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बालिका बिरहोर: संघर्षों को मात देकर नर्सिंग की उड़ान भरने वाली पहली पीढ़ी की कहानी

Jamshedpur News: पूर्वी सिंहभूम के एक छोटे से गांव 'छोटा बांकी' की गलियों से निकलकर बेंगलुरु के बड़े अस्पताल तक का सफर तय करने वाली बालिका बिरहोर की कहानी सिर्फ एक छात्रा की सफलता नहीं है। यह कहानी है उस पक्के इरादे की, जिसे अगर सही मार्गदर्शन और साथ मिले, तो वह किसी भी बाधा को पार कर सकता है। महज़ 21 साल की बालिका आज अपने पूरे बिरहोर समुदाय (PVTG) के लिए एक मिसाल बन चुकी हैं।



अभावों के बीच बीता बचपन और शिक्षा की ललक

बालिका बिरहोर एक ऐसे समुदाय से आती हैं, जो अपनी जीविका के लिए पूरी तरह जंगलों पर निर्भर है। उनके माता-पिता, सुबोध और सुखरानी बिरहोर, स्थानीय बाजार में चावल की शराब (राइस बीयर) बेचकर महीने के मुश्किल से ₹500 कमा पाते थे। ऐसे आर्थिक तंगी वाले परिवार में, जहाँ दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना भी चुनौती हो, वहां शिक्षा के बारे में सोचना भी बड़ी बात थी। लेकिन अपने परिवार की पहली पीढ़ी की छात्रा होने के नाते, बालिका ने मुश्किलों के सामने झुकने के बजाय आगे बढ़ने का रास्ता चुना।

टाटा स्टील फाउंडेशन का साथ और स्कूली शिक्षा

बालिका की प्रतिभा को सही दिशा तब मिली, जब 'टाटा स्टील फाउंडेशन' ने उनका हाथ थामा। फाउंडेशन की मदद से उन्हें चक्रधरपुर के कार्मेल स्कूल में दाखिला मिला। यहाँ उन्होंने न केवल पढ़ाई की, बल्कि 2020 में मैट्रिक की परीक्षा में 82% अंक लाकर अपनी काबिलियत साबित की। इसके बाद उन्होंने सेंट जेवियर्स इंटर कॉलेज, लुपंगुटु से साइंस विषय के साथ 12वीं की पढ़ाई पूरी की। इस स्कूली शिक्षा ने बालिका के भीतर वह आत्मविश्वास भर दिया, जिसने उन्हें बड़े सपने देखने का साहस दिया।

'प्रोजेक्ट आकांक्षा': दुविधा से करियर की ओर

12वीं के बाद बालिका के जीवन में एक कठिन समय आया। वह पढ़ना तो चाहती थीं, लेकिन उनका परिवार उन्हें गांव से दूर भेजने से डर रहा था। इसी समय टाटा स्टील फाउंडेशन के 'प्रोजेक्ट आकांक्षा' की टीम ने उनके घर का दौरा किया। टीम ने बालिका के लिए 'साइकोमेट्रिक टेस्ट' आयोजित किए ताकि उनकी रुचि को समझा जा सके। साथ ही, उनके माता-पिता की काउंसलिंग की गई ताकि वे अपनी बेटी को बाहर भेजने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो सकें। इसी पहल ने बालिका के लिए नर्सिंग के क्षेत्र में करियर बनाने का रास्ता साफ किया।

'प्रोजेक्ट समृद्धि' और बेंगलुरु का सफर

टाटा स्टील फाउंडेशन के 'प्रोजेक्ट समृद्धि' के जरिए बालिका को नर्सिंग प्रवेश परीक्षा के लिए विशेष कोचिंग और मेंटरशिप दी गई। उनकी मेहनत रंग लाई और उन्हें बेंगलुरु के प्रतिष्ठित नारायणा हृदयालय कॉलेज ऑफ नर्सिंग में प्रवेश मिल गया। गांव से कभी बाहर न निकलने वाली बालिका के लिए यह एक बहुत बड़ा बदलाव था। फाउंडेशन ने उनकी पहली हवाई यात्रा से लेकर पूरे कोर्स के दौरान हर कदम पर उनका मार्गदर्शन किया। यहाँ उन्होंने जीएनएम (GNM) प्रोग्राम का अपना प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा किया।

अप्रैल 2026: एक नई शुरुआत और रोजगार

आज बालिका बिरहोर न केवल शिक्षित हैं, बल्कि आत्मनिर्भर भी बन चुकी हैं। उन्होंने बेंगलुरु के नारायणा हृदयालय अस्पताल में स्टाफ नर्स के रूप में नौकरी हासिल कर ली है। अप्रैल 2026 से वह ₹3 लाख के वार्षिक पैकेज (CTC) पर अपना पेशेवर करियर शुरू करने जा रही हैं। बालिका की इच्छा इमरजेंसी यूनिट में काम करने की है, ताकि वे कठिन मेडिकल केसों से सीख सकें और अधिक से अधिक लोगों की जान बचाने का अनुभव प्राप्त कर सकें।

समुदाय के लिए आशा की नई किरण

बालिका खुद कहती हैं कि अगर फाउंडेशन का साथ न होता, तो शायद उनकी शादी कम उम्र में ही कर दी गई होती और उनका भविष्य गांव की चारदीवारी तक सिमट जाता। टाटा स्टील फाउंडेशन के जिरेन टोपनो और नमिता टोप्पो जैसे अधिकारियों का मानना है कि बालिका की सफलता यह साबित करती है कि अगर सही कौशल और अवसर दिए जाएं, तो समाज के सबसे पिछड़े वर्ग के युवा भी आसमान छू सकते हैं। आज बालिका अपनी बस्ती के उन तमाम युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई हैं, जो गरीबी और अभावों के कारण अपने सपनों को मार देते हैं।

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