फागुन में जब सखुआ के पेड़ों पर नई कोपलें और सुनहरे फूल लदने लगते हैं, तो यह आदिवासी समाज के लिए प्रकृति के नये वर्ष और बाहा महापर्व के आगमन का संकेत होता है.तब आदिवासी समाज अपने सबसे पवित्र पर्व बाहा के स्वागत में झूम उठता है. शनिवार को कदमा स्थित आदिवासी संताल जाहेरथान में कुछ ऐसा ही नजारा दिखा, जहां पारंपरिक गीतों की गूंज और मांदर की थाप ने पूरे वातावरण को बाहामय कर दिया. प्रकृति और मनुष्य के अटूट रिश्ते को दर्शाते इस पर्व में आस्था का जनसैलाब उमड़ पड़ा. श्रद्धालुओं ने एक-दूसरे का हाथ थामकर 'ओत डिगिर-डिगिर हाले सेरमा बारांग-बारांग' नुकिन दो जाहेर आयो- जा गोसांय, माघ बोंगा पोलोमेन फागुन सेटेरेन- फागुन सांवते बाहा बोंगा ताबोन मुलू:एन, बाहा बोंगा पुयलू माहा बोंगा बुरू उम नड़का को - जैसे पारंपरिक गीतों पर नृत्य किया. इन गीतों के माध्यम से श्रद्धालुओं ने न केवल नृत्य-गाकर आनंद लिया, बल्कि पहाड़, नदी, झरने और वनों के प्रति आभार व्यक्त किया. क्योंकि आदिवासियों के लिए ये केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि साक्षात देवी-देवताओं के स्वरूप हैं. जाहेरथान में माझी बाबा बिंदे सोरेन, कमेटी के अध्यक्ष भुआ हांसदा और पारानिक बाबा सुरेंद्र टुडू की अगुवाई में पारंपरिक रीति-रिवाज से विधिवत पूजा-अर्चना की गयी. नायके बाबा ने जब सखुआ के फूल (सरजोम बाहा) वितरित किया, तो महिलाओं ने बड़ी श्रद्धा से उन्हें अपने आंचल में ग्रहण किया और जूड़े में खोंसा, वहीं पुरुषों ने इसे अपने कानों पर सजाया. पूजा के बाद दिसुआ ग्रामीणों ने जिस उत्साह के साथ बाहा उत्सव मनाया, उसने आधुनिकता के दौर में भी अपनी संस्कृति को अक्षुण्ण रखने का संदेश दिया. कदमा जाहेरथान में आयोजित बाहा पर्व में बारीडीह, करनडीह, गोविंदपुर, आदित्यपुर, मानगो, बालीगुमा, डिमना, रानीडीह, मतलाडीह, सुंदरनगर, खुकड़ाडीह, हलुदबनी, सरजामदा, गदड़ा समेत शहर के आसपास के विभिन्न गांवों से सैकड़ों लोग पहुंचे थे. कदमा बाहा पर्व को सफल बनाने में कमेटी के संरक्षक लक्ष्मण टुडू, महासचिव भीम मुर्मू, पंचु हांसदा, बिक्रम बास्के, विकास हेंब्रम, चंद्रो टुडू,सुरेंद्र नाथ मुर्मू, सुनाराम टुडू, जितराय टुडू, लीलमोहन सोरेन,सोनाराम सोरेन, लक्ष्मण मरांडी, महेंद्र मुर्मू, छोटूराम के अलावा अन्य ने योगदान दिया.
नृत्य की दिशा में छिपा है ब्रह्मांड का रहस्य
आदिवासियों का प्रकृति प्रेम महज प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और आध्यात्मिक भी है. पर्व के दौरान जब ग्रामीण मांदर और नगाड़े की थाप पर थिरके, तो उनकी नृत्य शैली में एक दर्शन दिखा. आदिवासी समाज हमेशा एंटी-क्लॉकवाइज (दाएं से बाएं) दिशा में घूमकर नृत्य करता है. इसके पीछे मान्यता है कि प्रकृति की तमाम लताएं और बेलें हमेशा दायें से बायें की ओर ही बढ़ती हैं. यह नृत्य इस बात का प्रमाण है कि आदिवासी समाज प्रकृति की गति के साथ तालमेल बिठाकर चलता है और उससे अलग होकर अपना अस्तित्व नहीं मानता.
माझी बाबा ने समाज को प्रकृति संरक्षण का दिया संदेश
बाहा पर्व के शुभ अवसर पर कदमा जाहेरथान में माझी बाबा बिंदे सोरेन ने समाज को प्रकृति संरक्षण का एक गहरा संदेश दिया. उन्होंने कहा कि बाहा पर्व हमें यह सिखाता है कि मनुष्य और प्रकृति एक-दूसरे के पूरक हैं. जिस प्रकार प्रकृति हमें बिना मांगे जीवन की हर आवश्यक वस्तु-हवा, पानी और फल-फूल प्रदान करती है, उसी प्रकार हमारा भी यह परम दायित्व है कि हम पूरी निष्ठा से उसका संरक्षण करें. माझी बाबा ने कहा कि आदिवासी संस्कृति की जड़ें प्रकृति में ही रची-बसी हैं. बिना प्रकृति के संरक्षण के मानव जीवन की कल्पना करना असंभव है. बाहा पर्व केवल उत्सव मात्र नही है, बल्कि जल, जंगल और जमीन के प्रति आभार जताने और उन्हें सहेजने का संकल्प है.

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