Ad Code

Responsive Advertisement

पखाल दिवस: परंपरा, स्वाद और सेहत का अनूठा उत्सव

ओड़िया समुदाय की समृद्ध खान-पान परंपरा में पखाल भात का विशेष स्थान है। खासतौर पर गर्मी के मौसम में यह व्यंजन न सिर्फ स्वाद का आनंद देता है, बल्कि शरीर को ठंडक और ऊर्जा भी प्रदान करता है। हर साल 20 मार्च को मनाया जाने वाला पखाल दिवस इस पारंपरिक भोजन की लोकप्रियता और सांस्कृतिक महत्व को दर्शाता है।
पखाल भात को आमतौर पर “पानी भात” भी कहा जाता है। इसे बनाने की विधि बेहद सरल लेकिन वैज्ञानिक है—पके हुए चावल को पानी में भिगोकर रातभर रखा जाता है, जिससे इसमें हल्का खमीर (फर्मेंटेशन) उत्पन्न होता है। अगले दिन यह हल्की खटास के साथ तैयार हो जाता है, जो पाचन के लिए बेहद लाभकारी माना जाता है।
आज पखाल भात सिर्फ गांवों तक सीमित नहीं रहा। यह अब बड़े शहरों के रेस्टोरेंट और होटलों के मेन्यू में भी शामिल हो चुका है। कांसे के बर्तन में परोसे जाने की परंपरा आज भी कायम है, जो इसकी सांस्कृतिक पहचान को और मजबूत बनाती है।
पखाल का असली स्वाद उसके साथ परोसे जाने वाले व्यंजनों से और बढ़ जाता है। इसमें आलू का भर्ता, टमाटर की चटनी, बड़ी का चूरा, साग, मछली फ्राई, ऑमलेट, अचार और करेले के चिप्स जैसे कई पारंपरिक स्वाद शामिल होते हैं। कद्दू के फूल के पकौड़े जैसे स्थानीय व्यंजन इसकी थाली को और खास बना देते हैं।
पखाल दिवस की शुरुआत वर्ष 2015 में कुछ लोगों द्वारा इस पारंपरिक भोजन को वैश्विक पहचान दिलाने के उद्देश्य से की गई थी। आज सोशल मीडिया पर यह दिन एक ट्रेंड के रूप में उभर चुका है, जहां लोग पखाल खाते और बनाते हुए तस्वीरें साझा करते हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार, पखाल भात गर्म और उमस भरे मौसम में शरीर को ठंडा रखने के साथ-साथ पाचन को बेहतर बनाता है। यही वजह है कि यह व्यंजन सिर्फ स्वाद ही नहीं, बल्कि सेहत का भी भरोसेमंद साथी बन चुका है। इस तरह पखाल भात ओड़िया संस्कृति की पहचान होने के साथ-साथ आज के समय में पारंपरिक और आधुनिक जीवनशैली के बीच एक स्वादिष्ट सेतु बन गया है।

Post a Comment

0 Comments

Ad Code

Responsive Advertisement