DALMA HILL: जमशेदपुर से सटे दलमा पहाड़ी के तराई क्षेत्र में बसे कई गांव—जैसे कालाजाना, लुपुंगडीह, खोर्काई, आसनबनी और आसपास के टोले—में ठंड उतरते ही एक जीवंत परंपरा जाग उठती है। यह परंपरा है खजूर के पेड़ों से रस निकालकर गुड़ बनाने की। स्थानीय ग्रामीण इसे न सिर्फ रोज़गार का एक प्रमुख साधन मानते हैं, बल्कि इसे अपनी संस्कृति और पहचान का भी अहम हिस्सा मानते हैं।
नवंबर के अंतिम सप्ताह से फरवरी तक इन गांवों के कई परिवार सुबह-सुबह उठकर खजूर पेड़ों पर चढ़ते हैं और ‘दऊड़ी’ लगाते हैं। दऊड़ी यानी लकड़ी की छोटी नली, जिसे पेड़ पर हल्का सा चीरा लगा कर बांधा जाता है ताकि रातभर में पेड़ से मिठास भरा रस ‘ताड़ी’ के रूप में टपककर मिट्टी या स्टील के बर्तनों में जमा हो सके। सूर्योदय तक इकट्ठा हुआ रस ताज़ा और गाढ़ा होता है, जिसे उसी सुबह गुड़ बनाने की प्रक्रिया में भेज दिया जाता है।
ग्रामीण बताते हैं कि यह काम पीढ़ियों से उनके जीवन का हिस्सा रहा है। कई बुजुर्ग आज भी बताते हैं कि कैसे उनके पूर्वज इसी रस और गुड़ की कमाई से परिवार चलाते थे। आज भी यह परंपरा आधुनिकता की तेज़ रफ्तार के बीच अपनी मिठास बनाए हुए है।
मेहनत भरा लेकिन आनंददायक है गुड़ बनाने का काम
रस इकट्ठा होने के बाद असली मेहनत शुरू होती है। गांवों में खुले चूल्हे पर बड़े-बड़े कड़ाहे चढ़ाए जाते हैं। उनमें सुबह का ताज़ा रस डालकर लगातार कई घंटों तक पकाया जाता है। चूल्हे की आग को तेज़ रखने के लिए सूखी लकड़ी, पुआल और झाड़ियों का इस्तेमाल होता है। रस को लगातार चलाया जाता है ताकि वह जले नहीं और उसकी मिठास और सुगंध बनी रहे।
धीरे-धीरे रस गाढ़ा होने लगता है और उसका रंग पहले हल्का सुनहरा, फिर गहरा भूरा रूप ले लेता है। जैसे-जैसे उबाल बढ़ता है, कड़ाही के आसपास गुड़ की मीठी खुशबू फैल जाती है। यह खुशबू पूरे गांव में सर्द हवाओं के साथ घुल-मिल जाती है। ग्रामीण बताते हैं कि गुड़ बनाने का यह मौसम गांवों को उत्सव जैसा माहौल देता है।
जब रस पूरी तरह गाढ़ा होकर गुड़ का रूप ले लेता है, तब उसे लकड़ी की बनी सांचों में या सीधे प्लेट में जमने के लिए डाल दिया जाता है। कुछ लोग ठोस गुड़ बनाते हैं, जबकि कुछ परिवार ‘पातालुवा’ यानी तरल गुड़ भी तैयार करते हैं, जिसका इस्तेमाल स्थानीय मिठाइयों और पकवानों में खासतौर पर होता है।
बाजार में बढ़ी मांग, स्थानीय अर्थव्यवस्था को मिलती है ताकत
दलमा तराई में बनने वाला खजूरी गुड़ अपनी गुणवत्ता और प्राकृतिक मिठास के कारण आसपास के शहरों—जमशेदपुर, मानगो, चाकुलिया, घाटशिला—में काफी लोकप्रिय है। यह गुड़ बाजार में आसानी से बिक जाता है क्योंकि इसमें किसी तरह का मिलावट या केमिकल नहीं होता। इसे पूरी तरह पारंपरिक तरीके से बनाया जाता है, जो इसकी खास पहचान है।
ग्रामीण परिवार हर दिन 5 से 20 किलो तक गुड़ तैयार कर लेते हैं। गुड़ की कीमत गुणवत्ता के हिसाब से 120 से 200 रुपये प्रति किलो तक रहती है। यह आय कई परिवारों के लिए सर्दियों के महीनों में महत्वपूर्ण सहारा बनती है।
कुछ परिवार तो इस काम से इतना लाभ कमाने लगे हैं कि उन्होंने अधिक खजूर के पेड़ों की देखभाल शुरू कर दी है। कई गांवों में छोटे स्तर पर गुड़ खरीदने वाले व्यापारी भी पहुंचने लगे हैं, जिससे ग्रामीणों को गांव से बाहर भेजने की जरूरत नहीं पड़ती।
स्थानीय स्वयं सहायता समूह (SHG) और युवा संगठन भी अब इस पारंपरिक उत्पाद को पैकिंग कर शहरों के मेलों और बाजारों में बेचने लगे हैं, जिससे इसकी मूल्यवृद्धि हो रही है। ऐसे प्रयास ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति देने के साथ-साथ इस पुरानी परंपरा को भी मजबूत कर रहे हैं।
मौसम बदलने की चुनौतियां, लेकिन परंपरा को बचाए रखने का संकल्प
खजूर का रस पूरी तरह मौसम पर निर्भर करता है। तापमान जितना कम होता है, रस उतना मीठा और अधिक मात्रा में मिलता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में मौसम में तेजी से हो रहे बदलाव का असर गांवों में भी महसूस किया जा रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि पहले दिसंबर-जनवरी में तापमान काफी कम रहता था, जिससे रस अधिक निकलता था। लेकिन अब कई दिनों तक तापमान उतना नहीं गिरता, जिससे रस की उत्पादन क्षमता पर असर पड़ रहा है। कभी-कभी पेड़ों में रोग लग जाने से भी रस की गुणवत्ता घट जाती है।
फिर भी गांवों के लोग इस परंपरा को छोड़ने के मूड में नहीं हैं। उनका कहना है कि यह सिर्फ रोजगार का साधन नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान है। कई परिवार अपने बच्चों को भी रस निकालने और गुड़ बनाने की प्रक्रिया सिखा रहे हैं।
कुछ युवा इस परंपरा को आधुनिक बाज़ार से जोड़ने का भी प्रयास कर रहे हैं-जैसे गुड़ को ब्रांडिंग करके ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बेचने की योजना, ताकि गांवों की यह मीठी परंपरा न सिर्फ बचे, बल्कि आगे बढ़े।

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