आंकड़ों की जुबानी: गिरावट के बाद सुधार का सफर
रिपोर्ट के गहरे विश्लेषण से पता चलता है कि 2017 से 2023 के बीच झारखंड के जंगलों ने एक चुनौतीपूर्ण दौर देखा है। वर्ष 2017 में राज्य का कुल कार्बन स्टॉक 2,22,882 हजार टन के उच्च स्तर पर था, लेकिन विकास कार्यों और अन्य कारणों से 2019 में यह भारी गिरावट के साथ 1,78,012 हजार टन पर सिमट गया था। यह गिरावट पर्यावरणविदों के लिए गहरी चिंता का विषय थी। हालांकि, पिछले चार वर्षों में किए गए सघन वृक्षारोपण और वन संरक्षण के प्रयासों का असर अब दिखने लगा है। वर्ष 2023 के ताजा आंकड़ों के अनुसार, यह ग्राफ अब ऊपर की ओर मुड़ चुका है और 1,86,434 हजार टन के स्तर पर पहुँच गया है, जो 78.45 टन प्रति हेक्टेयर की दर को दर्शाता है।
सॉइल ऑर्गेनिक कार्बन (SOC): मिट्टी की बढ़ती ताकत
झारखंड के जंगलों में आए इस सकारात्मक बदलाव की सबसे बड़ी वजह 'सॉइल ऑर्गेनिक कार्बन' (SOC) में हुई वृद्धि है। वन पारिस्थितिकी तंत्र में मिट्टी की गुणवत्ता और उसकी कार्बन धारण क्षमता सबसे अहम होती है। आंकड़ों के अनुसार, 2017 में एसओसी का स्तर 1,01,967 हजार टन था, जो निरंतर बढ़ते हुए 2023 में 1,10,429 हजार टन तक पहुँच गया है। मिट्टी में कार्बन की यह बढ़ती मात्रा दर्शाती है कि जंगलों के फर्श पर जैविक कचरा (पत्तियां, टहनियां आदि) सही ढंग से खाद में तब्दील हो रहा है। यह न केवल पेड़ों को पोषण दे रहा है, बल्कि जमीन के भीतर कार्बन को सुरक्षित रखकर ग्लोबल वार्मिंग के असर को भी कम कर रहा है।
अबव ग्राउंड बायोमास (AGB) में स्थिरता के संकेत
'अबव ग्राउंड बायोमास' यानी जमीन के ऊपर मौजूद पेड़ों का तना, शाखाएं और पत्तियां, जो सीधे तौर पर हरियाली का हिस्सा हैं। रिपोर्ट बताती है कि 2017 से 2019 के बीच इसमें बहुत बड़ी गिरावट आई थी, जब यह 86,006 हजार टन से घटकर सीधे 48,994 हजार टन रह गया था। पेड़ों की कटाई या वनों के घनत्व में कमी इसका मुख्य कारण रही होगी। लेकिन राहत की बात यह है कि हाल के वर्षों में यह गिरावट न केवल थमी है, बल्कि इसमें मामूली सुधार भी हुआ है। 2023 में यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 50,918 हजार टन के स्तर पर पहुँच गया है। यह स्थिरता इस बात का संकेत है कि नए लगाए गए पौधे अब धीरे-धीरे बड़े हो रहे हैं और बायोमास में अपना योगदान दे रहे हैं।
जलवायु परिवर्तन के खिलाफ झारखंड का 'सुरक्षा कवच'
कार्बन स्टॉक में यह बढ़ोतरी केवल एक सांख्यिकीय आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह झारखंड का जलवायु परिवर्तन के खिलाफ एक 'सुरक्षा कवच' है। जंगल जितने अधिक कार्बन स्टॉक को सोखेंगे, वातावरण उतना ही शुद्ध होगा और तापमान में होने वाली अनियंत्रित वृद्धि पर लगाम लगेगी। झारखंड जैसे औद्योगिक और खनन प्रधान राज्य के लिए यह वृद्धि अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि यहाँ कार्बन उत्सर्जन की दर अन्य राज्यों की तुलना में अधिक रहती है। जंगलों की यह बढ़ती क्षमता भविष्य में कार्बन क्रेडिट (Carbon Credit) के क्षेत्र में भी राज्य के लिए नए अवसर खोल सकती है।
जैव विविधता और प्राकृतिक संतुलन पर प्रभाव
जंगलों में कार्बन और जैविक तत्वों की अधिकता का सीधा असर वहां की जैव विविधता पर पड़ता है। जब मिट्टी की गुणवत्ता (SOC) सुधरती है, तो सूक्ष्म जीवों से लेकर बड़े वन्यजीवों तक के लिए अनुकूल वातावरण तैयार होता है। झारखंड के सारंडा, दलमा और पलामू जैसे सघन वन क्षेत्रों में यह सुधार वन्यजीवों के संरक्षण में भी मददगार साबित होगा। जल स्रोतों का पुनर्जीवित होना और जंगलों में नमी का बने रहना इसी प्राकृतिक संतुलन का हिस्सा है। कार्बन स्टॉक बढ़ने से वनों की आग (Forest Fire) झेलने की क्षमता भी बढ़ती है, क्योंकि स्वस्थ और नम मिट्टी आग के प्रसार को धीमा कर देती है।
भविष्य की चुनौतियां और संरक्षण की आवश्यकता
हालांकि 2023 के आंकड़े सुखद हैं, लेकिन 2017 के स्तर (2.22 लाख हजार टन) तक पुनः पहुँचने के लिए अभी एक लंबी दूरी तय करनी बाकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि वन संरक्षण के सामुदायिक प्रयासों को और तेज करना होगा। ग्रामीणों और वन समितियों की भागीदारी से ही 'अबव ग्राउंड बायोमास' को वापस पुराने स्तर पर लाया जा सकता है। अवैध कटाई पर रोक और बंजर भूमि पर सघन वनीकरण ही वह रास्ता है जिससे झारखंड आने वाले समय में देश के सबसे 'कार्बन रिच' राज्यों में शुमार हो पाएगा। विश्व वन दिवस पर मिली यह रिपोर्ट हमें याद दिलाती है कि प्रकृति को दिया गया थोड़ा सा सहयोग भी बड़े सकारात्मक परिणाम ला सकता है।
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