा। इस मुलाकात का उद्देश्य सेंदरा की पौराणिक परंपरा के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए सरकार से सहयोग मांगना है। आदिवासी समाज चाहता है कि उनकी इस सांस्कृतिक विरासत को प्रशासनिक हस्तक्षेप से मुक्त रखा जाए और इसे सम्मान के साथ मनाया जाए।
प्रकृति और वन देवी-देवताओं के प्रति अटूट आस्था
अक्सर सेंदरा को केवल शिकार के तौर पर देखा जाता है, लेकिन दलमा राजा ने स्पष्ट किया कि इसकी शुरुआत वन देवी-देवताओं की आराधना से होती है। आदिवासी समाज प्रकृति का रक्षक है। जंगल में प्रवेश करने से पहले वे विधिवत पूजा-अर्चना कर देवताओं से अनुमति मांगते हैं। उनका मानना है कि जंगल और वन्यजीवों पर पहला अधिकार प्रकृति का है, और वे केवल अपनी परंपरा का निर्वहन करने के लिए साल में एक बार प्रतीकात्मक रूप से वहां जाते हैं। यह आस्था दर्शाती है कि आदिवासियों और जंगलों का रिश्ता सह-अस्तित्व का है, विनाश का नहीं।
वन विभाग का हस्तक्षेप और आदिवासियों की पीड़ा
बैठक में वन विभाग की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाए गए। राकेश हेंब्रम ने कहा कि आदिवासी समाज साल में केवल एक दिन सेंदरा के लिए जंगल में कदम रखता है, लेकिन उस दिन वन विभाग उन्हें अपराधियों की तरह परेशान करता है। उनके पारंपरिक हथियार, जैसे तीर और धनुष, छीन लिए जाते हैं। आदिवासी समुदाय का कहना है कि जो हथियार उनकी संस्कृति और सुरक्षा का हिस्सा हैं, उन्हें छीनना उनके आत्मसम्मान पर चोट है। वन विभाग अक्सर वन्यजीवों की घटती संख्या के लिए आदिवासियों को जिम्मेदार ठहराता है, जिसे समाज पूरी तरह से खारिज करता है।
वन्यजीवों की कमी का असली कारण: जंगल का सिमटना
आदिवासी नेताओं का तर्क है कि जंगली जानवरों की कमी के लिए सेंदरा जिम्मेदार नहीं है, बल्कि वन विभाग की लापरवाही और जंगलों का व्यवसायिक उपयोग असली कारण है। आरोप लगाया गया कि वन विभाग की नाक के नीचे साल भर अवैध रूप से पेड़ों की कटाई होती है। धीरे-धीरे घने जंगल खत्म हो रहे हैं और उनकी जगह झाड़ियां ले रही हैं। जब जानवरों का प्राकृतिक आवास (घर) ही नहीं बचेगा, तो उनकी संख्या कम होना लाजमी है। ऐसे में आदिवासी समाज को दोषी ठहराना अपनी विफलताओं को छिपाने जैसा है।
पर्यटन और कंक्रीट का जाल: जंगल के लिए नया खतरा
आजकल जंगलों को पर्यटन क्षेत्र के रूप में विकसित किया जा रहा है, जिसे आदिवासी समाज अपनी संस्कृति और वन्यजीवों के लिए खतरा मानता है। जंगलों के बीचों-बीच रिसॉर्ट, होटल और सरकारी भवन बनाए जा रहे हैं। जहाँ कभी जानवरों का बसेरा था, वहां अब इंसानी शोर-शराबा और कंक्रीट के ढांचे खड़े हो रहे हैं। दलमा राजा ने कहा कि जब जंगल में इंसानों का दखल बढ़ेगा, तो जानवर मजबूरी में भोजन और पानी की तलाश में शहरों और गांवों की ओर रुख करेंगे। यह पर्यटन विकास के नाम पर वन्यजीवों के अस्तित्व से खिलवाड़ है।
भविष्य की राह: जल-जंगल-जमीन का संरक्षण
बैठक के अंत में यह मांग की गई कि सरकार और वन विभाग को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए। आदिवासियों का सुझाव है कि:
- जंगलों में अनावश्यक निर्माण और पर्यटन गतिविधियों पर रोक लगे।
- जंगलों के आसपास बढ़ती शहरी आबादी और कंक्रीट के निर्माण को नियंत्रित किया जाए।
- आदिवासी स्वशासन व्यवस्था को सम्मान देते हुए उनकी परंपराओं में हस्तक्षेप बंद हो।
सेंदरा समिति का मानना है कि यदि जंगल और वन्यजीवों को वास्तव में बचाना है, तो आदिवासी समाज को साथ लेकर चलना होगा, न कि उन्हें वन विभाग का दुश्मन मानकर।


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