संताली फिल्म इंडस्ट्री का विकास धीमा, कलाकारों को नहीं मिल रही पहचान और उचित मेहनताना

भारत में संताल समुदाय की आबादी करोड़ों में होने के बावजूद संताली और अन्य आदिवासी भाषाओं की फिल्म इंडस्ट्री अपेक्षित गति से विकसित नहीं हो पा रही है। लंबे समय से इस क्षेत्र से जुड़े कलाकारों और निर्माताओं का कहना है कि संसाधनों की कमी, सीमित बाजार और पर्याप्त प्रचार-प्रसार के अभाव के कारण आदिवासी फिल्मों को वह मंच नहीं मिल पा रहा है, जिसकी वे हकदार हैं।
फिल्म क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि हिंदी और अन्य मुख्यधारा की फिल्मों की तरह संताली फिल्मों के कलाकारों को अभी तक न तो व्यापक पहचान मिल पाई है और न ही उनके काम के अनुरूप पारिश्रमिक। कई कलाकार वर्षों से इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं, लेकिन उन्हें आर्थिक रूप से स्थिरता नहीं मिल पाती। इसके कारण कई प्रतिभाशाली युवा कलाकार बीच में ही फिल्म इंडस्ट्री छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि आदिवासी फिल्मों में कहानियों और संस्कृति की समृद्ध परंपरा मौजूद है। संताली समाज की लोककथाएं, परंपराएं, त्योहार और जीवन शैली फिल्मों के लिए बेहद समृद्ध विषय प्रदान करते हैं। इसके बावजूद इन फिल्मों के निर्माण के लिए पर्याप्त निवेश नहीं मिल पाता। सीमित बजट में बनने वाली फिल्मों को बड़े स्तर पर रिलीज करने और प्रचारित करने में भी कठिनाई आती है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म के बढ़ते प्रभाव के बावजूद संताली फिल्मों को अभी भी बड़े ओटीटी प्लेटफॉर्म या राष्ट्रीय स्तर के वितरण नेटवर्क तक पहुंच बनाने में संघर्ष करना पड़ रहा है। यदि इन फिल्मों को उचित मंच और तकनीकी सहयोग मिले, तो यह इंडस्ट्री तेजी से आगे बढ़ सकती है।
फिल्म से जुड़े कलाकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि सरकार और सांस्कृतिक संस्थानों को आदिवासी फिल्मों को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष योजनाएं बनानी चाहिए। साथ ही फिल्म महोत्सव, प्रशिक्षण कार्यक्रम और वित्तीय सहायता के माध्यम से इस क्षेत्र के कलाकारों को अवसर दिए जाने की आवश्यकता है।
स्थानीय स्तर पर भी दर्शकों को अपनी भाषा और संस्कृति की फिल्मों को देखने और प्रोत्साहित करने की जरूरत है। जब दर्शकों का समर्थन बढ़ेगा, तो निर्माता भी अधिक निवेश करने के लिए आगे आएंगे।
संताली फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का मानना है कि यदि सही दिशा में प्रयास किए जाएं, तो आने वाले समय में आदिवासी फिल्मों को भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल सकती है। इससे न केवल कलाकारों को सम्मान और उचित मेहनताना मिलेगा, बल्कि आदिवासी संस्कृति और परंपराओं को भी व्यापक मंच मिलेगा।

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