Jamshedpur Sarhul 2026: लौहनगरी और इसके आसपास के क्षेत्रों में प्रकृति और परंपरा के महापर्व 'सरहुल' की अनुपम छटा देखने को मिल रही है. शनिवार को सुबह की पहली किरण के साथ ही पूरा शहर आदिवासी संस्कृति के रंगों में सराबोर नजर आया. पुराना सीतारामडेरा, बिरसानगर, मानगो, लक्ष्मीनगर और शंकोसाई समेत तमाम बस्तियों में स्थित जाहेरथान और सरना स्थलों पर आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा. ढोल-नगाड़ों और मांदल की गूंज के बीच आदिवासी समाज ने अपनी समृद्ध विरासत का परिचय देते हुए धरती माता और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट की. चिलचिलाती धूप के बावजूद श्रद्धालुओं के उत्साह में कोई कमी नहीं दिखी और हर उम्र के लोग इस पावन उत्सव का हिस्सा बने.


पांरपरिक वेशभूषा में सजे श्रद्धालु, पाहन ने विधि-विधान से की साल वृक्ष की पूजा
उत्सव की शुरुआत सुबह तड़के ही पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ हुई. समाज के महिला, पुरुष और बच्चे अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को दर्शाते लाल-सफेद बॉर्डर वाली साड़ियों और पारंपरिक परिधानों में सजे-धजे नजर आए. विभिन्न सरना स्थलों पर पाहन (पुजारी) द्वारा पूरे विधि-विधान के साथ साल (सखुआ) वृक्ष की पूजा-अर्चना की गई. पाहन ने सखुआ के फूलों को अर्पित कर आने वाले साल में अच्छी फसल, सुख-समृद्धि और आरोग्य की कामना की. इस दौरान पाहन द्वारा घड़े के पानी के माध्यम से वर्षा का पूर्वानुमान लगाने की सदियों पुरानी परंपरा का भी निर्वहन किया गया. पूजा स्थलों पर गूंजते 'प्रकृति माता की जय' के नारों ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया.

मांदल की थाप पर सामूहिक नृत्य और सांस्कृतिक गौरव का प्रदर्शन
सरहुल केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामुदायिक एकजुटता का महापर्व बनकर उभरा है. शहर के विभिन्न कोनों में पूजा के उपरांत सामूहिक नृत्य और गीतों का सिलसिला शुरू हुआ, जो दोपहर तक अनवरत चलता रहा. मांदल और नगाड़ों की थाप पर झूमते युवाओं और महिलाओं ने अपनी संस्कृति के प्रति गर्व का प्रदर्शन किया. बुजुर्गों ने नई पीढ़ी को प्रकृति के संरक्षण और पूर्वजों की परंपराओं से जुड़े रहने का संदेश दिया. जगह-जगह सखुआ के फूल (सरहुल फूल) का वितरण किया गया, जिसे लोग अपने कानों और बालों में सजाकर इस पर्व की खुशी साझा करते दिखे. शहर की गलियां आज ढोल-नगाड़ों की थाप से गुंजायमान हैं.

शाम 4 बजे निकलेगी भव्य शोभायात्रा, एकता और संस्कृति का दिखेगा संगम
पर्व का मुख्य आकर्षण आज शाम करीब 4 बजे निकलने वाली भव्य केंद्रीय शोभायात्रा होगी. इस शोभायात्रा में शहर की विभिन्न बस्तियों और अखाड़ों से हजारों की संख्या में आदिवासी समाज के लोग शामिल होंगे. पारंपरिक अस्त्र-शस्त्रों, वाद्य यंत्रों और झांकियों के साथ निकलने वाली यह पदयात्रा शहर के मुख्य मार्गों से होकर गुजरेगी. आयोजकों के अनुसार, इस दौरान सुरक्षा और ट्रैफिक व्यवस्था को लेकर पुख्ता इंतजाम किए गए हैं. यह शोभायात्रा न केवल आदिवासी समाज की शक्ति और एकता का प्रतीक होगी, बल्कि आधुनिक युग में प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीने का वैश्विक संदेश भी देगी.