Dalma sendra 2026 : झारखंड की सांस्कृतिक और पारंपरिक पहचान के प्रतीक 'दलमा सेंदरा' (पारंपरिक शिकार उत्सव) को लेकर सरगर्मियां तेज हो गई हैं। रविवार को जमशेदपुर के पास आसनबनी में दलमा बुरु सेंदरा दिसुआ समिति की एक बैठक आयोजित की गई। इस बैठक की अध्यक्षता समिति के अध्यक्ष फकीर चंद्र सोरेन ने की। बैठक का मुख्य उद्देश्य आगामी सेंदरा पर्व की तिथि का औपचारिक निर्धारण करना, सेंदरा वीरों के स्वागत की रूपरेखा तैयार करना और वन विभाग के साथ समन्वय स्थापित करना था। आदिवासी समाज के लिए दलमा केवल एक पहाड़ नहीं, बल्कि उनकी आस्था और परंपरा का केंद्र है। इसी भावना को ध्यान में रखते हुए बैठक में समाज के प्रबुद्ध जनों ने शिरकत की और सर्वसम्मति से कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए।
27 अप्रैल को होगा ऐतिहासिक 'दिसुआ सेंदरा' का आयोजन
बैठक के दौरान सबसे महत्वपूर्ण चर्चा सेंदरा की तिथि को लेकर हुई। विभिन्न पहलुओं और पारंपरिक गणनाओं पर विचार-विमर्श करने के बाद, समिति ने 27 अप्रैल को 'दिसुआ सेंदरा' आयोजित करने पर अंतिम मुहर लगा दी है। इस घोषणा के साथ ही पूरे कोल्हान प्रमंडल और पड़ोसी राज्यों के आदिवासी समुदायों में उत्साह की लहर दौड़ गई है। सेंदरा समिति ने अब आधिकारिक रूप से विभिन्न गांवों के 'दिसुआ सेंदरा वीरों' (पारंपरिक शिकारियों) को निमंत्रण भेजना शुरू कर दिया है। 27 अप्रैल की सुबह सैकड़ों की संख्या में आदिवासी सेंदरा वीर अपने पारंपरिक वेशभूषा और वाद्य यंत्रों के साथ दलमा की पहाड़ियों की ओर कूच करेंगे।
वन विभाग के सख्त रवैये पर नाराजगी और चेतावनी
बैठक को संबोधित करते हुए अध्यक्ष फकीर चंद्र सोरेन ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज सदियों से अपनी परंपराओं का निर्वाह करता आ रहा है और सेंदरा उनकी सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा है। सोरेन ने आरोप लगाया कि पिछले कुछ वर्षों से वन विभाग 'सेंदरा वीरों' के साथ सख्ती से पेश आ रहा है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि विभाग को सेंदरा वीरों को बेवजह परेशान करना बंद करना चाहिए। सोरेन के अनुसार, विभाग द्वारा आदिवासियों के पारंपरिक हथियारों को छीन लेना न केवल उनके अधिकारों का हनन है, बल्कि उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाला कृत्य भी है।
पारंपरिक हथियारों की रक्षा और सांस्कृतिक स्वाभिमान
आदिवासी समाज में तीर-धनुष और अन्य पारंपरिक हथियार केवल शिकार के साधन नहीं, बल्कि उनके गौरव और सुरक्षा के प्रतीक हैं। फकीर सोरेन ने इस बात पर जोर दिया कि सेंदरा के दौरान आदिवासी अपने पूर्वजों की परंपरा को जीवित रखते हैं। उन्होंने कहा कि सेंदरा वीर प्रकृति की रक्षा करना जानते हैं, लेकिन विभाग द्वारा उन्हें अपराधी की तरह देखना गलत है। समिति के सदस्यों ने मांग की है कि प्रशासन को आदिवासियों की सांस्कृतिक विशिष्टता का सम्मान करना चाहिए और उनके पारंपरिक हथियारों के साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए।
जिला प्रशासन और वन विभाग के साथ समन्वय की पहल
टकराव की स्थिति को टालने और पर्व को शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने के लिए समिति ने एक सकारात्मक कदम उठाने का निर्णय लिया है। फकीर सोरेन ने बताया कि जल्द ही सेंदरा समिति की ओर से जिला प्रशासन और वन विभाग को एक औपचारिक पत्र भेजा जाएगा। इस पत्र के माध्यम से मांग की जाएगी कि सेंदरा पर्व के दिन प्रशासन सहयोग की भावना दिखाए न कि दमन की। समिति चाहती है कि वन विभाग और पुलिस प्रशासन इस पर्व को आदिवासियों के संवैधानिक और पारंपरिक अधिकारों के दायरे में रहकर देखने की कोशिश करे, ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति से बचा जा सके।
'बीर सिंगराई' और सामुदायिक एकजुटता पर जोर
बैठक के अंतिम चरण में 'बीर सिंगराई' (पारंपरिक सभा) और सेंदरा वीरों के भव्य स्वागत पर चर्चा की गई। सेंदरा केवल शिकार का पर्व नहीं है, बल्कि यह आदिवासी युवाओं को उनके इतिहास, बहादुरी और जंगलों के प्रति उनके उत्तरदायित्व की शिक्षा देने का भी माध्यम है। बैठक में निर्णय लिया गया कि जो वीर दलमा की चोटियों से उतरेंगे, उनका पूरे सम्मान के साथ स्वागत किया जाएगा। इस दौरान जयराम मुर्मू, गुरूचरण सिंह, कारान हांसदा, सुकू टुडू, बुधू माझी, गणपति सिंह, खिरोद समेत समाज के कई अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे, जिन्होंने इस आयोजन को सफल बनाने का संकल्प लिया।

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